PM Narendra Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों सोना से लेकर गैस, तेल तक के खर्च पर देश के लोगों से अपील की। इस अपील के बाद देश में एक नई बहस छिड़ चुकी है। आइए हम इस बहाने यह जानने की कोशिश करते हैं कि दुनिया में हम सोना, शादी, खाना, विदेश घूमना, सेहत, शिक्षा पर खर्च करने में कहां ठहरते हैं।
PM Modi Appeal to Nation: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खर्च पर संयम और कटौती करने की अपील कर एक नई बहस छेड़ दी है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से भारत एक है। भारतीय अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक सिर्फ कृषि, उत्पादन, उद्योग और निर्यात के संदर्भ में देखा जाता रहा, लेकिन आज उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। अब किसी भी देश की आर्थिक ताकत का अंदाजा सिर्फ उसके उत्पादन से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वहां के नागरिक किस क्षेत्र में कितना खर्च कर रहे हैं। इस पहलु को आर्थिक तरक्की में जोड़कर देखने के बाद यह भी पता चलता है कि हमारे देश के लोगों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। भारतीयों की पहले की तुलना में उपभोग का स्वरूप अधिक विविध तथा आधुनिक होता जा रहा है।
इस रिपोर्ट में हम दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में सोना, एलपीजी, खाद्य तेल, ग्रॉसरी, विदेश यात्रा, रेस्टोरेंट, विवाह, फैशन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे 10 प्रमुख क्षेत्रों में भारतीयों की खर्च की स्थिति का विश्लेषण करेंगे।
भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं बल्कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। दुनिया में सोना का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश चीन है। चीना के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना का उपभोक्ता है। भारतीय परिवार अपनी बचत का बड़ा हिस्सा सोना में निवेश करते हैं। सोना के मामले में ग्रामीण और मध्यम वर्ग की दीवानगी देखी जा सकती है। सोने की मांग विवाह, संस्कार और त्योहारों में बहुत बढ़ जाती है।
सोना में निवेश सबसे सुरक्षित माना जाता है। हालांकि इसके चलते देश का सोना का आयात अत्यधिक बढ़ जाता है, जिसके चलते विदेशी मुद्रा पर भार बढ़ जाता है। भारत का भारी मात्रा सोना का आयात व्यापार घाटे को भी प्रभावित करता है। इसके बावजूद भारतीय समाज में सोने का भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व इतना गहरा है कि इसकी मांग लगातार बनी रहती है। वर्ष 2024-25 में चीन में सोने की खरीद 815 टन रही, जबकि भारत में 802 टन।
चीन - 80
भारत - 72
अमेरिका - 18
तुर्किये - 10
रूस - 7
(आंकड़े अरब डॉलर में)
भारत में ग्रामीण और शहरी इलाकों में पारंपरिक ऊर्जा उपभोग कम होने के बाद यहां एलपीजी की खपत बहुत ज्यादा बढ़ गई। सरकार की उज्ज्वला योजना जैसी पहलों ने ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी के उपयोग को बढ़ावा दिया है। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम हुई। अब भारत एलपीजी की खपत के मामले में दुनिया के बड़े देशों में शामिल हो गया। हालांकि, इसके चलते एलपीजी का आयात बढ़ गया। भारत अपनी एलपीजी की जरूरतों का 60 प्रतिशत तक आयात करता है। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता है। मध्य पूर्व संकट के चलते पैदा हुआ ऊर्जा का यह संकट सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक बड़ी चुनौती के तौर पर उभरकर सामने आया है। भारत को आने वाले वर्षों में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, जैव ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा पर अधिक ध्यान देना होगा।
चीन - 45
अमेरिका - 32
भारत - 16
रूस - 14
सऊदी अरब - 8
(आंकड़े अरब डॉलर में)
भारत में खाद्य तेल की खपत तेजी से बढ़ती जा रही है। भारत में शहरीकरण के चलते तेल की खपत में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। बच्चों, युवाओं के बीच पैकेज्ड फूड के उपभोग की बढ़ती संस्कृति ने इसकी मांग को बढ़ाया है। भारतीय प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ टन खाद्य तेल का उपभोग करते हैं। देश में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की सालाना खपत लगभग 17.5 किलो यानी 19 लीटर है।
भारत में अत्यधिक तेल के सेवन से मोटापा और कई तरह की बीमारियों की वजह बन रहा है। देश में मधुमेह और हृदय संबंधी रोगियों की संख्या में बहुत ज्यादा बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से अपील करते हुए कहा कि वे खाद्य तेलों में 10 फीसदी की कटौती करें। यही वजह है कि भारत को दूसरे देशों से खाद्य तेल विशेषकर पाम ऑयल का बड़े पैमाने पर आयात करना होता है। इससे कृषि नीति और विदेशी व्यापार पर दबाव पड़ता है। भारतीय एक साल में ढाई करोड़ टन खाद्य तेल खा जाते हैं।
चीन - 4.2
भारत - 2.5
अमेरिका - 1.5
इंडोनेशिया - 1.1
ब्राजील - 1.0
(तेल की खपत करोड़ टन में)
भारत ग्रॉसरी खर्च के मामले में तेजी से उभरता हुआ बाजार है। देश में प्रति व्यक्ति बढ़ती आय, शहरीकरण और डिजिटल पेमेंट के चलते किराना और सुपरमार्केट संस्कृति मजबूत हो रही है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और क्विक-कॉमर्स सेवाओं ने खरीदारी के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। अब उपभोक्ता सिर्फ जरूरत के लिए नहीं बल्कि सुविधा और ब्रांड वैल्यू के आधार पर भी खरीदारी करने लगे हैं। ग्रॉसरी से जुड़ी कंपनियां भी उपभोक्ताओं के लिए अपने प्रोडक्ट पर तरह—तरह के लुभावने ऑफर देती रहती है, ताकि खरीद को बढ़ावा मिले। भारत में ग्रॉसरी खर्च की वार्षिक वृद्धि लगभग 7.5% आंकी गई है। यह परिवर्तन भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोग आधारित विकास को दर्शाता है। आगामी वर्षों में संगठित रिटेल और ऑनलाइन ग्रॉसरी सेक्टर और अधिक विस्तार करेगा।
अमेरिका - 1170
चीन - 1080
भारत - 780
जर्मनी - 630
ब्राजील - 500
भारत में पिछले कुछ दशकों में नया मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ है। यह वर्ग पारंपरिक जीवन के साथ बाहर खाने और देश और विदेशों में घूमने जाने लगे हैं। मध्यम वर्ग की आय में बढ़ोतरी के साथ विदेश यात्रा का चलन भी तेजी से बढ़ा है। पहले विदेश यात्रा का मतलब उच्च और शिक्षित वर्ग तक सीमित थी, लेकिन अब मध्यम वर्ग भी पर्यटन, शिक्षा और व्यवसाय के लिए विदेश जा रहा है।
विदेश घूमने जाने वाले देशों में भारत 10वें पायदान पर है। एयर कनेक्टिविटी, डिजिटल वीजा प्रक्रियाएं, वीजा ऑन अराइवल और पर्यटन उद्योग के विस्तार ने विदेश यात्रा को आसान बना दिया है। वर्ष 2024 में भारतीयों ने विदेश यात्राओं पर लगभग 3.08 करोड़ यात्राएं दर्ज कीं। भारतीयों ने वर्ष 2024 में 35 बिलियन डॉलर विदेशी यात्राओं पर खर्च किए जबकि चीन ने हमने लगभग 7 गुना ज्यादा।
चीन - 250.6
अमेरिका - 178
जर्मनी - 120
ब्रिटेन - 119
फ्रांस - 60
भारत - 35 (10वें स्थान पर)
देश में घर से बाहर खाना खाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी, कामकाजी परिवार और शहरी जीवनशैली ने फूड डिलीवरी तथा रेस्टोरेंट उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। ऑनलाइन फूड ऑर्डरिंग ऐप्स ने इस संस्कृति को और हवा दी है। अब भोजन सिर्फ पेट भरने की जरूरत नहीं बल्कि तरह-तरह के जायका का अनुभव लेने और मनोरंजन का हिस्सा बन चुका है। भारतीय अब विभिन्न प्रकार के व्यंजन, अंतरराष्ट्रीय भोजन और कैफे संस्कृति को जीवन का हिस्सा मानने लगे हैं। जाहिर है कि इससे रोजगार के अवसर तो बढ़े ही हैं और इसके साथ ही होटल, पर्यटन और फूड प्रोसेसिंग उद्योग को इससे बड़ा लाभ मिला है। नतीजे के तौर पर भारत में होटल-रेस्टोरेंट में खाने-पीने पर प्रति व्यक्ति औसत खर्च लगभग 3,900 रुपये सालाना हो गया है।
अमेरिका - 1400
चीन - 884
जर्मनी - 139
यूके - 102
फ्रांस - 91
भारत - 70 (8वें स्थान पर)
भारत में विवाह केवल सामाजिक आयोजन नहीं बल्कि एक विशाल आर्थिक गतिविधि है। कपड़े, आभूषण, होटल, खानपान, सजावट, फोटोग्राफी और यात्रा जैसे कई उद्योग विवाह बाजार से जुड़े हैं। भारत और चीन मिलकर वैश्विक विवाह खर्च का लगभग आधा हिस्सा रखते हैं। लॉन्गेविटी वेडिंग मार्केट’ में भारत और चीन की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग आधी मानी जाती है।
भारतीय विवाहों में भव्यता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन महत्वपूर्ण माना जाता है। कई परिवार अपनी आय से अधिक खर्च करते हैं। इससे आर्थिक दबाव भी उत्पन्न होता है। हालांकि विवाह उद्योग लाखों लोगों को रोजगार देता है और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करता है।
चीन - 170
भारत - 130
अमेरिका - 70
जापान - 30
यूके - 15
भारत फैशन खर्च में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल हो चुका है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग और बढ़ती ब्रांड जागरूकता ने फैशन बाजार को तेजी से बढ़ाया है। युवा पीढ़ी अब फैशन को पहचान और व्यक्तित्व से जोड़कर देखती है।भारतीय फैशन उद्योग केवल पश्चिमी परिधानों तक सीमित नहीं है। पारंपरिक भारतीय वस्त्रों का भी बड़ा बाजार है। त्योहारों और विवाहों के दौरान कपड़ों पर भारी खर्च किया जाता है। ऑनलाइन फैशन प्लेटफॉर्म ने छोटे शहरों तक ब्रांडेड उत्पादों की पहुँच बढ़ा दी है। वैश्विक फैशन खर्च का लगभग 35% हिस्सा ऑनलाइन माध्यम से आता है।
अमेरिका - 365
चीन - 302
भारत - 105
जापान - 95
जर्मनी - 75
हालांकि भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन शिक्षा पर खर्च अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है। यह चिंता का विषय है क्योंकि किसी भी देश की दीर्घकालिक प्रगति शिक्षा और कौशल विकास पर निर्भर करती है। शिक्षा में भारत का व्यय जीडीपी के अनुपात में अभी भी विकसित देशों से कम है। देश की जीडीपी के हिसाब से आइसलैंड 8.22 फीसदी खर्च करता है।
भारत में निजी शिक्षा का विस्तार तेजी से हुआ है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुँच अभी भी चुनौती बनी हुई है। उच्च शिक्षा, रिसर्च और तकनीकी प्रशिक्षण में अधिक निवेश की आवश्यकता है। यदि भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में अग्रणी बनना है तो शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी दोनों निवेश बढ़ाने होंगे।
अमेरिका - 1300
चीन - 750
जापान - 250
जर्मनी - 230
भारत - 180
(आंकड़े अरब डॉलर में)
स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत का खर्च विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। अमेरिका भारत से लगभग 14 गुना अधिक खर्च करता है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा अभी भी निजी क्षेत्र पर निर्भर है, जिसके कारण आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि मजबूत स्वास्थ्य ढांचा कितना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महंगे इलाज जैसी समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं। आने वाले समय में भारत को स्वास्थ्य बजट बढ़ाने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता होगी। भारत में औसत वार्षिक स्वास्थ्य खर्च लगभग 14,775 डॉलर प्रति व्यक्ति की तुलना में अमेरिका में कहीं अधिक है। वर्ष 2024–25 के अनुमान के अनुसार, अमेरिका में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च लगभग 14,800 से 15,500 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष रहा।
अमेरिका - 4900
चीन - 1300
जर्मनी - 600
जापान - 550
फ्रांस - 400
भारत - 370 (7वें स्थान पर)
(खर्च अरब डॉलर में)
इन आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि भारत तेजी से उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था बन रहा है। दूसरा यह कि भारतीय मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति लगातार बढ़ रही है। तीसरा, पारंपरिक और आधुनिक दोनों प्रकार के खर्च एक साथ बढ़ रहे हैं।