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60 के बाद भी हीरो को लीड रोल, 50 में एक्ट्रेस को साइड रोल! क्या बॉलीवुड उम्र को तरजीह देता है?

Ageism in Bollywood: सनी देओल, शाहरुख खान, सलमान खान से लेकर काजोल, रानी मुखर्जी और नीना गुप्ता तक, बदलते भारतीय सिनेमा में उम्र और स्टारडम की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है। इस आर्टिकल में फिल्म क्रिटिक और वरिष्ठ पत्रकार से बातचीत के आधार पर हम एजिज़्म, जेंडर बायस और कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा के दौर में उम्र में 50+ एक्ट्रेसेस की बदलती भूमिकाओं और असमानताओं पर रोशनी डालने जा रहे हैं।

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Feb 07, 2026
सिनेमा में उम्र का बदलता स्वरूप। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

Ageism in Bollywood: इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में हर साल तकरीबन 1500 फिल्में बनती हैं और हजारों करोड़ों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन होता है, वहां अपनी एक अलग पहचान बनाना आसान काम नहीं है। आज बॉलीवुड में जहां तीनों खान (सलमान, शाहरुख और आमिर) 60 की उम्र में भी अपना स्टारडम कायम किए हुए हैं, और तकरीबन हर साल एक-दो फिल्में कर रहे हैं, वहीं, 68 की उम्र में सनी देओल ने भी साबित कर दिया है कि वो भी किसी से कम नहीं हैं। अब सनी देओल की बात आई है तो बता दें कि 2023 में सनी ने अनिल शर्मा की 'गदर 2' से धमाकेदार कमबैक किया था। और इसके बाद साल 2025 में उनकी फिल्म जाट रिलीज हुई, जिसको दर्शकों और क्रिटिक्स का अच्छा रिस्पॉन्स मिला। अगर 2026 की बात करें जनवरी में सनी देओल की मोस्ट अवेटेड फिल्म 'बॉर्डर 2' रिलीज हुई और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिए। मगर सनी का तूफान यहीं नहीं रुकने वाला है क्योंकि इस साल उनकी 3 और फिल्में रिलीज होने वाली हैं, जिनमें अक्षय खन्ना के साथ 'इक्का', 'रामायण', और 'गबरू' के नाम शामिल हैं और पाइपलाइन में और भी कुछ फिल्में हैं जो अगले साल रिलीज हो सकती हैं।

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सिनेमा सच में बदल रहा है... (Changing Face of Indian Cinema)

मगर, अब सवाल ये उठता है कि फिल्म इंडस्ट्री में जहां एक ओर 60-70 की उम्र में भी सनी देओल, अक्षय कुमार, अजय देवगन, सलमान खान, शाहरुख खान, रजनीकांत, कमल हासन जैसे 60 की उम्र के बाद भी लीड रोल में नजर आ रहे हैं, जबकि दूसरी और हीरोइनों के लिए उम्र की एक तय सीमा है। अगर आपने गौर किया हो तो फिल्मों में हीरोइनों को एक उम्र के बाद या तो साइड रोल जैसे मां, भाभी, बहन के किरदार मिलने लगते हैं, या फिल्में मिलनी ही बंद हो जाती हैं। मगर पिछले एक दशक पर नजर डालें तो क्या उम्र सिर्फ महिलाओं के लिए मायने रखती है? या सिनेमा सच में बदल रहा है?

स्टीरियोटाइप का टूटता दायरा। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

जी हां, फिल्मों में महिला किरदारों और उनको निभाने के लिए एक्ट्रेसेस के चुनाव में कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आज रानी मुखर्जी 47 साल की उम्र में मर्दानी फ्रेंचाइजी के साथ सिनेमा घरों पर दमदार प्रदर्शन कर रहीं हैं और समाज के दुश्मनों को नाकों चने चबवा रहीं हैं। वहीं, 51 की उम्र में काजोल फिल्मों और वेब सीरीज में लीड रोल्स निभाती नजर आ रही हैं। सुष्मिता सेन की बात की जाए तो 51 साल की एक्ट्रेस भी अकेले अपने दम पर आर्या जैसे एक्शन ड्रामा वेबसीरीज में एक्शन करती नजर आ रहीं हैं। इस कड़ी में नीना गुप्ता का नाम ना आये ऐसा होना मुश्किल है, 66 साल की नीना 2018 की फिल्म 'बधाई हो!' में एक उम्रदराज महिला के किरदार में नजर आयीं, जो बेटे की शादी करने की उम्र में प्रेग्नेंट हो जाती है। देखा जाए तो फिल्म के लीड रोल में आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा थे, लेकिन कहानी की मुख्य पात्र नीना गुप्ता ही थीं। फिल्म की कहानी नीना गुप्ता के इर्द-गिर्द ही घूमती है। प्रियंका चोपड़ा को ही ले लीजिये तो आज वो 47 की उम्र में एक ग्लोबल स्टार हैं और जल्द ही एक्शन ड्रामा फिल्म 'द ब्लफ' में जबर्दस्त एक्शन सीन्स करती नजर आएंगी।

कितना बदला है एक्टेसेस के लिए सिनेमा (Actresses and Ageism)

तब का दौर: एक वक्त था जब हिंदी सिनेमा में एक्ट्रेस की जिंदगी और करियर के बीच एक पतली लेकिन गहरी लकीर खिंची होती थी। शादी होते ही माना जाता था कि अब उनका स्टारडम ढलान पर है। 35 से 40 की उम्र पार करते ही लीड रोल लगभग बंद हो जाते थे और विकल्प के तौर पर मां, भाभी या सपोर्टिंग किरदार ही बचते थे। कई टैलेंटेड एक्ट्रेसेस तो बिना किसी विदाई के परदे से गायब ही हो गईं, क्योंकि इंडस्ट्री उम्र को अनुभव नहीं, बोझ मानती थी।

अब का दौर: आज सिनेमा की सोच धीरे-धीरे बदलती दिख रही है। उम्र से ज़्यादा अभिनय, स्क्रीन प्रेज़ेंस और किरदार की गहराई को महत्व मिलने लगा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इस बदलाव को रफ्तार दी है, जहां कहानी और परफॉर्मेंस ही असली हीरो हैं। कैरेक्टर-ड्रिवन स्क्रिप्ट्स ने 40 से 50 के बाद भी एक्ट्रेसेस के लिए स्पेस बनाया है, भले ही वो प्रॉपर लीड रोल न हों, लेकिन अब उनके किरदार कहानी को आगे बढ़ाने की ताकत रखते हैं।

पिछले वर्षों के मुकाबले सिनेमा काफी बदला है

इस टॉपिक पर जब हमने फिल्म क्रिटिक और ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श से बात की तो उन्होंने कहा, 'सिनेमा बदल रहा है, ये सही है कि सिनेमा बदल रहा है, पहले की बात अलग थी, लेकिन आज अगर कोई कलाकार अच्छा काम कर रहा है, नंबर डिलीवर कर रहा है, तो क्यों नहीं… लोग अच्छा काम क्यों नहीं देखना चाहेंगे। अगर सनी देओल की बात की जाए तो उन्होंने 'गदर 2' की, 'बॉर्डर 2' की और उससे पहले उनकी 'जाट' फिल्म आई थी, वो अच्छा काम कर रहे हैं, नंबर डिलीवर कर रहे हैं इसलिए लोग उनको साइन कर रहे हैं और लोग उनको देख हैं। इसी तरह एक्ट्रेसेस का काम भी पसंद किया जा रहा है, उनको लीड रोल वाली फिल्में मिल रही हैं और लोग उनको पसंद कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि पिछले वर्षों के मुकाबले सिनेमा काफी बदला है।'

सही है कि सिनेमा बदल रहा है, पहले की बात अलग थी- तरण आदर्श। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

जी हां, सिनेमा बदल रहा है, पहले जमाने में होता था कि अरे ऐज हो गई, शादी हो गई या एक पर्टिकुलर ऐज के बाद आपको यही रोल मिलेंगे। तो अभी टोटल बदला है। आजकल अगर आपका एक कैरेक्टर काम करता है उस रोल में तो लोग जरूर आपके साथ काम करना चाहेंगे और क्यों नहीं करेंगे आपके साथ, आप नंबर्स डिलीवर कर रहे हैं आपका क्रेज है तो व्हाई नॉट… वो देखना चाहेंगे। इसीलिए अगर आप देखिए सनी देओल की चाहे वो 'गदर' हो या 'बॉर्डर 2' हो या उससे पहले पिक्चर आई थी 'जाट', वो नंबर डिलीवर कर रहे हैं। इसलिए उनकी डिमांड है।

महामारी के बाद फिल्म देखने का ट्रेंड बिल्कुल बदल गया है (Content-driven Cinema in India)

इस मुद्दे पर जब हमने वरिष्ठ पत्रकार और पॉडकास्टर जयंती रंगनाथन से बात की तो उन्होंने कहा, 'महामारी के बाद फिल्म देखने का ट्रेंड बिल्कुल बदल गया है। पहले जैसे हम लोग आराम से हर जगह सिनेमाहॉल में जाकर हर फिल्म देखते थे। लेकिन अब वो नहीं नहीं है, अब हमारे पास ओटीटी आ गया है तो हम फिल्म देखने के लिए बहुत चूज़ी हो गए है। अब हम ऐसी फिल्में देखते हैं जिसमें कुछ तो कमाल हो, बड़े पर्दे पर कुछ कमाल हो ये वाला आईडिया है ठीक है, पर अब अगर देखो कि शाहरुख खान है, सलमान खान है जो आ रहे हैं और मतलब मल्टी करोड़ की इनकी फिल्में बन रही हैं। हीरोइंस भी है जो वापस आ रही है और उस तरह से फिल्म बना रही है। ये मेरे हिसाब से ये बहुत बढ़िया ट्रेंड है और ये आगे भी चलेगा जिनको पहले काम नहीं मिल रहा था राइट और जिनको लग रहा था कि छोटे-मोटे रोल ही हैं हमारे लिए। अगर महिला है और 50 प्लस है तो भाभी और मां वाले किरदार करने पड़ेंगे।"

चाहे फिल्म हो या वेबसीरीज हो सबको काम मिल रहा है। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

इसके आगे उन्होंने कहा, "मैं अब मेरे जमाने की बात करूं एक्सैक्टली यही होता था। कल तक हमने जिन्हें हीरोइन के रूप में देखा तुरंत उन्हें भाभी-मां ऐसे रूपों में देखा करते थे। अब वो नहीं है क्योंकि अब सब कैरेक्टर बेस्ड हो गया है सब कुछ। चाहे फिल्म हो या वेबसीरीज हो सबको काम मिलने लगा है। जो अच्छे टैलेंटेड लोग हैं, जो 10-10 साल तक घर में बैठते थे। अब उनको भी बहुत बढ़िया मौका मिलने लगा है। मैं देख रही हूं तृप्ति डिमरी एक तरफ तो शाहिद कपूर के साथ इतनी बड़ी फिल्म काम कर रही हैं। उसी तरह से वो माधुरी के साथ एक वेबसीरीज 'सास बहन' में भी काम कर रही है। पहले कोई सोच सकता था कि जो बड़ा एक्टर है वो एक साथ फिल्म और वेबसीरीज में काम करेगा, कभी भी नहीं। ये बहुत अच्छी बात है सिर्फ इसीलिए क्योंकि लोगों के पास अब चॉइस है। लोग वेब सीरीज में भी खूब अच्छी एक्टिंग और घर में भी फिल्म जैसा मजा लेना चाहते हैं। वहां भी एक्टर्स को बहुत अच्छे पैसे मिलते हैं क्योंकि एक्टिंग का ज्यादा स्कोप लगता है।"

इंडियन सिनेमा एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां कंटेंट और परफॉर्मेंस को पहले से ज्यादा अहमियत मिलने लगी है। हालांकि, सनी देओल जैसे मेल स्टार्स के लिए उम्र अब भी करियर की बाधा नहीं है, वहीं, हीरोइनों के मामले में उम्र को अभी भी तरजीह दी जाती है। 50 और 50 से ज्यादा की उम्र की एक्ट्रेसेस को मौके तो मिल रहे हैं, लेकिन ज्यादातर कैरेक्टर रोल के रूप में। मगर असली बदलाव तब आएगा, जब उम्र की सीमा की बजाय कहानी को प्रमुखता दी जायेगी।

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