Subhash Ghai Cinema: बॉलीवुड निर्देशक सुभाष घई का नाम फिल्म जगत के ऐसे फिल्मकारों में शामिल है जिन्होंने सिनेप्रेमियों की पहचान बड़े-बड़े सेट्स, सशक्त कहानी, किरदारों और मल्टीस्टारर फिल्मों से कराई। उनकी फिल्मों की बड़ी खासियत उनकी फिल्मों में मां का किरदार और म्यूजिक भी रहा है।
Subhash Ghai Cinema: 'The Show Man of Bollywood' के नाम से पहचाने जाने वाले सुभाष घई फिल्म जगत के कुछ ऐसे फिल्मकारों में शुमार हैं जिन्होंने सिनेप्रेमियों की दोस्ती बड़े-बड़े सेट्स और मल्टीस्टारर फिल्मों से कराई। उनकी फिल्मों की कहानी जितनी सशक्त होती है, उसका संगीत भी उतना ही दमदार। सुभाष घई की फिल्मों में भव्यता और गहराई का अनूठा संगम होता है। चाहे उनकी 'राम लखन' देख लीजिये या फिर 'खलनायक' और या 'कर्मा'। हर फिल्म अपनी दमदार कहानी और सुपर-डुपर हिट म्यूजिक के लिए आज भी जानी जाती है। अगर सुभाष घई सिनेमा को तीन मेन पॉइंट्स में समझना हो, तो कहानी, संगीत और ‘मां’ हैं। आगे के आर्टिकल में हम जानेंगे कि कैसे सुभाष घई की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत 'मां' कैसे और क्यों है?
सुभाष घई का सिनेमा मल्टीस्टारर होने के साथ-साथ मां को एक अबला नारी दिखाने में विश्वास नहीं करता है, बल्कि वो 'मां' को सशक्त और समाज के ठेकदारों का डंटकर सामना करने वाली मजबूत औरत के रूप में दिखाता है। वो मां जो अपने बच्चों को प्यार और अच्छे संस्कार देने के साथ-साथ गलत रास्ते पर जाने से रोकना भी जानती है।
शोमैन सुभाष घई ने बॉलीवुड को कई ऐसी फिल्में दी हैं जिनमें मां के किरदार को मजबूती से गढ़ा गया है। इन फिल्मों में सबसे पहला नाम आता है साल 1985 में आई 'मेरी जंग' का। 'मेरी जंग' फिल्म में नूतन ने एक ऐसी मां (आरती) का किरदार निभाया था जो अपने पति (गिरीश कर्नाड) और बच्चों (अरुण और कोमल) को कभी ना हारने वाली सीख देती है। लेकिन विषम परिस्थतियों के चलते जब इसका पति जिंदगी से हार मान जाता है तो इस मां को गहरा सदमा लगता है और वो अपने को सिर्फ उसी पल में समेट लेती है। और अपनी याददाश्त के चलते अपने बच्चों से दूर हो जाती है। अनिल कपूर, मीनाक्षी शेषाद्रि, नूतन, परीक्षित साहनी, बीना बनर्जी, अमरीशपुरी जैसे दिग्गज कलाकारों से सजी इस फिल्म में जबरदस्त कोर्टरूम ड्रामा दिखाया गया था। अपने दौर की सुपर हिट फिल्म फिल्मों में से एक थी ये फिल्म।
फिर आई साल 1986 में देशभक्ति की कहानी 'कर्मा'। 'कर्मा' फिल्म का 'दिल दिया है जान भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए…' गाना तो आपको याद ही होगा। 15 अगस्त और 26 जनवरी को ये गाना हर फंक्शन में जरूर बजता है। और ये फिल्म भी किसी न किसी चैनल पर आती ही है। सुभाष घई की ये फिल्म मल्टीस्टारर होने के साथ-साथ देशभक्ति का सन्देश भी देती है। फिल्म में भले ही देश के बॉर्डर की जंग नहीं दिखाई गई हो लेकिन देश के अंदर के दुश्मनों के खात्मे की कहानी को बखूबी दिखाया गया है। फिल्म में एक मां (नूतन) है जिसके बेटे देश की रक्षा में अपनी जान कुर्बान कर देते हैं और उसका पति (दिलीप कुमार) अपने बच्चों को खोने के बाद भी देश के दुश्मनों के खिलाफ जंग लड़ता और और अपनी (जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर और नसीरुद्दीन शाह के साथ) सेना बनता है।
वहीं, अगर बात की जाए 1989 की राम लखन की तो इसकी कहानी एक विधवा मां शारदा और उसके बदले की कहानी थी। शारदा एक ऐसी मां, जिसके पति को जायदाद के लिए उसकी आंखों के सामने उसके देवर और गुंडों द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है। पति की मौत के बाद वो अपने बच्चों को लेकर दूसरे शहर चली जाती है, लेकिन उसकी आंखों में बस बदले की आग जलती है। लेकिन वो बदला लेने के लिए अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करती है। ताकि वो बड़े होकर अपने पिता को इंसाफ दिला सकें। सुभाष घई की ये फिल्म एक मल्टीस्टारर फिल्म थी जिसमें राखी गुलजार, अमरीश पुरी, अनुपम खेर, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, डिम्पल कपाड़िया, माधुरी दीक्षित, गुलशन ग्रोवर जैसे कलाकारों ने अपने जबरदस्त अभिनय से फिल्म को ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर फिल्म बना दिया।
इस कड़ी में अगला नाम है 'खलनायक' फिल्म का। खलनायक (1993) फिल्म जितनी अपनी दमदार कहानी के लिए जानी जाती है उतनी ही अपने सुपर-डुपर हिट गानों के लिए भी जानी जाती है। फिल्म के गाने चोली के पीछे क्या है, नायक नहीं खलनायक हूं मैं जैसे गाने आज भी उतने ही फ्रेश लगते हैं जितने 90 के दशक में थे। खैर, अगर फिल्म की कहानी की बात करें तो उसकी कहानी एक ऐसे लड़के (संजय दत्त) के इर्द-गिर्द घूमती है जो पढ़ा-लिखा और होनहार होता है लेकिन गलत संगत और पैसों की किल्लत के चलते एक कुख्यात अपराधी बन जाता है। लेकिन वो अपनी मां के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में उसको पकड़ने के लिये पुलिस ऑफिसर राम (जैकी श्रॉफ) उसकी मां (राखी गुलजार) का सहारा लेता है। और हर मां की तरह ही ये मां भी अपने बच्चे की भलाई के लिए पुलिस का साथ देने के लिए तैयार हो जाती है क्योंकि वो अपने बच्चे की सच्चाई जानती है और उसको बचाना चाहती है। दिग्गज कलकारों से सजी ये फिल्म सुभाष घई की सबसे सफल फिल्मों में से एक रही है।
फिल्मों में रिश्तों की अहमियत समझाने वाले सुभाष घई ने निजी जिंदगी में भी रिश्तों के कई उतार-चढ़ाव देखे। उनकी किताब 'Karma's Child: The Story of Indian Cinema's Ultimate Showman' में उनके बचपन के एक किस्से का जिक्र है, जिसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने 14 साल की उम्र में आत्महत्या करने की कोशिश की थी। आइए जानते हैं क्या थी पूरी कहानी।
जब सुभाष 14 साल के थे और अपने भाई-बहनों का ख्याल रखने थे। उस दौरान एक बार परिवार की स्थिति के चलते परेशान होकर उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपने मुझे पैदा ही क्यों किया? ये सुनकर उनके पिता ने उन्हें एक थप्पड़ मार दिया। इससे गुस्सा होकर सुभाष ने नीले थोथे को पानी में मिलाकर पी लिया। अगली सुबह जब उनकी आंख खुली तो उन्होंने खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पाया और उनके पिता उनके सिरहाने बैठे हुए थे। इस घटना के बाद सुभष ने ठान लिया कि वो एक दिन कुछ बनकर दिखाएंगे।
उनकी किताब कर्मा चाइल्ड के अनुसार, जब सुभाष घई दस साल के थे, तभी उनके माता-पिता अलग हो गए थे। उस दौरान सुभाष की मां उनको चिट्ठियां लिखा करती थीं और उनको समझती थीं कि हमेशा अपने दिल की बात माननी चाहिए। अलगाव के बाद जब सुभाष के पिता ने दूसरी शादी की थी तो उन्होंने ही अपनी मां को दोनों को साथ रहने के लिए समझाया था। इस वाकये को भी इस किताब में विस्तार से बताया गया है।