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Open Drain Deaths : “बाबूजी जरा बचके…”, देश में खुले नालों के कारण हर दिन 2 मौतें; करीब 5 साल बाद भी नहीं सुधरे हालात

Open Drain Deaths In India Explainer : खुली नालियां किस तरह से लोगों को निगल रही हैं। कैसे एक पल में हंसता-खेलता आदमी या बच्चा मौत के मुंह में समा जाता है और सिस्टम तमाशा देखता है; इस गंभीर और संवेदनशील मसले को पत्रिका स्पेशल की रिपोर्ट में समझिए।

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Jun 12, 2026
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Open Drain Deaths special report | प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- Gemini AI and Patrika

Open Drain Deaths In India: भारत के गली-मुहल्लों और सड़कों के किनारे खुली बहती ये नालियां किसी "कब्रगाह" से कम नहीं हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) इन्हें दुर्घटना में होने वाली मौतों के रूप में दर्ज करता है। ब्यूरो के आंकड़ों का विशलेषण करने पर विशेषज्ञों ने पाया कि साल 2015 से 2020 के बीच खुले गड्ढों और मैनहोल में गिरने से 5,393 लोगों की मौत हुई। विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में हर 12 घंटे में एक मौत इसी वजह से होती है। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि देश के बुनियादी ढांचे की एक गंभीर और जानलेवा खामी को उजागर करता है।

Photo: 2026 के एक ही महीने के भीतर की इन खबरों को देखिए-

अगर आप इन स्क्रीनशॉट को देखें, तो समझ आता है कि खुली नालियों में गिरने से आज भी हर दिन मौतें हो रही हैं। इसके बावजूद जमीनी हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं।

मौत का मीटर: खौफनाक आंकड़े

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- Gemini AI
  • 5,393 मौतें: सिर्फ 5 सालों के भीतर (NCRB)
  • हर 12 घंटे में: देश में एक इंसान खुले नाले या मैनहोल का शिकार हो रहा है।
  • हर 24 घंटे में: औसतन 2 हंसते-खेलते परिवार उजड़ रहे हैं।

ये हादसे बताते हैं कि कैसे हंसता-खेलता बच्चा, बाइक से घर लौटता युवक या सड़क पर टहल रहा कोई आम इंसान एक ही झटके में इन खुले नालों में समा जाता है। एक ही पल में एक खुशहाल परिवार सिस्टम की लापरवाही के कारण हमेशा के लिए बिखर जाता है।

आखिर हम सिस्टम पर सवाल क्यों उठा रहे हैं? इस बात को समझने के लिए जरा नीचे दिए गए अन्य आंकड़ों पर गौर करिए। आपको अंदाजा हो जाएगा कि तमाम मीडिया रिपोर्ट्स, रिसर्च और अदालती आदेशों के बाद भी जिम्मेदार संस्थान कैसे मूकदर्शक बने हुए हैं।

खुली नालियों से गंभीर बीमारियों का खतरा

इंडिया वाटर पोर्टल (India Water Portal) पर प्रकाशित एक शोध लेख के मुताबिक, खुले नाले सिर्फ लोगों की जान नहीं ले रहे, बल्कि कई गंभीर बीमारियों को भी जन्म दे रहे हैं।

भारत के 37.5% घरों के बाहर खुली नालियां

भारत के 720 जिलों पर किए गए इस अध्ययन से पता चलता है कि देश के आधे से अधिक जिलों में 42 प्रतिशत से ज्यादा घरों के बाहर खुली नालियां मौजूद हैं। पूरे देश का औसत देखें तो सबसे अधिक 37.5 प्रतिशत घरों के सामने खुली नालियां हैं, जबकि बंद नालियों का प्रतिशत केवल 33.9 है।

शोध रिपोर्ट के अनुसार, 'स्वच्छ भारत अभियान' और 'जल जीवन मिशन' के तहत देश को बड़ी सफलता मिली है। इसके कारण 86 प्रतिशत घरों में नल का पानी पहुंच गया है और बिना शौचालय वाले घर 18 प्रतिशत से कम रह गए हैं। इसके बावजूद, साल 2021 तक भारत में केवल 7.1 प्रतिशत लोग ही पाइप वाले सीवर नेटवर्क से जुड़े थे, जबकि 75 प्रतिशत आबादी सेप्टिक टैंक या गड्ढों पर ही निर्भर थी।

इन बीमारियों का बढ़ता खतरा

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अपशिष्ट (वेस्ट) ले जाने वाले टैंकरों की कमी के कारण ये सेप्टिक टैंक अक्सर ओवरफ्लो हो जाते हैं और इनका गंदा पानी खुली नालियों में बहने लगता है। बारिश के दिनों में जब इन खुली नालियों का पानी सड़कों पर फैलता है, तो बच्चों में हैजा, टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों के साथ-साथ सांस से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

सुप्रीम कोर्ट और NGT के सख्त आदेश

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT): एनजीटी का स्पष्ट आदेश है कि खुले नालों से फैलने वाली गंदगी, जहरीली गैसों और बीमारियों को रोकना स्थानीय प्रशासन (नगर निगम/नगर पालिका) की वैधानिक जिम्मेदारी है।
  • सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट: नालियों को ढकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक निकायों को सख्त निर्देश दिए हैं। 'रोड सेफ्टी कमेटी' और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने खुले नालों, मैनहोल्स और जलभराव वाले क्षेत्रों को नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना है।
  • अनिवार्य सुरक्षा उपाय: अदालती आदेशों के अनुसार, सड़कों, खुले नालों और मैनहोल्स के कारण होने वाले हादसों को रोकने के लिए उचित बैरिकेडिंग (घेराबंदी) और सुरक्षात्मक उपाय करना अनिवार्य है।
  • राज्यों का कड़ा रुख: गुवाहाटी और केरल जैसे कई राज्यों के उच्च न्यायालयों ने स्थानीय निकायों और पीडब्ल्यूडी (PWD) को सख्त आदेश दिए हैं कि शहरी क्षेत्रों में नागरिकों, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी खुले नालों and मैनहोल्स को तुरंत ढका जाए।

"बाबूजी जरा बचके…" से 'सस्टेनेबल समाधान' तक

अक्सर रेलवे स्टेशनों या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर आपने यह लिखा देखा होगा- "अपने जान-माल की सुरक्षा स्वयं करें।" आज के दौर में सड़क पर चलते समय भी आपको यह लाइन याद रखनी होगी। जब तक सिस्टम नहीं सुधरता, तब तक हमें खुद ही इन जानलेवा नालियों से सुरक्षित दूरी बनाकर चलनी होगी।

अगर आपके घर के आसपास नालियां खुली हैं, तो बच्चों को वहां खेलने से रोकें। अक्सर बच्चे खेलते समय इनमें गिर जाते हैं और समय पर पता न चलने के कारण दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- Gemini AI
  1. जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनें

अपने इलाके के खुले नालों और मैनहोल्स की जानकारी तुरंत स्थानीय प्रशासन (पंचायत, नगर निगम या PWD) को दें। केंद्र सरकार के आधिकारिक Swachhata-MoHUA App पर आप ऐसे खुले नालों की फोटो खींचकर शिकायत दर्ज कर सकते हैं। ऐप जीपीएस लोकेशन के जरिए शिकायत को सीधे संबंधित अधिकारी तक पहुंचाता है, जहां तय समय सीमा के भीतर कार्रवाई करना अनिवार्य होता है।

  1. स्मार्ट टेक्नोलॉजी: विदेशों की तर्ज पर 'स्मार्ट मैनहोल सेंसर्स'

अक्सर देखा जाता है कि कंक्रीट के ढक्कन चोरी हो जाते हैं या भारी बारिश में बह जाते हैं। अब समय आ गया है कि भारतीय शहरों और कस्बों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) पर आधारित 'स्मार्ट ड्रेनेज मॉनिटरिंग सिस्टम' अपनाया जाए।

इन सेंसरों को मैनहोल के ढक्कन के नीचे फिट किया जाता है। जैसे ही कोई ढक्कन अपनी जगह से हटता है या नाले में पानी का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ता है, यह सेंसर तुरंत स्थानीय नगर निगम के कंट्रोल रूम और वार्ड पार्षद को जीपीएस लोकेशन के साथ अलर्ट एसएमएस (SMS) भेज देता है। Nevon Projects की IoT Based Manhole Detection Research जैसी तकनीकें बेहद कम लागत में इन बड़े हादसों को रोक सकती हैं।

  1. कानूनी कार्रवाई: जब लापरवाही बन जाए 'क्रिमिनल नेग्लिजेंस'

अदालतों ने अब साफ कर दिया है कि ऐसी मौतें कोई सामान्य 'हादसा' नहीं बल्कि आपराधिक लापरवाही हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने गाजीपुर में एक खुले नाले में गिरने से हुई मां-बेटे की मौत के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए Delhi High Court Orders Rs 20 Lakh Compensation के तहत संबंधित अथॉरिटी पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।

ऐसे मामलों में नागरिक चुप न बैठें। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 (लापरवाही से मौत का कारण बनना) के तहत जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज कराई जा सकती है।

जब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर सीधी कानूनी गाज नहीं गिरेगी, तब तक ये मौतें नहीं रुकेंगी। सोया हुआ सिस्टम पूरी तरह से कब जागेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन तब तक के लिए अपनी सुरक्षा आपके हाथ में है। इसलिए सड़क पर निकलते ही याद रखिए - "बाबूजी जरा बचके…"