Sand Mining Crisis: दुनिया के विकास के लिए रेत बेहद जरूरी वस्तु बन चुकी है। घर बनाने, सड़क तैयार करने, से लेकर पुल खड़े करने जैसे सैकड़ों कामों में रेत चाहिए होती है। लेकिन हमारे लोभ के चलते यही रेत दुनिया के लिए बड़ा संकट बनती जा रही है। एक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि जिस रफ्तार से रेत खनन का काम हो रहा है, उससे निकट भविष्य में नदियां अपना रास्ता बदल सकती हैं। समुद्र तट खत्म हो सकते हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर पड़ सकता है।
Sand Mining Crisis: दुनिया में रेत को हमेशा एक आम चीज माना गया। घर बनाना हो, सड़क तैयार करनी हो, पुल खड़े करने हों या फिर समुद्र किनारे नई जमीन बसानी हो हर जगह रेत चाहिए। लेकिन यही रेत की कमी दुनिया के लिए बड़ा संकट बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme ) की नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि जिस रफ्तार से नदी और समुद्र से रेत निकाली जा रही है, उससे आने वाले सालों में नदियों का बहाव बदल सकता है, समुद्र तट खत्म हो सकते हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर पड़ सकता है।
दुनिया भर में शहरीकरण की गति रफ्तार पकड़ चुकी है। नई इमारतें बन रही हैं और एक्सप्रेसवे का जाल बिछ रहा है।लेकिन इसकी वजह से दुनिया का बड़ा नुकसान हो रहा है। साल 1970 में जहां दुनिया को सालभर में 9.6 अरब टन रेत की जरूरत पड़ती थी, वहीं 2020 तक यह बढ़कर 50 अरब टन पहुंच गई है। हर साल करीब 3.2% की दर से रेत की भूख बढ़ती जा रही है। अकेले इमारतों के लिए इसकी मांग में 2060 तक 45% तक की वृद्धि होने का अनुमान है। रेत कोई फैक्ट्री में बनने वाली चीज नहीं है। इसे बनने में हजारों साल लगते हैं, लेकिन हम इसे कुछ ही दिनों में खोदकर निकाल रहे हैं।
वैश्विक रेत बाजार का मूल्य 569.4 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया है। शहर जितनी तेजी से फैल रहे हैं, रेत की जरूरत भी उतनी ही बढ़ रही है। 1975 में दुनिया में प्रति व्यक्ति औसत निर्मित क्षेत्र 43 वर्ग मीटर था, जो 2025 तक बढ़कर 63 वर्ग मीटर हो चुका है। मतलब इंसान ज्यादा जगह घेर रहा है और इसके लिए कंक्रीट, सीमेंट और कांच की जरूरत बढ़ रही है। यही वजह है कि वैश्विक रेत बाजार की कीमत 2024 में 569.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में यह कारोबार और तेजी से बढ़ेगा।
दुनिया की 45% से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है, जिसके चलते इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। भारत में पीएम आवास योजना, एक्सप्रेसवे और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के कारण रेत की खपत तेजी से बढ़ी है, जिससे कई नदियों का भूगोल तक बदल गया है। वहीं वैश्विक स्तर पर, फिलीपींस और मालदीव जैसे देशों में समुद्र से रेत निकालकर नई जमीन बनाई जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मालदीव का गुलहिफालहू प्रोजेक्ट (Gulhifalhu Project) है, जहां समुद्र के बढ़ते जलस्तर से बचने के लिए 24.5 मिलियन (2.45 करोड़) घन मीटर रेत निकाली गई। क्लाइमेट चेंज के खतरे से बचने के लिए जो समुद्री दीवारें और कृत्रिम द्वीप बनाए जा रहे हैं, उनमें भी भारी मात्रा में रेत लग रही है। पर्यावरण को बचाने के चक्कर में अंधाधुंध खनन करके उसे और बड़े संकट में हम खुद को डाल रहे हैं।
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि रेत का इस्तेमाल सिर्फ घर या इमारतें बनाने में होता है, लेकिन आज की डिजिटल दुनिया भी पूरी तरह रेत पर ही टिकी है। हमारे कंप्यूटर-मोबाइल की चिप्स, कंप्यूटर प्रोसेसर (Electrical Conductivity), सोलर पैनल और बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाने के लिए एक खास तरह की शुद्ध रेत सिलिका सैंड की जरूरत होती है। दुनिया में एआई (AI), इलेक्ट्रिक गाड़ियों और सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है, इससे सिलिका सैंड रेत की मांग भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि आने वाले समय में टेक कंपनियों की जरूरतें पूरी करने के लिए रेत का खनन और ज्यादा बढ़ रहा है।
रेत सिर्फ घर बनाने के काम नहीं आती, बल्कि यह नदियों और हमारे पर्यावरण को बचाए रखने के लिए एक प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती है जो पानी को रोककर रखती है। लेकिन जब नदियों से बहुत ज्यादा रेत निकाली जाती है, तो नदी का तल गहरा हो जाता है, जिससे किनारे टूटने लगते हैं, अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है और पुल-सड़कें कमजोर हो जाती हैं जैसा कि चंबल नदी में देखा गया है। इतना ही नहीं, रेत खत्म होने से पानी जमीन के अंदर नहीं रुक पाता, जिससे आसपास के कुएं और हैंडपंप सूखने लगते हैं और गांवों में पानी का संकट खड़ा हो जाता है।
समुद्र की गहराई से बहुत ज्यादा रेत निकालने के कारण वहां रहने वाले जीव, मछलियां और सुंदर मूंगे अपना प्राकृतिक घर खो रहे हैं। इससे समुद्री पर्यावरण को इतना भारी नुकसान हो रहा है जिसे दोबारा सामान्य होने में कई दशक लग सकते हैं और कुछ जगह तो यह नुकसान कभी ठीक नहीं हो पाएगा। दुनिया की आधी दर्जन कंपनियां सरकारी तौर पर सुरक्षित घोषित समुद्री इलाकों में ही खुदाई कर रही हैं। इसका सीधा असर 230 करोड़ (2.3 अरब) लोगों की रोजी-रोटी और पेट भरने पर पड़ रहा है, जो अपनी छोटी-मोटी कमाई और भोजन के लिए पूरी तरह मछली पकड़ने के काम पर निर्भर हैं।
रेत खनन में एक और नया और बड़ा खतरा सामने आया है, जिसे काली रेत या मैग्नेटाइट का समुद्री खनन कहा जा रहा है, इस रेत में लोहा और दूसरे कीमती खनिज भारी मात्रा में मिलते हैं। फिलीपींस, इंडोनेशिया, जापान, न्यूजीलैंड और लैटिन अमेरिका के समुद्री तटों पर मिलने वाली इस काली रेत को निकालने के लिए कंपनियां समुद्र के उथले हिस्सों में खुदाई की बड़ी तैयारी कर रही हैं। सबसे ज्यादा चिंता फिलीपींस को लेकर है, जहां सरकार ने 11 बड़े खनन समझौतों को मंजूरी दे दी है और 100 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं।
आईयूसीएन (IUCN) की रिपोर्ट बताती है कि करीब 6.25 लाख हेक्टेयर का समुद्री इलाका खतरे में है। यह खुदाई जहां होनी है, वहीं सबसे ज्यादा समुद्री जीव रहते हैं। उथले जल पर ही छोटे मछुआरों की आजीविका चलती है। वे यहां सदियों से मछलियां पकड़ने का काम रहे हैं। समुद्र के तल को खोदने से पानी गंदा और मटमैला हो जाएगा, जिससे मछलियों के अंडे देने और पनपने की जगहें पूरी तरह तबाह हो जाएंगी और आने वाले समय में मछलियों का अकाल पड़ सकता है।