ALS Disease In India : यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है। अगर पश्चिमी देशों से तुलना करें तो NIMHANS की रिपोर्ट कहती है कि ये भारतीय पुरुषों को 10-15 साल पहले होता है। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) को लेकर हमने भारत में इसका इलाज करने वाले न्यूरोसर्जन डॉ. रिंकू शर्मा और डॉ. हिमांशु गुप्ता (सीनियर फिजिशियन) से पत्रिका के रवि कुमार गुप्ता ने बातचीत की।
ALS In India : इस दुर्लभ बीमारी से दो फेमस सेलेब की मौत दो माह के भीतर हो चुकी है। यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है। अगर पश्चिमी देशों से तुलना करें तो NIMHANS की रिपोर्ट कहती है कि ये भारतीय पुरुषों को 10-15 साल पहले होता है। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) को लेकर हमने भारत में इसका इलाज करने वाले न्यूरोसर्जन डॉ. रिंकू शर्मा से पत्रिका के रवि कुमार गुप्ता ने बातचीत की। साथ ही डॉ. हिमांशु गुप्ता (सीनियर फिजिशियन) ने भी इसको लेकर हमें कुछ जानकारी दी।
डॉ. शर्मा कहते हैं, यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव दुर्लभ बीमारी है। ये इतनी भयंकर बीमारी है कि आदमी अंदर से खोखला हो जाता है। इससे बचा पाना मुश्किल हो जाता है। इसके लक्षण ब्रेन में दिखाई देते हैं।
उन्होंने बताया, मेरे पास एक मरीज ALS का था। हालांकि, उसे बचाने का प्रयास बहुत रहा लेकिन 50 की उम्र में निधन हो गया। इस बीमारी को लेकर सटीक इलाज या कोई दवा अभी नहीं है। इसको लेकर शोध भी चल रहे हैं। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे मरीजों को बचाया जा सकेगा।
डॉ. गुप्ता कहते हैं, एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), जिसे 'लू गेरिग रोग' भी कहा जाता है, एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है। ये ना सिर्फ ब्रेन बल्कि फेफड़ों, मांसपेशियों सहित कई अंगों को प्रभावित करती है। इस कारण मरीज धीरे-धीरे कमजोर होकर मर जाता है।
मेरे पास 2010 में एक 40 साल की लड़की इस बीमारी से जूझती हुई आई थी। उसको अचानक कमजोर हुई। दिमाग में कई तरह की दिक्कतें आने लगी थी। इसके बाद जब वो आई तो पता कर पाना मुश्किल था क्योंकि, कोई जानी-पहचानी बीमारी पकड़ नहीं आ रही थी। बाद में, एमआरआई कराने पर इसके बारे में पता चला। हालांकि, वो लंबा जी ना पाई।
इसी तरह पिछले साल 2025 में मेरे एक वकील मित्र ने झुंझुनूं से महिला मरीज (50 वर्ष) को भेजा था। उसको भी एएलएस बीमारी हो गई थी। वो बुरी तरह से ग्रस्त हो गई थी। इसलिए, इलाज के 7-8 माह के बाद उसकी मृत्यु हो गई थी।
इन मौतों को लेकर वो कहते हैं, अगर सटीक इलाज या कारण का पता चले तब जाकर कुछ किया जा सकता है। अभी सिर्फ एक्सपेरिमेंटल तौर पर इलाज किया जा रहा है। क्योंकि, इस बीमारी को लेकर बहुत सारी जानकारी सामने नहीं आई है।
पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में ALS के जल्दी होने की पुष्टि कई मेडिकल रिसर्च में की गई है। शोध - ResearchGate: "The Profile of Amyotrophic Lateral Sclerosis in Natives of Western Himalayas" के मुताबिक, पश्चिमी देशों में औसत उम्र 55-65 वर्ष है, जबकि भारत में यह 40-50 वर्ष के बीच देखी गई है।
PMC - NIH पर प्रकाशित शोध- "Epidemiology and Clinical Features of ALS in India" के अनुसार, दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में ALS पुरुषों को अधिक प्रभावित करता है। भारत में पुरुष-महिला अनुपात लगभग 1.5:1 से लेकर 3:1 तक देखा गया है, यानी लगभग 60-75% मरीज पुरुष होते हैं।
इसको लेकर Frontiers in Neurology की शोध रिपोर्ट- "Diagnostic Delay in Amyotrophic Lateral Sclerosis" कहती है कि भारत में इस बीमारी की पहचान होने में औसतन 10 से 12 महीने लग जाते हैं, जो कि इलाज के लिहाज से बहुत लंबा समय है।
जागरूकता की कमी और न्यूरोलॉजिस्ट के पास देर से पहुंचने के कारण इसे अक्सर 'बुढ़ापे का दर्द' या 'कमजोरी' समझ लिया जाता है। यह स्टडी बताती है कि भारत जैसे देशों में स्पेशलिस्ट केयर तक पहुंचने में होने वाली देरी मरीज के जीवन पर भारी पड़ती है।
जैसा कि हमने डॉ. गुप्ता के 2 मरीजों का उदाहरण भी देखा।
नोट- अगर आपको अचानक से कमजोरी होती है। मांसपेशियों में भयंकर दर्द है और कोई बीमारी पकड़ नहीं आ रही है तो बिना देरी किए आपको किसी न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए।
एएलएस फाउंडेशन इसको लेकर लंबे समय से शोध कर रही है। साथ ही दुनिया भर के आंकड़े व केस को जुटाती है। उनका कहना है कि अभी तक इसके सटीक कारण का पता नहीं चल पाया है। हालांकि, न्यूरोसर्जन अभी मानते हैं कि ये बीमारी मुख्य रूप से आनुवंशिकी है।
हाल ही में (15 मार्च 2026) दिल्ली में इस संस्था ने अपने 10 साल पूरे किए हैं। वे मांग कर रहे हैं कि ALS को भारत की 'नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीज' (National Policy for Rare Diseases) में शामिल किया जाए।
दुनिया भर में 'PREVAiLS' जैसे क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं जो तेजी से बढ़ने वाले ALS को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के मरीजों को भी इन 'ग्लोबल ट्रायल्स' का हिस्सा बनाने की मांग उठ रही है।
देखते हैं कि भारत सरकार इसको लेकर क्या घोषणा करती है?
इस बीमारी को लेकर अगर आपके पास सवाल हैं तो हमसे कमेंट बॉक्स (सोशल मीडिया) पर पूछें। हमारी कोशिश रहेगी कि अधिक पूछे गए सवालों के जवाब डॉक्टर से पूछकर बताएंगे।