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Ebola 2026 in Congo: बिना वैक्सीन ‘इबोला’ से लड़ रहे डॉक्टर्स, जानिए क्या है ‘द क्यूब’ तकनीक जो बनी है ढाल

Congo Ebola Outbreak 2026: कांगो में इबोला वायरस का कहर जारी है। जानिए क्या है अलिमा की 'द क्यूब' (The Cube) टेक्नोलॉजी और कैसे खुद को सुरक्षित रख रहे हैं हेल्थ वर्कर्स।

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Jun 05, 2026
DR Congo Ebola Ebola Virus Bundibugyo Strain Internal Bleeding
प्लास्टिक का 'क्यूब' और इबोला से जंग! (Photo : AI Generated)

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DR Congo) का पूर्वी इलाका इस वक्त दोहरे मोर्चे पर जंग लड़ रहा है। एक तरफ दशकों पुराना सशस्त्र संघर्ष (Armed Conflict) और विद्रोही गुटों के बम-धमाके हैं, तो दूसरी तरफ अदृश्य 'इबोला वायरस' (Ebola Virus) का खौफनाक प्रकोप। इन दोनों के बीच ढाल बनकर खड़े हैं वहां के फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स, डॉक्टर्स, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ। अपनी जान को हथेली पर रखकर ये योद्धा न सिर्फ मरीजों को मौत के मुंह से निकाल रहे हैं, बल्कि खुद को संक्रमित होने से बचाने के लिए विज्ञान और कड़े प्रोटोकॉल का सहारा ले रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) रिपोर्ट्स के मुताबिक, डीआर कांगो के इतूरी, उत्तर और दक्षिण कीवू प्रांतों में इबोला का संक्रमण तेजी से पैर पसार रहा है और यह पड़ोसी देश युगांडा की सीमा तक पहुंच चुका है। अब तक 282 से अधिक पुष्ट मामलों और 1,000 से ज्यादा संदिग्ध मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। आइए जानते हैं कि इस बेहद खतरनाक माहौल में हमारे हेल्थ वर्कर्स किस तरह काम कर रहे हैं और इलाज की कौन सी नई तकनीकें इस जंग में गेम-चेंजर साबित हो रही हैं।

'बुंडिबुग्यो' स्ट्रेन: बिना वैक्सीन और दवा की चुनौती


इस बार डीआर कांगो जिस इबोला आउटब्रेक का सामना कर रहा है, वह इसका सबसे दुर्लभ और खतरनाक 'बुंडिबुग्यो' (Bundibugyo) स्ट्रेन है। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस विशिष्ट स्ट्रेन के लिए दुनिया में फिलहाल कोई भी स्वीकृत (Approved) वैक्सीन या सटीक एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है।

ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के पास मरीजों को बचाने का केवल एक ही रास्ता बचता है अग्रेसिव सपोर्टिव केयर (Aggressive Supportive Care)। इबोला का वायरस शरीर में जाते ही गंभीर उल्टी, दस्त और आंतरिक रक्तस्राव (Internal Bleeding) पैदा करता है, जिससे मरीज के शरीर का सारा पानी खत्म हो जाता है। हेल्थ वर्कर्स दिन-रात मरीजों की मॉनिटरिंग करते हैं, उन्हें लगातार आईवी फ्लूइड्स (IV Fluids/ग्लूकोज) देते हैं, ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखते हैं और बुखार व अन्य लक्षणों को नियंत्रित करने वाली दवाएं देते हैं। शुरुआत में इसके लक्षण मलेरिया और टाइफाइड जैसे लगते हैं, इसलिए संदिग्ध मरीजों को तुरंत आइसोलेट करना सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम होता है।

'द क्यूब' (The Cube): इलाज के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी तकनीक

इस आउटब्रेक में स्वास्थ्य कर्मियों और मरीजों के बीच की दूरी को पाटने के लिए 'अलिमा' (Alima) नामक मेडिकल चैरिटी संस्था ने एक अनूठी तकनीक का इस्तेमाल किया है, जिसे 'द क्यूब' (Biosecure Emergency Care Unit for Outbreaks CUBE) कहा जाता है। यह तकनीक इबोला के इलाज में वरदान साबित हो रही है।

क्या है यह 'क्यूब'?

यह उच्च तकनीक से बना एक पारदर्शी (Transparent) और हवादार प्लास्टिक का केबिन होता है। इबोला से संक्रमित या संदिग्ध मरीज को इस क्यूब के अंदर रखा जाता है। इसके बाहरी हिस्से में खास तरह के टनलनुमा ग्लव्स (दस्ताने) लगे होते हैं।

  • हेल्थ वर्कर्स की सुरक्षा: इस क्यूब का सबसे बड़ा फायदा यह है कि डॉक्टर्स और नर्स बिना भारी-भरकम पीपीई (PPE) किट पहने भी बाहर से ही मरीज की जांच कर सकते हैं, उन्हें दवा दे सकते हैं और मॉनिटर कर सकते हैं। इससे डॉक्टरों के संक्रमित होने का खतरा लगभग शून्य हो जाता है।
  • मरीजों को मनोवैज्ञानिक सहारा: पुराने इबोला आउटब्रेक के दौरान मरीजों को पूरी तरह से बंद कमरों में दीवारों के पीछे रख दिया जाता था, जिससे वे डर जाते थे और उनके परिवार वाले भी डॉक्टरों को शक की निगाह से देखते थे। 'द क्यूब' के पारदर्शी होने की वजह से मरीज अपने परिवार को देख सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं। इससे मरीजों का मानसिक हौसला बढ़ता है और समाज में फैला डर कम होता है। हालांकि, चुनौती यह है कि डीआर कांगो में मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले इन क्यूब्स की संख्या बहुत सीमित है।

कैसे खुद को बचा रहे हैं वर्कर्स?

एक छोटी सी लापरवाही और मौत पक्की इबोला के वार्ड में काम करने वाले हर हेल्थ वर्कर को इस कड़वी हकीकत का पता है। अब तक 16 स्वास्थ्य कर्मी भी इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं। खुद को सुरक्षित रखने के लिए वे बेहद कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हैं।

  • द बडी सिस्टम (Buddy System): इबोला वार्ड में कोई भी डॉक्टर या नर्स अकेले काम नहीं करता। वे हमेशा 'जोड़ों' (Pairs) में काम करते हैं। जब एक वर्कर मरीज का इलाज कर रहा होता है, तो दूसरा वर्कर बाहर से उस पर लगातार पैनी नजर रखता है। अगर काम की थकान या हड़बड़ी में कोई वर्कर गलती से अपने चेहरे को छूने लगे या उसकी पीपीई किट में कोई छोटा सा कट आ जाए, तो उसका साथी (Buddy) उसे तुरंत सचेत कर देता है।
  • पीपीई किट की भीषण गर्मी: डीआर कांगो का मौसम गर्म और उमस (Equatorial Climate) से भरा है। ऐसे में फ्लूइड-रजिस्टेंट सूट(Fluid-Resistant Suit) , डबल दस्ताने, भारी मास्क और गॉगल्स पहनना किसी टॉर्चर से कम नहीं होता। सूट पहनने के आधे घंटे के भीतर ही डॉक्टरों का पूरा शरीर पसीने से भीज जाता है। पसीना बहकर पैरों के बूट्स में जमा होने लगता है, गॉगल्स पर धुंध छा जाती है और ऑक्सीजन की कमी से चक्कर आने लगते हैं। यही वजह है कि कोई भी वर्कर एक बार में 1 से 2 घंटे से ज्यादा शिफ्ट नहीं कर पाता।
  • डिकॉन्टैमिनेशन और हटाने का जोखिम: पीपीई किट पहनने से ज्यादा खतरनाक उसे उतारना होता है। उतारते समय सूट के बाहरी हिस्से पर मौजूद वायरस अगर त्वचा से छू जाए, तो संक्रमण तय है। इसलिए किट उतारते समय एक-एक कदम पर क्लोरीन का स्प्रे किया जाता है और एक सुपरवाइजर की देखरेख में इसे बेहद सावधानी से शरीर से अलग किया जाता है।

इबोला से जुड़े कुछ जरूरी सवालों के जवाब डॉ.के. बी. बाड़ोलिया ने दिया है-

सवाल- जब इबोला के नए स्ट्रेन (जैसे बुंडिबुग्यो) की कोई स्थापित वैक्सीन नहीं है, तो एक डॉक्टर के तौर पर मरीज को बचाते वक्त आपके दिमाग में सबसे पहली प्राथमिकता क्या होती है?

डॉक्टर का जवाब- एक डॉक्टर के तौर पर, स्थापित वैक्सीन या एंटीवायरल दवा न होने पर मेरी सबसे पहली प्राथमिकता 'अग्रेसिव फ्लूइड रिससिटेशन' (Aggressive Fluid Resuscitation) यानी मरीज के शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को बनाए रखना होगी। इबोला में मौत का मुख्य कारण गंभीर उल्टी-दस्त से होने वाला डिहाइड्रेशन और ऑर्गन फेलियर है। इसलिए, तुरंत आईवी फ्लूइड्स (IV Fluids) देना, ब्लड प्रेशर को स्थिर करना और लक्षणों के आधार पर क्रिटिकल सपोर्टिव केयर देना ही मरीज को जीवनदान दे सकता है। इसके साथ ही, खुद को और पूरे मेडिकल स्टाफ को संक्रमण से सुरक्षित रखना हमारी समानांतर प्राथमिकता होती है।

सवाल- "मलेरिया, टाइफाइड और इबोला के शुरुआती लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं। आम जनता या ग्रामीण इलाकों के डॉक्टर्स बिना किसी एडवांस लैब टेस्ट के इनमें कैसे फर्क कर सकते हैं?

डॉक्टर का जवाब- ना एडवांस लैब टेस्ट के इनमें फर्क करना बेहद चुनौतीपूर्ण है, लेकिन कुछ 'क्लिनिकल सिग्नल्स' और ट्रैवल हिस्ट्री से अंतर समझा जा सकता है जैसे

  • मलेरिया: इसमें मरीज को एक निश्चित अंतराल (जैसे हर 24 या 48 घंटे) पर तेज कंपकंपी और ठंड के साथ बुखार आता है और पसीना आने पर उतर जाता है।
  • टाइफाइड: इसमें बुखार सीढ़ी की तरह (Step-ladder fashion) रोज धीरे-धीरे बढ़ता है और इसके साथ पेट दर्द, कब्ज या गंभीर सुस्ती देखी जाती है।
  • इबोला: यदि बुखार के साथ मरीज को अचानक अत्यधिक कमजोरी, गले में तेज खराश, और बिना किसी अन्य वजह के मसूड़ों, नाक या उल्टी-दस्त में खून (Bleeding) आने लगे, तो यह इबोला का बड़ा संकेत है।
  • ग्रामीण डॉक्टरों को मरीज की ट्रैवल हिस्ट्री (क्या वह प्रभावित इलाके से आया है) और लक्षणों के बढ़ने की रफ्तार पर पैनी नजर रखनी चाहिए।

सवाल- पीपीई (PPE) किट में घंटों काम करना और खुद को संक्रमित होने से बचाना मानसिक और शारीरिक रूप से कितना चुनौतीपूर्ण होता है?

डॉक्टर का जवाब- पीपीई (PPE) किट में काम करना शारीरिक और मानसिक रूप से एक कठिन परीक्षा जैसा है। भूमध्यरेखीय (Equatorial) उमस और गर्मी के बीच, इस एयर-टाइट सूट को पहनने के आधे घंटे के भीतर ही पूरा शरीर पसीने से भीज जाता है, जिससे चक्कर आने और डिहाइड्रेशन का खतरा रहता है। गॉगल्स पर धुंध छाने से देखने में दिक्कत होती है। मानसिक रूप से, सबसे बड़ा तनाव 'सेल्फ-कंटैमिनेशन' का होता है। यह डर कि अनजाने में चेहरे को छूने या किट उतारते समय एक छोटी सी चूक भी संक्रमित कर सकती है। यह निरंतर बना रहने वाला खौफ डॉक्टरों को मानसिक रूप से बुरी तरह थका देता है।

सवाल- इबोला या किसी बड़े वायरस से बचने का सबसे बड़ा 'गोल्डन रूल' क्या है?

डॉक्टर का जवाब-

  • इबोला या किसी भी बड़े वायरस से बचने का सबसे बड़ा 'गोल्डन रूल' है। "स्ट्रिक्ट हाइजीन और जीरो डायरेक्ट कॉन्टैक्ट" (सख्त स्वच्छता और सीधा संपर्क न रखना)।
  • चूंकि इबोला जैसे खतरनाक वायरस संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों (बॉडी फ्लूइड्स) या दूषित सतहों से फैलते हैं, इसलिए बिना सुरक्षा कवच (PPE) के मरीज के संपर्क में आने से बचना ही एकमात्र रास्ता है।
  • इसके अलावा, बार-बार साबुन-पानी या अल्कोहल सैनिटाइज़र से हाथ धोना और अफवाहों के बजाय प्रमाणित मेडिकल प्रोटोकॉल व आइसोलेशन के नियमों का कड़ाई से पालन करना ही वायरस की चेन को तोड़ने का सबसे अचूक हथियार है।
Published on:
05 Jun 2026 05:48 pm