
Chhattisgarh Environment: आज के दौर में जन्मदिन का मतलब अक्सर केक, मोमबत्तियां, पार्टियां और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित हो गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्राम चांदो निवासी पर्यावरण प्रेमी जितेन्द्र मानसिंग साहू ने अपने जन्मदिन को प्रकृति के नाम समर्पित कर एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली की नई उम्मीद भी जगाती है।
83 बार रक्तदान कर लोगों को जीवनदान देने वाले जितेन्द्र ने इस बार अपने जन्मदिन पर कोई पार्टी नहीं की। उन्होंने जंगल में पहुंचकर 250 देशी आम की गुठलियां रोपीं और कई गुठलियों को दूर-दूर तक फेंककर भविष्य के फलदार जंगल की नींव रख दी।
मानसून की दस्तक से पहले इन दिनों जितेन्द्र रोजाना एक झोले में आम की गुठलियां भरकर चांदी के पहाड़ी जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। जंगल पहुंचकर वे कुदाली से छोटे-छोटे गड्ढे खोदते हैं और गुठलियों को मिट्टी में दबा देते हैं। कई स्थानों पर वे गुलेल और हाथों की मदद से गुठलियों को दूर तक फेंकते हैं, ताकि बारिश के साथ वे अंकुरित होकर पेड़ों का रूप ले सकें।
उनका मानना है कि प्रकृति के साथ मिलकर किया गया यह प्रयास न केवल आसान है, बल्कि बेहद कम खर्चीला भी है। जहां पौधारोपण में पौधे खरीदने और उनकी देखभाल में काफी संसाधन लगते हैं, वहीं बीज रोपण प्रकृति की अपनी व्यवस्था पर आधारित एक स्थायी समाधान है।
जितेन्द्र की इस पहल का नाम है—"एक गुठली, एक जीवन"। उनका कहना है कि आम, जामुन, नीम, महुआ और अन्य फलदार वृक्षों के बीज अक्सर घरों से कचरे के रूप में बाहर फेंक दिए जाते हैं। यदि इन्हें जंगलों या खाली जमीनों में रोपा जाए, तो कुछ वर्षों में ये विशाल वृक्ष बन सकते हैं। उनके अनुसार, "हर गुठली अपने भीतर एक पूरा जंगल छिपाए रहती है। जरूरत सिर्फ उसे सही जगह और सही समय देने की है।"
इस अभियान के पीछे केवल हरियाली बढ़ाना ही उद्देश्य नहीं है। जितेन्द्र का मानना है कि जंगलों में फलदार वृक्षों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। इसका असर वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। भोजन की तलाश में हिरण, बंदर, तोता, कोयल और कई अन्य जीव अब गांवों की ओर आने लगे हैं। इससे मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की स्थिति भी बनती है। यदि जंगलों में फिर से फलदार वृक्षों की संख्या बढ़ेगी, तो वन्यजीवों को उनका प्राकृतिक भोजन जंगल में ही उपलब्ध हो सकेगा। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को मजबूत करने के लिए ऐसे प्रयास बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इस पहल की सबसे खास बात यह है कि यह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही। गांव के बच्चे भी अब इस अभियान से जुड़ने लगे हैं। योशित कुमार, काव्यांश कुमार, मोनिका साहू, वेदिका साहू और लालिमा साहू जैसे कई बच्चे जंगल पहुंचकर गुठलियां रोप रहे हैं। उनके हाथों में मोबाइल नहीं, बल्कि भविष्य के जंगलों के बीज हैं। जितेन्द्र का मानना है कि यदि बच्चों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण का सपना स्वतः साकार हो सकता है।
जितेन्द्र मानसिंग साहू का समाजसेवा से जुड़ाव नया नहीं है। वे अब तक 83 बार रक्तदान कर चुके हैं। वर्षों से वे जरूरतमंद लोगों के लिए रक्तदान अभियान से जुड़े रहे हैं। अब उन्होंने सेवा का दायरा और व्यापक करते हुए पर्यावरण संरक्षण को अपना मिशन बना लिया है। उनका मानना है कि रक्तदान किसी व्यक्ति को जीवन देता है, जबकि एक पेड़ सैकड़ों जीवों को जीवन प्रदान करता है। वे कहते हैं, "आज जो गुठली हम बो रहे हैं, वही कल हमारे बच्चों और वन्यजीवों को फल, छाया और जीवन देगी। पेड़ लगाना और उसकी रक्षा करना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है।"
जितेन्द्र की यह पहल केवल गुठलियां रोपने का अभियान नहीं है, बल्कि यह सोच बदलने की एक कोशिश है। यह संदेश है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े बजट या सरकारी योजनाओं का इंतजार जरूरी नहीं। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं।
आज जब जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और वन्यजीवों के संकट जैसी चुनौतियां दुनिया के सामने हैं, तब चांदो गांव का यह युवा अपने जन्मदिन पर 250 गुठलियां रोपकर बता रहा है कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति के संकल्प से भी हो सकती है। शायद आने वाले पांच से सात वर्षों बाद जब इन गुठलियों से पेड़ बनेंगे, तब यह जंगल सिर्फ फलों से नहीं, बल्कि एक युवा की दूरदृष्टि और प्रकृति प्रेम की कहानी से भी भरा होगा।
वहीं जितेन्द्र का मानना है कि केवल पौधारोपण ही नहीं, बल्कि बीजारोपण (Seed Sowing) भी जंगलों को पुनर्जीवित करने का प्रभावी और कम खर्चीला तरीका है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने जन्मदिन पर 250 देशी आम की गुठलियां जंगल में रोपकर और बिखेरकर हरियाली बढ़ाने का संकल्प लिया। उनकी पहल का उद्देश्य केवल पेड़ उगाना नहीं, बल्कि भविष्य में वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक भोजन उपलब्ध कराना और जंगलों की जैव विविधता को मजबूत करना है।
"एक गुठली, एक जीवन" नाम से चल रही इस मुहिम में अब गांव के बच्चे भी जुड़ रहे हैं। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है, बल्कि नई पीढ़ी को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास भी करा रही है। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र फलदार वृक्षों से समृद्ध हो सकता है, जिससे वन्यजीवों और स्थानीय पर्यावरण दोनों को लाभ मिलेगा।