International Nurses Day Special: प्रसव का मामला कितना भी जटिल क्यों न हो, वे निजी अस्पतालों की बजाय सीधे थुआडबरी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। लोगों को विश्वास है कि मानकुंवर के हाथों में जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं।
International Nurses Day Special: राजनांदगाव जिले के ग्राम औधी की महिलाओं के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन चुकीं मानकुंवर ने अब तक 500 से अधिक प्रसव कराकर कई जिंदगियों को सुरक्षित जन्म दिया है। सीमित संसाधनों के बीच वर्षों से सेवा कर रहीं मानकुंवर आज इलाके में ‘जीवनदायिनी’ के रूप में पहचान बना चुकी हैं।
अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर जब दुनिया स्वास्थ्य कर्मियों को सलाम कर रही है, तब वनांचल क्षेत्र औंधी-थुआडबरी की गलियों में एक नाम लोगों की दुआओं में सबसे ज्यादा लिया जा रहा है — मानकुंवर जामगड़े। यह सिर्फ एक एएनएम का नाम नहीं, बल्कि उन सैकड़ों मांओं की उम्मीद है, जिन्होंने जिंदगी और मौत के बीच की सबसे कठिन घड़ी में इन पर भरोसा किया और सुरक्षित अपने बच्चों को जन्म दिया।
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र थुआडबरी में पदस्थ मानकुंवर जामगड़े ने अब तक 500 से अधिक सफल प्रसव कराए हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी वाले इस वनांचल इलाके में वे वर्षों से उन महिलाओं के लिए सहारा बनी हुई हैं, जिनके लिए अस्पताल तक पहुंचना भी किसी संघर्ष से कम नहीं होता। दिन हो या रात, बारिश हो या जंगलों से भरे सुनसान रास्ते, प्रसव पीड़ा में तड़पती महिलाओं के लिए सबसे पहले जिस नाम को पुकारा जाता है, वह है — "जामगड़े सिस्टर"।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव का मामला कितना भी जटिल क्यों न हो, वे निजी अस्पतालों की बजाय सीधे थुआडबरी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। लोगों को विश्वास है कि मानकुंवर के हाथों में जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं। यही वजह है कि आसपास के गांवों की महिलाएं आंख बंद कर उन पर भरोसा करती हैं।
लेकिन उनकी सेवा की असली परीक्षा तब हुई, जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी के डर से कांप रही थी। लोग अपनों से दूरी बना रहे थे, अस्पतालों में जाने से डर रहे थे, उस समय भी मानकुंवर ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। कोविड काल में उन्होंने 100 से अधिक सुरक्षित प्रसव कराए और गर्भवती महिलाओं के मन से डर हटाकर उन्हें सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराया।
मंजू साहू आज भी उस दौर को याद कर भावुक हो जाती हैं। वे बताती हैं,"कोरोना के समय मेरी डिलीवरी का वक्त आया तो मैं बहुत डरी हुई थी। हर तरफ मौत और संक्रमण का भय था। तब सिस्टर ने मेरा हाथ पकडक़र कहा कि ‘मैं हूं, डरने की कोई बात नहीं।’ बस वही शब्द मेरे लिए हिम्मत बन गए। उनकी वजह से मेरा सफल प्रसव हुआ और मैं व मेरा बच्चा दोनों सुरक्षित हैं। यह कहानी सिर्फ एक मां की नहीं, बल्कि उन अनगिनत परिवारों की है जिनके घरों में बच्चों की पहली किलकारी मानकुंवर जामगड़े की मेहनत और समर्पण की वजह से गूंजी।