Reality of Indian War Movies: बॉलीवुड की वॉर फिल्में अक्सर सच्ची जंग और वीर सैनिकों की कहानियों से प्रेरित होती हैं। पर क्या पर्दे पर दिखाई गई कहानी पूरी तरह सच होती? ‘बॉर्डर 2’ और ‘इक्कीस’ से लेकर ‘हकीकत’ और ‘शेरशाह’ तक, इन फिल्मों में इतिहास और कल्पना का मिला-जुला रूप दिखता है, जो मनोरंजन के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बनाता है। आइये जानते हैं इन फिल्मों के बारे में।
Reality of Indian War Movies: इस साल बॉलीवुड की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'बॉर्डर 2' सिनेमाघरों में रिलीज हुई जो 1971 की इंडो-पाक युद्ध की असल कहानी से प्रेरित बताई जा रही है। इससे पहले सेकेण्ड लेफ्टिनेंट और परमवीर चक्र से सम्मानित अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की कहानी पर आधारित फिल्म 'इक्कीस' भी रिलीज हुई थी। इन दोनों ही फिल्मों में 1971 की जंग की असल घटनाओं की कहानी को दिखाया गया है। लेकिन इन फिल्मों से पहले भी भारत और पाकिस्तान और भारत-चीन के बीच हुई जंगों पर भी कई फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं। इनमें 'हकीकत' 'बॉर्डर', 'LOC कारगिल', 'शेरशाह', पिप्पा जैसी फिल्मों के नाम शामिल हैं। अब सवाल ये उठता है कि क्या इन फिल्मों की कहानी पूरी तरह सच्ची होती है या इनकी कहानी बदलाव किया जाता है?
इसमें कोई दोराय नहीं है कि युद्ध पर आधारित फिल्में अक्सर सच्ची घटनाओं से प्रेरित होती हैं, लेकिन उनमें 50-60% तक ही पूरी तरह सच होती है, बाकी कहानी में काल्पनिकता, बहादुरी भरे डायलॉग्स, गाने और वीरता का कंटेंट मनोरंजन के लिए डाला जाता है। ऐसा इसलिए ताकि दर्शक फिल्म से भावनात्मक रूप से जुड़ें और देश के जाबांजों की बहादुरी पर फक्र महसूस करें।
सबसे पहले बात करते हैं 1964 में आई फिल्म 'हकीकत' की। दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र अभिनीत यह मशहूर हिंदी वॉर फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध पर आधारित है। फिल्म के किरदार भले ही काल्पनिक हों, लेकिन युद्ध के कारण घटित होने वाली घटनाओं को बहुत ही सच्चाई और ईमानदारी के साथ दिखाया गया है। यह फिल्म जंग के विनाशकारी असर को बखूबी दर्शाती है। वहीं, इसकी कहानी एक छोटे से भारतीय प्लाटून के इर्द-गिर्द घूमती है और दिखाती है कि कैसे युद्ध की आग में फंसे सैनिक शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर भी टूट जाते हैं। युद्ध का डर, कुर्बानी और देश के लिए सब कुछ दांव पर लगाने का जज्बा इस फिल्म की आत्मा है।
साल 1997 में जेपी दत्ता की फिल्म आयी थी 'बॉर्डर' इस फिल्म में सनी देओल, अक्षय खन्ना, सुनील शेट्टी, जैकी श्रॉफ, जैसे कलाकारों ने काम किया है। फिल्म में अक्षय खन्ना ने धर्मवीर सिंह (असल पात्र) का किरदार निभाया था। फिल्म में धर्मवीर सिंह को जंग में शहीद होते हुए दिखाया गया था।
जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर में सुनील शेट्टी और अक्षय खन्ना का एक सीन है जिसमें सुनील शेट्टी (भैरों सिंह के किरदार में) पूछते हैं, तुमने फ़ौज क्यों जॉइन की? जिसके जवाब में अक्षय खन्ना (धरमवीर सिंह) कहते हैं, "अपने प्यार का वास्ता देकर मुझसे वचन लिया था पिताजी ने कि मैं फ़ौज ही जॉइन करूंगा। वतन की मोहब्बत के जोश में अपने बेटे को वर्दी की जंजीर पहना गए। हाथ में बंदूक थमा दी कि सामने वाले फौजी को गोली से उड़ा दो। वो फौजी जो मेरी तरह किसी मां का बच्चा है, जिसको मैंने जिंदगी में कभी नहीं देखा। जिसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा। जिसका नाम तक मैं नहीं जानता। आखिर क्यों, किस लिए?" इस पर सुनील शेट्टी जवाब देते हैं, "इसलिए क्योंकि अगर तुम उसे नहीं मारोगे तो वह तुम्हें जान से मार डालेगा?" और फिल्म में दिखाया भी वैसा ही गया।
साल 2017 में कर्नल धरमवीर सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स को एक इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने बताया था, 'जब 1997 में बॉर्डर रिलीज होने वाली थी तो निर्देशक जे. पी. दत्ता ने मुझे कॉल किया कि सेंसर बोर्ड फिल्म रिलीज नहीं कर रहा, क्योंकि इसमें उनके किरदार को शहीद होते हुए दिखाया गया है।' जे. पी. दत्ता ने कहा, 'मुझसे कहा गया था कि मुझे फैक्स करना होगा कि उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। कई लोगों ने मुझसे कानूनी एक्शन लेने को कहा। लेकिन मैंने सबसे यही कहा कि ये जेंटलमैन जैसा व्यवहार नहीं होगा।'
इसी तरह 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बीएसएफ के हीरो रिटायर्ड नाइक भैरों सिंह राठौड़ का किरदार बॉर्डर में सुनील शेट्टी ने निभाया था और असल में उनकी मौत 19 दिसंबर 2022 को हुई। उन्हें 1972 में सेना मेडल दिया गया था। जबकि फिल्म में युद्ध के दौरान उनको शहीद होते हुए दिखाया गया है।
वहीं, फिल्म के आखिरी सीन में दिखाया गया था कि इंडियन आर्मी के जवान युद्ध ख़तम होने के बाद पाकिस्तानी जवानों पार्थिव शरीर दफना रहे हैं, वो सीन काल्पनिक नहीं था, असलियत में ऐसा हुआ था। इसके कई रिकार्ड्स आपको गूगल पर भी मिल जाएंगे।
साल 1999 में भारत के ऑपरेशन विजय पर आधारित 'एलओसी कारगिल' एक और वॉर फिल्म है। इस फिल्म में अजय देवगन, संजय दत्त, अभिषेक बच्चन, सैफ अली खान, सुनील शेट्टी, अक्षय खन्ना, करीना कपूर और रानी मुखर्जी जैसे बड़े कलाकारों ने अभिनय किया था। कारगिल युद्ध से प्रेरित इस फिल्म में भी सत्य घटनाओं से रिफ्रेंस लेकर भारतीय सैनिकों की मुश्किलें और बहादुरी दिखाई गई है, जो कारगिल सेक्टर पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ मोर्चा संभालते हैं। जंग के हालात, पहाड़ों में लड़ाई और जवानों की कुर्बानी को फिल्म बेहद गंभीरता से पेश करती है।
साल 2021 में आई 'शेरशाह' में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा का किरदार निभाया था। फिल्म में विक्रम बत्रा की असल जिंदगी जिंदगी को करीब से दिखाया गया है। एक ऐसा नौजवान जिसके सपने बड़े थे, जो भारतीय सेना में शामिल होकर अपने देश की सेवा करना चाहता था। फिल्म में ऑपरेशन विजय (1999) के दौरान विक्रम बत्रा के अहम योगदान को दिखाया गया है, जिसने भारत को कारगिल युद्ध में जीत दिलाने में भूमिका निभाई थी। फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने एक डायलॉग बोला था, ये दिल मांगे मोर' जो असल जिंदगी में विक्रम बत्रा ने भी बोला था। फिल्म में जिस तरह से दिखाया गया था कि विक्रम बत्रा की प्रेमिका ने उनकी शहादत के बाद शादी नहीं कि थी, असल जिंदगी में भी ऐसा ही हुआ था। शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में देश की पहली प्रेग्नेंट महिला आर्मी ऑफिसर कैप्टन याशिका त्यागी ने 'शेरशाह' के बारे में कहा, 'फिल्म में जिस तरह से दिखाया गया था, जवान विषम परिस्थितियों में खड़ी चढ़ाई चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं वो सही है, ऐसा ही हुआ था।' साथ ही उन्होंने ये भी बताया, 'विक्रम बत्रा ने जिस बहादुरी से दुश्मनों को खदेड़ा और उनका सामना किया फिल्म में सही दिखाया गया है।'
हाल ही में रिलजी हुई फिल्म 'इक्कीस' में अमिताभ बच्चन ने नाती अगस्त्य नंदा ने 21 वर्षीय अरुण खेत्रपाल का किरदार निभाया है। और दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र उनके पिता के किरदार में नजर आये थे। फिल्म की कहानी अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी पर आधारित थी। फिल्म में दिखाया गया है कि सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के ऐसे महानायक थे, जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की उम्र में बसंतर की ऐतिहासिक लड़ाई में अद्भुत साहस और वीरता का परिचय दिया। दुश्मन से आमने-सामने की टक्कर में, अपने टैंक ‘फामागुस्ता’ से उन्होंने कई पाकिस्तानी पैटन टैंकों को तबाह कर दिया। भीषण गोलाबारी के दौरान उनका टैंक आग की लपटों में घिर गया और वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने टैंक छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। जब कमांडर ने पीछे हटने का आदेश दिया, तो उनका जवाब था, “नहीं सर, मैं टैंक नहीं छोड़ूंगा। मेरी गन अभी काम कर रही है और मैं दुश्मन को नहीं छोड़ने वाला।” आखिरी सांस तक लड़ते हुए उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी इस असाधारण शहादत और बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में देश के जांबाजों ने देख की रक्षा के लिए जो बहादुरी दिखाई उसी की कहानी कहती है, 'बॉर्डर 2'। फिल्म में वरुण धवन ने मेजर होशियार सिंह दाहिया का किरदार निभाया था और दिलजीत दोसांझ ने निर्मलजीत सिंह सेखों की भूमिका निभाई थी। फिल्म में दिखाया गया था कि फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों 1971 की जंग के दौरान श्रीनगर में तैनात थे। वहीं, भारतीय रक्षा मंत्रालय के नोट के मुताबिक़, "जब 14 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की ओर से हवाई हमला हुआ तो पाकिस्तान के छह विमान मंडरा रहे थे। इसी बीच फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने उड़ान भरी। कॉम्बैट के बाद पाकिस्तानी विमानों को वहां से हटना पड़ा और बेस पर हमले की योजना को छोड़ना पड़ा। लेकिन फ्लाइंग ऑफिसर सेखों का विमान क्रैश हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई।"
हालांकि, इसी युद्ध में मेजर होशियार सिंह दाहिया, दुश्मनों से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल तो हुए थे, मगर वो दुश्मनों को खदेड़ने में सफल रहे थे।
आखिर में बस इतना ही कि दो देशों की जंग पर बनी फिल्मों में सैनिकों की कहानी के साथ-साथ बॉर्डर पर उनकी दिनचर्या, खुले आसमान के नीचे रेगिस्तान में लेकर देखे गए सपनों, अपनों से मिलने की उम्मीदों और उनके परिवारों की व्यथा को दिखाना जरुरी है। ताकि अपने-अपने घरों में चैन से सो रहे देशवासियों को इस बात का एहसास हो कि वो अपने देश में आजादी से सो रहे हैं तो देश की सीमा पर तैनात बहादुर सिपाहियों की वजह से। और इस बात का एहसास कराने के लिए फिल्म में थोड़ी बहुत काल्पनिकता होती भी है तो ये कहीं से भी गलत नहीं है।