Environment Protection: सरकारी स्कूलों के बच्चे गर्मी की छुट्टियों में अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। नौनिहाल स्कूल पहुंचकर पेड़-पौधों की देखभाल कर रहे हैं और पक्षियों के लिए दाना-पानी रखकर पर्यावरण संरक्षण व जीव दया का संदेश दे रहे हैं।
भीषण गर्मी के इस दौर में, जब तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है और लोग घरों में रहने को मजबूर हैं, ऐसे समय में बेमेतरा जिले के साजा विकासखंड से एक ऐसी प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जो न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है, बल्कि समाज को संवेदनशीलता और जीव दया का पाठ भी पढ़ाती है। यहां सरकारी स्कूलों के बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियों को सिर्फ आराम या मनोरंजन में नहीं, बल्कि प्रकृति की सेवा में समर्पित कर रहे हैं।
जहां आमतौर पर छुट्टियों का मतलब बच्चों के लिए खेलकूद, मोबाइल और मौज-मस्ती होता है, वहीं साजा विकासखंड के ये बच्चे स्कूल पहुंचकर प्रकृति के साथ अपना रिश्ता मजबूत कर रहे हैं। उनके लिए यह छुट्टियां अब ‘नेचर क्लास’ बन चुकी हैं, जहां वे पेड़-पौधों की देखभाल और पक्षियों की सेवा करना सीख रहे हैं।
भीषण गर्मी में जब इंसान तक पानी के लिए परेशान हैं, तब ये नौनिहाल बेजुबान पक्षियों की प्यास बुझाने में जुटे हैं। बच्चे रोजाना स्कूल परिसर में रखे मिट्टी के सकोरों में पानी भरते हैं और पक्षियों के लिए दाना रखते हैं। साथ ही स्कूल परिसर में लगे पौधों की सिंचाई और देखभाल भी नियमित रूप से कर रहे हैं। उनका यह छोटा प्रयास पर्यावरण संरक्षण के साथ जीव दया की बड़ी सीख दे रहा है।
इस पूरे अभियान के केंद्र में हैं शासकीय प्राथमिक शाला अकोला के प्रधान पाठक हिम कल्याणी सिन्हा। शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने अपने स्कूल को एक हरित परिसर में बदलने का सपना देखा। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके मजबूत इरादों और बच्चों के सहयोग ने इस सपने को हकीकत में बदल दिया। आज उनका यह प्रयास पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुका है।
अकोला प्राथमिक शाला का परिसर अब किसी छोटे बॉटनिकल गार्डन से कम नहीं दिखता। यहां चंदन, रुद्राक्ष, लौंग, नारियल, बादाम, चम्पा, पाम, नीम, कदम, नींबू, केला और कटहल सहित 70 से अधिक दुर्लभ और औषधीय पौधे लगाए गए हैं। ये पौधे अब तेजी से विकसित हो रहे हैं और स्कूल परिसर को हरियाली और फूलों की खुशबू से भर रहे हैं।
गर्मी को देखते हुए बच्चों ने ‘राष्ट्रीय बर्ड फीडर अभियान’ के तहत पक्षियों के लिए दाना-पानी की नियमित व्यवस्था शुरू की है। इस अभियान में छात्र-छात्राएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और इसे अपनी जिम्मेदारी समझकर निभा रहे हैं। यह पहल बच्चों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत कर रही है।
शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला राखी के बच्चों ने इस अभियान को स्कूल की सीमा से बाहर निकालकर घर-घर तक पहुंचा दिया है। अब बच्चे अपने घरों की छतों और आंगनों में भी पक्षियों के लिए दाना-पानी रख रहे हैं और अपने आसपास पौधे लगाकर उनकी देखभाल कर रहे हैं। इससे पूरा गांव इस अभियान से जुड़ता नजर आ रहा है।
बेमेतरा के इन बच्चों की पहल यह साबित करती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या बड़े संगठनों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर छोटी उम्र में बच्चों में प्रकृति प्रेम और जीव दया की भावना विकसित हो जाए, तो आने वाला समाज निश्चित रूप से अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनेगा। यह कहानी सिर्फ बच्चों की नहीं, बल्कि एक ऐसे भविष्य की है, जहां शिक्षा किताबों के पन्नों से निकलकर प्रकृति और समाज की सेवा तक पहुंच रही है।
बढ़ते तापमान, घटते जलस्तर और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्रकृति संरक्षण आज वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। ऐसे समय में बच्चों के भीतर पर्यावरण के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी विकसित करना बेहद जरूरी माना जा रहा है। स्कूलों में पौधारोपण, जल संरक्षण और पक्षी संरक्षण जैसे अभियान इसी सोच का हिस्सा हैं। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के साजा विकासखंड में सरकारी स्कूलों के बच्चों द्वारा शुरू की गई यह पहल इसी दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है, जहां नौनिहाल छुट्टियों के दौरान पेड़-पौधों की देखभाल और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।
भीषण गर्मी का असर सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बल्कि बेजुबान पक्षियों और जानवरों पर भी गंभीर रूप से पड़ता है। तापमान 40 से 45 डिग्री के पार पहुंचने पर जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे पक्षियों और आवारा जानवरों के सामने पानी और भोजन का संकट खड़ा हो जाता है। हर साल गर्मियों में बड़ी संख्या में पक्षियों के निर्जलीकरण और हीट स्ट्रोक से मरने की खबरें सामने आती हैं।
ऐसे में घरों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर दाना-पानी की छोटी-सी व्यवस्था भी बेजुबानों के लिए जीवनदान साबित हो सकती है। यही वजह है कि इन दिनों पक्षियों और जानवरों के लिए पानी के सकोरे रखने और उनकी देखभाल को लेकर जागरूकता अभियान तेज किए जा रहे हैं।