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कॉर्पोरेट दुनिया का ट्रेंड Task Masking क्या है, जिससे पता चलता है वर्क-कल्चर का दिखावा

Fake Corporate Culture Task Masking: कॉर्पोरेट जगत में क्यों बढ़ रहा है 'Fake Work' और 'Faux Productivity' का चलन? जानिए कैसे कर्मचारी काम करने से ज्यादा व्यस्त दिखने का नाटक कर रहे हैं और इसके पीछे का सच।

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Jun 13, 2026
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स्क्रीन पर 'Green Dot'? ( Photo: AI Generated)

Corporate World Task Masking: कॉर्पोरेट जगत इस समय एक अजीब स्थिति से गुजर रहा है। एक तरफ कंपनियां कर्मचारियों की हर हरकत पर नजर रखने के लिए 'Bossware' (निगरानी सॉफ्टवेयर) लगा रही हैं, तो दूसरी तरफ कर्मचारियों ने भी इस सिस्टम को मात देने के लिए 'The Art of Fake Work' में महारत हासिल कर ली है।

माउस जिगलर्स से लेकर स्क्रीन पर नकली कोडिंग स्क्रिप्ट चलाने तक, कर्मचारी अब काम का आउटपुट देने के बजाय सिर्फ 'व्यस्त दिखने' में अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं। एक्सपर्ट्स इसे 'फॉक्स प्रोडक्टिविटी' या 'टास्क-मास्किंग' कह रहे हैं, जहां सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ही असल काम बन गया है। यह केवल किसी एक कर्मचारी की चालाकी नहीं है, बल्कि उस खोखले वर्क-कल्चर की कहानी है जो कर्मचारियों को कामचोर नहीं, बल्कि 'दिखावटी एक्टर' बनने पर मजबूर कर रहा है।

क्या है 'Faux Productivity' और 'Task-Masking'?

फॉक्स प्रोडक्टिविटी (Faux Productivity) का मतलब है असल में कोई ठोस आउटपुट या काम किए बिना, खुद को बहुत अधिक व्यस्त और काम में डूबा हुआ दिखाना।

डिजिटल वर्कप्लेस में इसे करने के लिए कर्मचारी कई तरह के तरीके अपनाते हैं, जैसे

  • माउस जिगलर (Mouse Jiggler) : एक ऐसा गैजेट या सॉफ्टवेयर जो कंप्यूटर के माउस को अपने आप हिलाता रहता है, ताकि (Slack, Microsoft Teams या Zoom) पर कर्मचारी का स्टेटस हमेशा उपलब्ध (Green Dot) दिखाई दे।
  • कैलेंडर स्टफिंग: अपने डिजिटल कैलेंडर को फर्जी मीटिंग्स, 'फोकस टाइम' या री-शेड्यूल किए गए स्लॉट्स से भर देना ताकि कोई और मीटिंग इनवाइट न भेज सके।
  • ईमेल और चैट ड्रामा: किसी भी साधारण ईमेल पर 'सभी को जवाब दें' करना या ग्रुप चैट में लगातार ऐसे मैसेज भेजना जिससे लगे कि आप हर चर्चा का हिस्सा है।
  • एक चौंकाने वाला सर्वे: वर्कप्लेस रिसर्च फर्म (Workhuman) के एक हालिया सर्वे के मुताबिक, लगभग 36% कर्मचारी ऑफिस में 'Pretend Productivity' यानी व्यस्त दिखने का नाटक करते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस लिस्ट में सिर्फ जूनियर कर्मचारी नहीं, बल्कि 38% सी-सूट (C-Suite) लीडर्स और मैनेजर्स भी शामिल हैं।

स्क्रीन के पीछे का सच: आखिर कर्मचारी ऐसा क्यों कर रहे हैं?

पहली नजर में यह लग सकता है कि कर्मचारी आलसी हो गए हैं या काम चोरी कर रहे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह समस्या कर्मचारियों की नहीं, बल्कि कंपनियों के खराब 'वर्क कल्चर' की है। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं।

  • प्रोडक्टिविटी पैरानोइया (Productivity Paranoia) : हाइब्रिड और वर्क फ्रॉम होम (WFH) कल्चर आने के बाद से मैनेजर्स के मन में एक डर बैठ गया है कि 'अगर कर्मचारी सामने नहीं दिख रहा, तो वो काम नहीं कर रहा।' इस शक के चलते कंपनियां 'Bossware' (कर्मचारियों की स्क्रीन और कीस्ट्रोक्स रिकॉर्ड करने वाले सॉफ्टवेयर) का इस्तेमाल करने लगी हैं। जब कंपनियों ने काम के बजाय 'स्क्रीन टाइम' और 'लॉग-इन आवर्स' को तरजीह दी, तो कर्मचारियों ने भी काम करने के बजाय 'स्क्रीन को एक्टिव रखने' की कला सीख ली।
  • अच्छे काम का इनाम और ज़्यादा काम: कॉर्पोरेट का एक कड़वा सच यह है कि यहां जल्दी और कुशलता से काम खत्म करने का इनाम अक्सर तारीफ या बोनस नहीं, बल्कि 'अतिरिक्त काम' होता है। अगर कोई कर्मचारी 8 घंटे का काम 4 घंटे में खत्म कर लेता है, तो उसे आराम करने देने के बजाय दूसरा टास्क सौंप दिया जाता है। ऐसे में बर्नआउट (Burnout) से बचने के लिए कर्मचारी काम को खींचना और खुद को धीमा करना बेहतर समझते हैं।
  • 'विजिबिलिटी' का खेल : कई दफ्तरों में प्रमोशन और अप्रेजल इस आधार पर नहीं होता कि किसने कितना शांत रहकर काम किया, बल्कि इस आधार पर होता है कि कौन कितना 'दिख रहा' है। जो कर्मचारी देर तक ऑफिस में बैठता है या वीकेंड पर भी ईमेल्स का जवाब देता है, उसे 'मेहनती' मान लिया जाता है। इसी 'विजिबिलिटी पॉलिटिक्स' का मुकाबला करने के लिए फेक वर्क का जन्म हुआ है।

'Fake Work' के कुछ क्लासिक और पारंपरिक तरीके

  • द वॉकिंग प्रोप (The Walking Prop): हाथ में हमेशा एक नोटपैड या लैपटॉप लेकर गलियारे में बहुत तेज कदमों से चलना। इससे देखने वाले को लगता है कि आप किसी बेहद जरूरी और अर्जेंट मीटिंग में जा रहे हैं।
  • द मेसी डेस्क (The Messy Desk): अपनी टेबल पर 4-5 फाइलें खोलकर रखना, स्क्रीन पर ढेर सारे टैब्स ओपन छोड़ना और स्टिकी नोट्स बिखेर कर रखना, ताकि टेबल देखने में 'क्रिएटिव केओस' जैसी लगे।
  • द डिकॉय कोट (The Decoy Coat): अपनी कुर्सी के पीछे हमेशा एक जैकेट या स्वेटर टांग कर रखना और डेस्क पर पानी की बोतल छोड़ देना। इससे मैनेजर को लगता है कि आप बस कुछ मिनटों के लिए वाशरूम या कॉफी लेने गए हैं, भले ही आप आधे घंटे से गायब हों।

पत्रिका के खास बातचीत अनामिका सिंह (HR) के साथ

क्या 'लॉग-इन आवर्स' और 'कीस्ट्रोक्स' को ट्रैक करना वाकई किसी कर्मचारी की असल परफॉर्मेंस का पैमाना हो सकता है? कंपनियां आउटपुट के बजाय स्क्रीन-टाइम को इतनी तरजीह क्यों देती हैं?

  • नहीं, 'लॉग-इन आवर्स' या 'कीस्ट्रोक्स' किसी कर्मचारी की असल परफॉर्मेंस का पैमाना बिल्कुल नहीं हो सकते। कंपनियां आउटपुट के बजाय स्क्रीन-टाइम को तरजीह क्यों देती हैं, इसके पीछे 3 मुख्य कारण हैं जैसे
  • मापने में आसानी (Measurability): किसी कर्मचारी की क्रिएटिविटी, क्रिटिकल थिंकिंग या प्रॉब्लम-सॉल्विंग एबिलिटी को सीधे मापना मुश्किल होता है। इसके विपरीत, सॉफ्टवेयर के जरिए यह देखना बहुत आसान है कि स्क्रीन कितने घंटे एक्टिव रही या कीबोर्ड पर कितनी बार उंगलियां चलीं। कंपनियां अक्सर सहूलियत के लिए "क्वालिटी" के बजाय "क्वांटिटी" को ट्रैक करने लगती हैं।
  • भरोसे की कमी (Trust Deficit): हाइब्रिड और रिमोट वर्क के दौर में कई मैनेजर्स "Productivity Paranoia" (उत्पादकता का भ्रम) के शिकार हैं। जब वे कर्मचारियों को अपनी आंखों के सामने काम करते नहीं देख पाते, तो उनका डर और नियंत्रण (Control) खोने की भावना उन्हें इन निगरानी टूल्स का सहारा लेने पर मजबूर करती है।
  • पुराना माइंडसेट (Industrial Era Mindset): आज भी कई संगठनों का ढांचा औद्योगिक क्रांति (Factory System) के जमाने जैसा है, जहां कर्मचारी जितने घंटे मशीन पर बैठता था, उतना ही उत्पादन होता था। वे यह भूल जाते हैं कि मॉडर्न 'नॉलेज वर्क' (Knowledge Work) में 2 घंटे का गहरा, फोकस्ड काम, 8 घंटे के थकाऊ और बिना मन के किए गए 'स्क्रीन-टाइम' से कहीं ज्यादा कीमती होता है।

कॉर्पोरेट में एक कहावत है "जल्दी काम खत्म करने का इनाम और ज़्यादा काम होता है। क्या आपको लगता है कि कंपनियां अनजाने में ही सही, लेकिन स्मार्ट और तेज काम करने वाले कर्मचारियों को 'पनिश' (Punish) करती हैं, जिससे वे 'Task-Masking' की ओर बढ़ते हैं?

  • हां, यह कॉर्पोरेट जगत की एक बहुत बड़ी और कड़वी सच्चाई है। कंपनियां अनजाने में ही सही, लेकिन अपने सबसे काबिल और तेज कर्मचारियों को "एफिशिएंसी पेनाल्टी" (Efficiency Penalty) यानी तेजी से काम करने की सजा देती हैं। इसके पीछे का मनोविज्ञान और सिस्टम का फेलियर इस प्रकार है।
  • इनाम के बदले बोझ: जब एक स्मार्ट कर्मचारी किसी 8 घंटे के टास्क को अपनी स्किल्स के दम पर 4 घंटे में पूरा कर लेता है, तो मैनेजमेंट उसे आराम देने या सराहना करने के बजाय दूसरे पेंडिंग काम सौंप देता है। यानी बेहतर परफॉर्मेंस का इनाम 'बर्नआउट' के रूप में मिलता है।
  • टास्क मास का जन्म: जब कर्मचारी को समझ आ जाता है कि जल्दी काम खत्म करने से उसका खुद का नुकसान है, तो उसका दिमाग 'बचाव मोड' (Survival Mode) में आ जाता है। वह जानबूझकर काम को धीमा करने लगता है और 2 घंटे के काम को 6 घंटे का दिखाकर बाकी समय 'टास्क-मास्किंग' या व्यस्त दिखने के नाटक में बिताता है।
  • सिस्टम की खामी: कंपनियां यह भूल जाती हैं कि काम का मूल्यांकन 'नतीजों' (Results) से होना चाहिए, न कि इस बात से कि कर्मचारी ने डेस्क पर बैठकर कितने घंटे खुद को घिसवाया।
  • जब तक कंपनियां स्मार्ट वर्क की कद्र करना नहीं सीखेंगी, तब तक कर्मचारी बर्नआउट से बचने के लिए 'Fake Work' का सहारा लेते रहेंगे।

जब कोई कर्मचारी 'Acting my Wage' (जितनी सैलरी, उतना ही काम) का रवैया अपनाता है, तो मैनेजमेंट इसे अनुशासनहीनता (Discipline issue) मानता है या फिर इसे कंपनी के खराब इंसेंटिव स्ट्रक्चर का फेलियर माना जाना चाहिए?

यह मैनेजमेंट के लिए अनुशासनहीनता (Discipline Issue) हो सकता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह पूरी तरह कंपनी के खराब इंसेंटिव स्ट्रक्चर और कल्चर का फेलियर है।

इस द्वंद्व को दो अलग-अलग नजरियों से समझा जा सकता है।

  • मैनेजमेंट का नजरिया (अनुशासनहीनता): पुराने माइंडसेट वाले मैनेजर्स इसे चुपचाप नौकरी छोड़ना (Quiet Quitting) या काम के प्रति कमिटमेंट की कमी मानते हैं। उन्हें लगता है कि कर्मचारी सिर्फ न्यूनतम (Minimum) काम करके कंपनी के विकास में बाधा डाल रहा है और बाकी टीम पर बोझ बढ़ा रहा है।
  • असलियत (सिस्टम का फेलियर): मनोवैज्ञानिक और आधुनिक एचआर एक्सपर्ट्स इसे 'इंसेंटिव स्ट्रक्चर' की नाकामी मानते हैं। जब कर्मचारियों को दिखता है कि दिन-रात एक करने (Above and Beyond जाने) के बाद भी न तो समय पर अच्छा अप्रेजल मिलता है, न प्रमोशन, और न ही मानसिक शांति, तो वे अपनी मानसिक सेहत और आत्मसम्मान को बचाने के लिए 'Acting my Wage' को एक जायज रक्षा-कवच (Survival Tool) बना लेते हैं।

भविष्य के वर्कप्लेस में 'Faux Productivity' के इस थिएटर को खत्म करने के लिए क्या एचआर को अपनी 'विजिबिलिटी पॉलिटिक्स' (जो दिखेगा वही बढ़ेगा) को बदलकर पूरी तरह 'Result-Oriented' होना पड़ेगा? इसकी राह में क्या चुनौतियां हैं?

'Faux Productivity' का यह नाटक तभी खत्म होगा जब एचआर 'विजिबिलिटी पॉलिटिक्स' (दिखावे की राजनीति) को छोड़कर पूरी तरह 'Result-Oriented' (नतीजों पर आधारित) मॉडल अपनाएगा।

हालांकि, इस बदलाव की राह में 3 बड़ी चुनौतियां हैं।

  • नतीजों को मापने का पैमाना (Lack of Framework): सेल्स या कोडिंग जैसे विभागों में आउटपुट मापना आसान है, लेकिन क्रिएटिव, स्ट्रेटेजिक या सपोर्ट रोल्स में 'क्वालिटी' और वैल्यू को बिना स्क्रीन-टाइम के सटीक रूप से आंकना एचआर के लिए आज भी एक बड़ी चुनौती है।
  • मैनेजर्स का पुराना माइंडसेट: कई पारंपरिक मैनेजर्स आज भी 'दिखने वाले काम' को ही वफादारी और मेहनत का पैमाना मानते हैं। उन्हें घंटों लॉग-इन रहने वाले औसत कर्मचारी पर ज्यादा भरोसा होता है, बजाय उस स्मार्ट कर्मचारी के जो चुपचाप 3 घंटे में काम खत्म कर लेता है।
  • कल्चरल रेजिस्टेंस (सांस्कृतिक प्रतिरोध): कॉर्पोरेट का मौजूदा ढांचा 'लगातार उपलब्ध रहने' (Always-on culture) की सराहना करता है। इस पूरे सिस्टम को री-वायर करना और एक ऐसा माहौल बनाना जहां काम खत्म होने के बाद लॉग-ऑफ करने को 'कामचोरी' न समझा जाए, एक बहुत बड़ा बदलाव है जिसमें वक्त लगेगा।

डिंपल शर्मा (आईटी कर्मचारी ) की खास बातचीत पत्रिका के साथ

क्या आपके ऑफिस में भी किसी मॉनिटरिंग सॉफ्टवेयर पर हर वक्त 'Green Dot' (Available) रहना जरूरी माना जाता है? इसे मेंटेन रखने के लिए क्या आपने कभी 'Mouse Jiggler' या किसी और ट्रिक का इस्तेमाल किया है?

आज 'Green Dot' (ऑनलाइन स्टेटस) बनाए रखना कर्मचारियों के लिए बड़ी मानसिक मजबूरी है। कंपनियों के ' निगरानी सॉफ्टवेयर के डर से कर्मचारी काम पूरा होने के बाद भी खुद को ऑनलाइन दिखाने के लिए 'Mouse Jigglers' का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा लोग कीबोर्ड की किसी 'चाबी' (Key) पर भारी चीज दबाकर रखना या माउस के नीचे चलती हुई कलाई घड़ी रखने जैसे देसी जुगाड़ अपनाते हैं, ताकि उनका स्टेटस हमेशा उपलब्ध दिखे।

अगर आप अपना तय काम समय से पहले (जैसे 8 घंटे का काम 4 घंटे में) पूरा कर लें, तो मैनेजमेंट का रवैया क्या होता है?

जल्दी काम खत्म करने का इनाम अक्सर 'और ज़्यादा काम' मिलता है, जिसे कॉर्पोरेट में 'एफिशिएंसी पेनाल्टी' कहते हैं। मैनेजमेंट स्मार्ट वर्क की सराहना करने या आराम देने के बजाय बिना किसी अतिरिक्त इंसेंटिव के नया टास्क सौंप देता है। नतीजा यह होता है कि कर्मचारी बर्नआउट से बचने के लिए काम को जानबूझकर धीमा करना (Work Stretching) और व्यस्त दिखने का नाटक करना बेहतर समझते हैं।

क्या आपको किसी इंसेंटिव के बदले और ज़्यादा काम सौंप दिया जाता है?

अक्सर बिना किसी वित्तीय इंसेंटिव या प्रमोशन के, सबसे तेज और काबिल कर्मचारियों पर ही दूसरों का पेंडिंग काम भी लाद दिया जाता है। मैनेजमेंट का यह रवैया अच्छा काम और ज़्यादा काम" का बोझ बन जाता है। इसी से तंग आकर कर्मचारी जल्दी काम खत्म करने के बावजूद 'Task-Masking' का सहारा लेते हैं और खुद को केवल व्यस्त दिखाते हैं।

आपके ऑफिस में प्रमोशन या तारीफ किसे ज्यादा मिलती है उसे जो चुपचाप अपना काम खत्म करके टाइम पर लॉग-ऑफ कर देता है, या उसे जो काम भले ही कम करे लेकिन देर रात तक ऑनलाइन रहकर ईमेल्स का जवाब देता है?

ज्यादातर ऑफिसों में तारीफ और प्रमोशन 'विजिबिलिटी पॉलिटिक्स' यानी दिखावा करने वाले को ही मिलता है। जो कर्मचारी देर रात तक ऑनलाइन रहकर ईमेल्स का जवाब देता है या वीकेंड पर एक्टिव दिखता है, मैनेजमेंट उसे ही 'डेडिकेटेड' मान लेता है। इसके विपरीत, जो स्मार्ट कर्मचारी चुपचाप अपना काम समय पर खत्म करके लॉग-ऑफ कर देता है, उसे अक्सर कमिटमेंट की कमी या औसत मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

Published on:
13 Jun 2026 01:50 pm