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Noise Pollution : डीजे, लाउडस्पीकर और आधी रात का शोर: ध्वनि प्रदूषण में राजस्थान नंबर 1 क्यों? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

Noise Pollution: शादियों का जश्न कहीं किसी के लिए उम्र भर का दर्द न बन जाए! NCRB की रिपोर्ट में राजस्थान ध्वनि प्रदूषण में नंबर-1 आया है। ई.एन.टी. विशेषज्ञ डॉ. राकेश सिंह मीणा की मानें तो 100 डेसिबल से ऊपर का यह शोर युवाओं को वक्त से पहले बहरा बना रहा है। देर रात तक बजने वाले इन लाउडस्पीकर्स पर कानून क्या कहता है और आप इस 'साइलेंट किलर' से खुद को कैसे बचाएं, पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

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May 24, 2026
डीजे की तेज आवाज से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। (Photo: AI Generated)

Noise Pollution : राजस्थान को अपनी रंगीली संस्कृति, मेहमान नवाजी और शाही शादियों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा 'क्राइम इन इंडिया' रिपोर्ट ने प्रदेश की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने सबको चौंका दिया है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश में दर्ज होने वाले कुल ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) के मामलों में से लगभग 95 फीसदी मामले अकेले राजस्थान से हैं।

साल 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में ध्वनि प्रदूषण अधिनियम के तहत दर्ज कुल मामलों में से 8,264 मामले केवल राजस्थान में दर्ज किए गए। इस सूची में दूसरे नंबर पर मौजूद मध्य प्रदेश (MP) में यह आंकड़ा महज 334 था, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में सिर्फ 17 मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा पहली नजर में डराता भी है और कई सवाल भी खड़े करता है। क्या वाकई राजस्थान देश का सबसे 'शोरगुल' वाला राज्य बन चुका है? या फिर इस कहानी का कोई दूसरा प्रशासनिक पहलू भी है? आइए इस पूरी रिपोर्ट का हर वो पहलू समझते हैं, जो हर नागरिक और नीति-निर्माता के लिए जानना जरूरी है।

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क्या राजस्थान वाकई सबसे ज्यादा शोर पैदा कर रहा है?

इस डेटा का विश्लेषण करने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और पर्यावरण विशेषज्ञों का एक बिल्कुल अलग नजरिया सामने आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस भारी अंतर का मतलब यह कतई नहीं है कि राजस्थान के लोग देश में सबसे ज़्यादा शोर मचा रहे हैं, बल्कि इसके पीछे प्रशासनिक मुस्तैदी और सख्त रिपोर्टिंग है।

  • राजस्थान पुलिस की 'जीरो टॉलरेंस' और स्पेशल ड्राइव: साल 2024 के दौरान राजस्थान पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर प्रदेश के बड़े शहरों जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अजमेर में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ विशेष अभियान (Special Drives) चलाए गए। पुलिस थानों को स्पष्ट निर्देश थे कि यदि रात 10 बजे के बाद सुप्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन कर डीजे या लाउडस्पीकर बजाया जाता है, तो बिना किसी ढिलाई के आधिकारिक एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए और उपकरण ज़ब्त किए जाएं।
  • कागज़ी कार्रवाई' बनाम 'मौके पर रफ़ा-दफ़ा : देश के कई अन्य राज्यों में देर रात तक बजने वाले डीजे या लाउडस्पीकर की शिकायत पर पुलिस मौके पर जाकर केवल चेतावनी देकर या साउंड सिस्टम बंद करवाकर लौट जाती है। उन मामलों को आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं किया जाता। इसके विपरीत, राजस्थान में इन शिकायतों को बकायदा कानून की धाराओं के तहत दर्ज किया गया। यही वजह है कि राजस्थान के आंकड़े आसमान छूते दिख रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों में स्थिति धरातल पर वैसी ही होने के बावजूद कागज़ों पर 'शांति' नज़र आ रही है।
  • जागरूक जनता और सामुदायिक पुलिसिंग : राजस्थान के शहरी इलाकों में हाल के वर्षों में सोशल मीडिया, पुलिस के डिजिटल हैंडल्स और व्हाट्सएप हेल्पलाइन के जरिए शिकायत दर्ज कराने का चलन तेजी से बढ़ा है। रात 11 बजे के बाद बजने वाले डीजे की शिकायत लोग तुरंत ट्विटर (X) या कंट्रोल रूम को देते हैं, जिससे पुलिस को मजबूरन मौके पर जाकर कानूनी कार्रवाई करनी पड़ती है।

शादियां, डीजे और धार्मिक आयोजन सबसे ज्यादा पैदा करते हैं शोर

एनसीआरबी की रिपोर्ट में इस बात का भी साफ ज़िक्र है कि दर्ज किए गए 8,264 मामलों में से अधिकांश मामले किन वजहों से हुए। रिपोर्ट के अनुसार, ध्वनि प्रदूषण के तीन मुख्य स्रोत रहे हैं:

  • कमर्शियल हाई-डेसिबल डीजे सिस्टम: शादियों और निजी पार्टियों में इस्तेमाल होने वाले हैवी बेस (Bass) वाले डीजे, जो तय सीमा से दोगुने से भी अधिक शोर पैदा करते हैं।
  • शादी के जुलूस (बारात): आधी रात के बाद सड़कों पर निकलने वाली बारातें, जिनमें बिना अनुमति के शक्तिशाली साउंड एम्पलीफायर्स का उपयोग किया जाता है।
  • धार्मिक और सामाजिक समारोह: बिना पूर्व अनुमति और बिना साउंड लिमिटर के देर रात या तड़के (सुबह) लाउडस्पीकर का अत्यधिक तेज आवाज में इस्तेमाल।

मेडिकल साइंस की चेतावनी: यह सिर्फ शोर नहीं,'साइलेंट किलर' है

अक्सर लोग ध्वनि प्रदूषण को सिर्फ एक अस्थाई परेशानी मानकर नज़रअंदाज कर देते हैं। लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों का मानना है कि यह स्थिति राजस्थान के नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है। आइए जानते हैं कि डॉक्टरों के मुताबिक यह शोर हमारे शरीर को किस तरह खोखला कर रहा है।

  • कानों के पर्दे और सुनने की क्षमता पर आघात (ENT Perspective) : रिहायशी (Residential Area) इलाकों में रात के समय ध्वनि की सीमा 45 से 55 डेसिबल तय है। लेकिन डीजे सिस्टम 100 से 130 डेसिबल तक की आवाज पैदा करते हैं। ईएनटी (ENT) विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी तेज आवाज के संपर्क में आने से कान की नसें हमेशा के लिए डैमेज हो सकती हैं। कई बार लोग शादियों से लौटने के बाद कानों में लगातार सीटी बजने (Tinnitus) की शिकायत करते हैं। यदि यह शोर लगातार मिले, तो इंसान हमेशा के लिए बहरा हो सकता है।
  • दिल के मरीजों के लिए जानलेवा (Cardiologist Warning) : जब डीजे का 'हैवी बेस' बजता है, तो उसकी तरंगें छाती में कंपन पैदा करती हैं। हृदय रोग विशेषज्ञों (Cardiologists) का कहना है कि अचानक होने वाला यह तेज़ शोर शरीर में 'स्ट्रेस हार्मोन' (Adrenaline) का स्तर तुरंत बढ़ा देता है। इससे दिल की धड़कन (Arrhythmia) अनियंत्रित हो सकती है और ब्लड प्रेशर अचानक शूट कर जाता है। बुजुर्गों और दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति हार्ट अटैक का कारण भी बन सकती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार में चिड़चिड़ापन (Mental Health Expert View) : लगातार शोर के बीच रहने से इंसान के नर्वस सिस्टम पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। देर रात तक होने वाले शोर के कारण जब लोगों की नींद पूरी नहीं होती (Sleep Deprivation), तो उनमें एंग्जायटी, क्रोनिक स्ट्रेस और अवसाद (Depression) के लक्षण दिखने लगते हैं। इसके अलावा, परीक्षाओं के दिनों में बच्चों की एकाग्रता पूरी तरह भंग हो जाती है, जिससे उनका शैक्षणिक प्रदर्शन गिरता है।

Government Rules & Regulation: क्या कहता है देश का कानून और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन?

भारत के संविधान और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं, जिन्हें 'ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' कहा जाता है। इसके तहत :

  • नाइट कर्फ्यू (रात 10 से सुबह 6 बजे): रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच खुले में लाउडस्पीकर, डीजे या किसी भी तरह के एम्पलीफायर बजाने पर पूर्ण प्रतिबंध है (केवल ऑडिटोरियम या कॉन्फ्रेंस हॉल जैसे बंद कमरों को छोड़कर)।
  • ज़ोन के हिसाब से डेसिबल की सीमा: इंडस्ट्रियल एरिया में दिन में 75 dB / रात में 70 dB
  • कमर्शियल एरिया: दिन में 65 dB / रात में 55 dB
  • रिहायशी एरिया: दिन में 55 dB / रात में 45 dB
  • साइलेंस ज़ोन (अस्पताल/स्कूल): दिन में 50 dB / रात में 40 dB
  • सजा का प्रावधान: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 15 के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर 5 साल तक की जेल या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। पुलिस को बिना वारंट के साउंड सिस्टम जब्त करने का अधिकार है।

दूसरा पक्ष: डीजे ऑपरेटरों और वेडिंग इंडस्ट्री की मजबूरी

कानूनी सख्ती और नियम नहीं मानने वाले ग्राहकों के चलते राजस्थान के डीजे ऑपरेटर्स दोहरा दबाव महसूस कर रहे हैं।

  • ग्राहकों का दबाव: शादी के दौरान कई रस्मों में देरी होने के चलते संगीत या शादी की रात डांस करने वाले युवक - युवतियां डीजे वालों को रात 10 बजे के बाद भी चालू रखने का दबाव बनाते हैं। डीजे वालों के नियम मानने पर कई बार ग्राहकों के साथ विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
  • रोज़ी-रोटी का संकट: डीजे ऑपरेटरों के उपकरण लाखों रुपये के होते हैं। पुलिस के सामान जब्त किए जाने के बाद उनका पूरा सीजन खराब हो जाता है।

आगे की राह: कैसे थमेगा यह शोर?

NCRB की रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि राजस्थान ने समस्या को स्वीकार करने और उस पर कागजी कार्रवाई करने में तो बाजी मार ली है, लेकिन क्या महज़ मुकदमे दर्ज करने से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है?

ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए केवल पुलिस की लाठी या अदालती जुर्माना काफी नहीं है। इसके लिए एक त्रिस्तरीय समाधान (Three-Way Solution) की आवश्यकता है:

  • साउंड लिमिटर अनिवार्य हों: प्रशासन को सभी कमर्शियल साउंड सिस्टम्स में 'इन-बिल्ट साउंड लिमिटर' लगाना अनिवार्य कर देना चाहिए, जिससे उपकरण चाहकर भी तय डेसिबल से अधिक आवाज पैदा न कर सके।
  • सामाजिक चेतना: नागरिकों को यह समझना होगा कि हमारी खुशियां (शादी, बारात, उत्सव) किसी बीमार बुज़ुर्ग, नवजात बच्चे या पढ़ाई कर रहे छात्र के लिए मानसिक प्रताड़ना न बनें।
  • साइलेंस ज़ोन की सख्त घेराबंदी: अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के 100 मीटर की दूरी (लगभग 328.08 फीट) के दायरे में लाउडस्पीकर बजाने वालों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के तुरंत और सबसे कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए।

पत्रिका की खास बातचीत डॉ. राकेश सिंह मीणा के साथ

क्या आपके पास ऐसे मामले आते हैं जहां शादी या किसी इवेंट के बाद लोग 'टिनिटस' या आंशिक बहरेपन की शिकायत लेकर आते हैं? क्या इनसे स्थाई नुकसान हो सकता है?

हां, हमारे पास ऐसे कई मामले आते हैं। शादियों और पार्टियों के सीजन में अचानक तेज डीजे (100–120 डेसिबल) के संपर्क में आने से युवाओं और बच्चों में 'टिनिटस' (कानों में लगातार सीटी या सां-सां की आवाज़ आना) और आंशिक बहरापन (Temporary Hearing Loss) बहुत आम हो चुका है। रही बात हमेशा के लिए नुकसान की, तो हां, यह बहरापन स्थाई (Permanent) भी हो सकता है। अगर कोई इंसान बहुत देर तक या बहुत पास से तेज़ बेस (Bass) वाले साउंड ब्लास्ट के संपर्क में रहता है, तो कान के अंदर की बेहद नाजुक नसें और 'हेयर सेल्स' हमेशा के लिए डैमेज हो जाते हैं। यदि शोर के बाद 48 घंटे तक कानों का भारीपन या सीटी बजना बंद न हो, तो बिना लापरवाही तुरंत डॉक्टर से इलाज शुरू करवाना चाहिए, वरना सुनने की क्षमता हमेशा के लिए जा सकती है।

अचानक होने वाला यह तेज शोर दिल के मरीजों या बुजुर्गों के लिए कितना जानलेवा हो सकता है?

शादी-ब्याह में बजने वाले हैवी बेस (Bass) वाले डीजे से निकलने वाली लो-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स (Low-frequency sound waves) सीधे इंसान की छाती से टकराती हैं, जिससे दिल में कंपन और घबराहट महसूस होती है। यह अचानक होने वाला तेज शोर दिल के मरीजों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत जानलेवा हो सकता है। मेडिकल साइंस के अनुसार, यह शोर शरीर में स्ट्रेस हार्मोन (जैसे एड्रेनालाईन ) का स्तर तुरंत बढ़ा देता है। इसके प्रभाव से ब्लड प्रेशर अचानक शूट कर जाता है और दिल की धड़कन अनियंत्रित (Arrhythmia) हो जाती है। कार्डियक अरेस्ट या पहले से कमजोर हार्ट वाले मरीजों के लिए यह शॉक सीधा हार्ट अटैक का कारण बन सकता है।

क्या लंबे समय तक ध्वनि प्रदूषण वाले माहौल में रहने से हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है?

लंबे समय तक ध्वनि प्रदूषण में रहने से हाइपरटेंशन और हार्ट अटैक का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। इसके पीछे की मेडिकल साइंस यह है कि जब हमारा शरीर लगातार तेज शोर (क्रोनिक नॉइज़) के संपर्क में रहता है, तो हमारा मस्तिष्क (Brain) इसे एक खतरे या 'स्ट्रेस सिग्नल' के रूप में लेता है। इससे शरीर का नर्वस सिस्टम एक्टिव हो जाता है और 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) व एड्रेनालाईन' जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का रिसाव लगातार होने लगता है। ये हार्मोन्स हमारी रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) को सिकोड़ देते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर हमेशा हाई रहने लगता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ यही ब्लड प्रेशर धमनियों (Arteries) को ब्लॉक कर देता है, जो आगे चलकर अचानक हार्ट अटैक और स्ट्रोक का मुख्य कारण बनता है।

तेज शोर की वजह से नर्वस सिस्टम (Nervous System) पर क्या असर पड़ता है?

लगातार और तेज शोर हमारे नर्वस सिस्टम (Autonomous Nervous System) को हमेशा 'फाइट या फ्लाइट' (सजग और तनावपूर्ण) मोड में रखता है। इससे मस्तिष्क का 'अमिगडाला'( Amygdala ) हिस्सा सक्रिय हो जाता है, जो डर और तनाव को नियंत्रित करता है।इस निरंतर तनाव के कारण शरीर में 'कॉर्टिसोल' हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो सीधे तौर पर मानसिक संतुलन को बिगाड़ता है। यही मेडिकल कारण है कि लंबे समय तक शोर में रहने वाले लोगों में चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी (घबराहट), क्रोनिक स्ट्रेस और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। यह शोर व्यक्ति की गहरी नींद (REM Sleep) को भी बाधित करता है, जिससे मानसिक थकावट और अवसाद गहरा हो जाता है।

देर रात तक बजने वाले लाउडस्पीकर्स के कारण जब नींद पूरी नहीं होती (Sleep Deprivation), तो इसका इंसान की रोज़मर्रा की कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

देर रात तक बजने वाले लाउडस्पीकर्स के कारण जब नींद पूरी नहीं होती (स्लीप डेप्रिवेशन), तो इसका सबसे पहला असर दिमाग के 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' (Prefrontal Cortex) पर पड़ता है, जो हमारी निर्णय लेने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को नियंत्रित करता है। परिणामस्वरूप, इंसान की रोजमर्रा की कार्यक्षमता (Productivity) बुरी तरह प्रभावित होती है, याददाश्त कमजोर होने लगती है, सोचने की गति धीमी हो जाती है और काम में गलतियां बढ़ती हैं। मानसिक संतुलन के लिहाज से, अधूरी नींद के कारण मस्तिष्क में 'सेरोटोनिन' (Serotonin) और 'डोपामाइन' ( Dopamine) जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे व्यक्ति अत्यधिक चिड़चिड़ा हो जाता है, मूड स्विंग्स होते हैं, और धीरे-धीरे वह एंग्जायटी और गंभीर डिप्रेशन का शिकार होने लगता है।

बोर्ड एग्जाम्स या पढ़ाई के दिनों में इस तरह का शोर बच्चों के मानसिक तनाव (Mental Stress) और एकाग्रता (Concentration) को किस हद तक प्रभावित करता है?

बोर्ड एग्जाम्स या पढ़ाई के दिनों में तेज शोर बच्चों के भविष्य पर सीधा प्रहार करता है। मेडिकल रिसर्च के अनुसार, जब बच्चा पढ़ाई करता है, तो उसके दिमाग को गहरी एकाग्रता (Cognitive Concentration) की जरूरत होती है। आस-पास बजने वाला डीजे या लाउडस्पीकर मस्तिष्क के 'वर्किंग मैमोरी' वाले हिस्से को ब्लॉक कर देता है, जिससे पढ़ा हुआ याद रखना और नए कॉन्सेप्ट समझना नामुमकिन हो जाता है। यह शोर बच्चों में एड्रेनालाईन हार्मोन बढ़ाकर उन्हें मानसिक तनाव और एंग्जायटी (परीक्षा का डर) की तरफ धकेलता है। नींद पूरी न होने से सुबह परीक्षा हॉल में बच्चे भूलने की बीमारी (Brain Fog) का शिकार हो जाते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और ओवरऑल परफॉर्मेंस बुरी तरह गिर जाती है।

एक डॉक्टर के नाते आप उन लोगों को क्या सलाह देंगे जो मजबूरीवश ऐसे शोर-शराबे वाले इलाकों में रहते हैं? वो अपने कानों और सेहत का बचाव कैसे करें?

ईयर प्रोटेक्टर्स का उपयोग: घर से बाहर निकलते समय या अत्यधिक शोर के दौरान अच्छी क्वालिटी के ईयर प्लग (Earplugs) या नॉइज-कैंसलेशन ईयरमफ्स का इस्तेमाल करें। ये ध्वनि के स्तर को 20-30 डेसिबल तक कम कर देते हैं।

साउंडप्रूफिंग: अपने घर के दरवाजों और खिड़कियों पर मोटे पर्दे लगाएं। मुमकिन हो तो डबल-ग्लेज़्ड (Double-glazed) कांच की खिड़कियां लगवाएं, जो बाहरी शोर को अंदर आने से रोकती हैं।

साइलेंट कॉर्नर और डाइट: घर में एक 'शांत कोना' बनाएं जहां बिल्कुल शोर न हो, ताकि नर्वस सिस्टम को आराम मिल सके। अपनी डाइट में एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन-B12 और मैग्नीशियम शामिल करें, जो कान की नसों को मजबूत रखते हैं।

नियमित जांच: हर 6 महीने में किसी ईएनटी (ENT) डॉक्टर से अपनी श्रवण क्षमता (Audiometry Test) की जांच ज़रूर करवाएं।

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