
India River Drying Explainer In Hindi : हमारे लिए गंगा और ब्रह्मपुत्र सिर्फ नदियां नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान हैं, जिनसे करोड़ों लोगों की जीवनरेखा जुड़ी है। लेकिन, दोनों ही मुख्य नदियों का जलस्तर पाताल में जा रहा है। इन नदियों का ग्राउंडवाटर (भूजल) लगातार नीचे गिर रहा है। ये आंकड़े जल संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो देश की नदियां रेगिस्तान बन सकती हैं।
केंद्रीय जल आयोग (9 अप्रैल 2026) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का सबसे बड़ा गंगा बेसिन अपनी कुल क्षमता के 53.8% पर आ गया है। देश के 166 प्रमुख जलाशयों की निगरानी के बाद सामने आया है कि दक्षिण भारत में जलस्तर में सबसे तेज गिरावट हुई है।
इस साल पानी घटने की रफ्तार बहुत तेज रही है; पहले सप्ताह में कुल भंडारण 66.63% था, जो गिरकर 44.71% पर आ गया। मार्च 2024 में आयोग ने यह भी बताया था कि महानदी और पेन्नार के बीच पूर्व की ओर बहने वाली 13 नदियों का जल भंडारण पूरी तरह शून्य (0) हो गया था।
गंगा नदी पर शोध टीम (NAT Geo और WII) का हिस्सा रहीं सुनंदा भोला बताती हैं, "गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसी लाइफलाइन नदियों के जल का पाताल में जाना, कई राज्यों की बड़ी नदियों का सूख जाना और जल भंडारण क्षमता का घट जाना, एक बड़े जल संकट की ओर इशारा कर रहा है। हमारा जीवन इतिहास से लेकर आजतक नदियों के जल पर ही टिका है। अगर इन्हें समय रहते बचाया नहीं गया, तो हमारा बच पाना भी संभव नहीं हो पाएगा।"
भोला कहती हैं कि मैनचेस्टर विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक मेहबूब सहाना ने अपने शोध में बताया है कि पिछले 1,300 वर्षों के स्ट्रीमफ्लो (जलप्रवाह) रिकॉर्ड के पुनर्निर्माण (Reconstruction) से पता चलता है कि गंगा बेसिन ने हाल के कुछ दशकों में अपने सबसे भयंकर सूखे का सामना किया है। गंगा का मुख्य स्रोत, गंगोत्री ग्लेशियर पिछले दो दशकों में लगभग एक किलोमीटर सिकुड़ गया है। गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन दुनिया के उन क्षेत्रों में से एक है, जहां भूजल सबसे तेजी से खत्म हो रहा है; यहां भूजल स्तर हर साल 15 से 20 मिलीमीटर नीचे जा रहा है।
वह अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं, "हमने ग्लेशियर से लेकर देश में जहां-जहां गंगा जाती हैं, वहां और फिर बांग्लादेश में रहकर शोध किया। गंगा में माइक्रोप्लास्टिक से लेकर अन्य प्रदूषण बहुत अधिक हैं। कई जगहों पर गंगा जैसी बड़ी नदी सिकुड़कर किसी नहर से भी छोटी हो चुकी है। गंगा का जलप्रवाह भी लगातार कम हो रहा है।"
वहीं सहाना का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, मानसून का बदलना, बेतहाशा भूजल दोहन और फरक्का बैराज जैसी मानव निर्मित परियोजनाओं ने मिलकर गंगा जैसी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को खतरे में डाल दिया है।
भोला आम भाषा में समझाते हुए कहती हैं, "कानपुर जाइए तो वहां देखने को मिलता है कि चमड़ा उद्योग या अन्य कारखानों का गंदा पानी सीधे गंगा नदी में आ रहा है। इसी तरह के अन्य प्रकार के प्रदूषण भी हो रहे हैं। प्लास्टिक के कचरे ने नदी को जकड़ रखा है। यह कचरा नदी को जिंदा रखने वाले जीवों को खत्म कर रहा है, इसीलिए नदियां सूख रही हैं।"
देश के 166 प्रमुख जलाशयों की निगरानी के बाद सामने आया है कि दक्षिण भारत में जलस्तर में सबसे तेज गिरावट हुई है।
वह कहती हैं, "गंगा नदी को बचाना सबसे जरूरी है। इसके लिए केवल शोध करने से काम नहीं चलेगा। हमें एक 'एक्शनेबल प्लान' (धरातल पर लागू होने वाली योजना) पर काम करना होगा और समय-समय पर उसकी निगरानी करनी होगी, ताकि यह पता चल सके कि एक्शन प्लान काम कर रहा है या नहीं। यह केवल सरकार के स्तर पर नहीं, बल्कि समाज और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने से ही संभव होगा; जैसे- नदियों में कचरा न फेंकना, सिंचाई के लिए जरूरत के मुताबिक ही जल का उपयोग करना, रेन वाटर हार्वेस्टिंग आदि।"
बांग्लादेश को नदियों का देश भी कहा जाता है। हमें अपने पड़ोसी देशों- बांग्लादेश, नेपाल आदि के साथ मिलकर पानी के प्रबंधन पर योजना बनानी होगी, ताकि उसके जरिए नदियों को रिचार्ज किया जा सके। एक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिससे राज्यों की बड़ी नदियों को भी बचाया जा सके।
अगर पानी बचाना है और गंगा को निरंतर बहते हुए देखना है, तो एक्शन प्लान को पूरी ईमानदारी से फॉलो करना होगा।