Vande Ganga: देश में पानी के संकट से बाहर आने के समाधान पर विचार नहीं किया गया तो हमारी जीडीपी की दर 6 प्रतिशत तक गिर जाएगी। इसके चलते महंगाई बढ़ेगी। बिजली संकट पैदा होगा। पानी के संकट के चलते हमें क्या दुष्प्रभाव झेलना होगा और इससे बाहर आने का रास्ता क्या होगा? इन सभी मुद्दों पर जल विशेषज्ञ डॉ. सुनील चतुर्वेदी से पत्रिका ने विशेष बातचीत की। आप भी विस्तार से पढ़िए।
Vande Ganga Abhiyan 2026: भारत में नदियां सिर्फ जलदायिनी ही नहीं हैं। ये नदियां हमारे देश की सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक ताकत को परिभाषित करती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों की नदियां उन इलाकों की जीवनरेखा हैं। गंगा को सभी नदियों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि राजस्थान सरकार ने आज (Ganga Dashmi) से शुरू होकर 5 जून 2026 (World Environment Day) तक चलने वाले अभियान का नाम वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान (Vande Ganga Jal Sanrakshan Jan Abhiyan 2026) रखा है। इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार और जल स्रोतों को प्रदूषण (water Pollution) से मुक्ति दिलाना है। जल और पर्यावरण के विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अभियान पूरी दुनिया में मनाने की दरकार है।
भारत गंभीर जल तनाव (water Crisis in India) की ओर बढ़ रहा है। नीति आयोग (Niti Aayog Water Scarcity Report) की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में करीब 60 करोड़ लोग जल संकट का सामना कर रहे हैं। भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता (Per Person Water Availability in India) में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह 1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता प्रतिवर्ष 5000 घन मीटर से अधिक था, लेकिन अब घटकर लगभग 1400–1500 घन मीटर प्रति वर्ष से कम रह गई है। पिछले 75-76 वर्षों में देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में 70 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में 'वंदे गंगा' को सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि जल और पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन की तरह चलाया जाना जरूरी हो गया है। यही वजह है कि इसमें सरकार और सामाज दोनों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान 2026 के बहाने पत्रिका ने जल विशेषज्ञ और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय रहे डॉ. सुनील चतुर्वेदी (Dr. Sunil Chaturvedi) से बातचीत की। वे पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, ग्रामीण विकास और जन-जागरूकता अभियानों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने विशेष रूप से मध्य प्रदेश और ग्रामीण भारत में समुदाय आधारित जल संरक्षण कार्यों को बढ़ावा दिया है।
डॉ. सुनील चतुर्वेदी “जल साक्षरता अभियान” के माध्यम से लोगों को जल संरक्षण के महत्व के प्रति जागरूक करते हैं। उनके नेतृत्व में कई गांवों में वर्षा जल संचयन, जल संरचनाओं का विकास तथा भूजल स्तर सुधारने के प्रयास किए गए हैं। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनभागीदारी को जोड़कर स्थायी जल प्रबंधन पर कार्य करते हैं। आइए उनसे हुई बातचीत के आधार पर हम पानी की समस्या की गंभीरता और उससे उबरने के उपायों के बारे में जानते हैं।
वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान 2026 आज से शुरु होकर 5 जून तक जारी रहेगा। इसमें पारंपरिक पानी की व्यवस्था को ठीक करने की योजना है। क्या ऐसे साप्ताहिक आयोजनों से फर्क पड़ता है?
इस तरह के अभियान का प्रभाव यह होता है कि समूची व्यवस्था पानी की समस्या पर केंद्रित होकर काम करती है और समुदाय में पानी की बचत को लेकर वातावरण निर्मित होता है। असल मुद्दा यह है कि व्यवस्था इन अभियानों को लेकर कितनी गंभीर है। कई बार ऐसे अभियान प्रदर्शन और मीडिया तक सिमट कर रह जाते हैं और समस्या जस की तस बनी रहती है।
हमारी जल व्यवस्था को ठीक करने के लिए किन-किन स्रोतों पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए?
हमारे जल प्रबंधन के लिए परम्परागत जल व्यवस्थाओं का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। राजस्थान की समाज आधारित परम्परागत जल व्यवस्था दुनिया भर में एक नजीर है। हमने वर्षा जल संरक्षण एवं प्रबन्धन वाली इस व्यवस्था को भंग करके भूजल पर निर्भर व्यवस्था बनाई है। परिणाम भूजल स्तर में अत्यधिक गिरावट और जल संकट के रूप में हमारे सामने है। पानी की समस्या के स्थायी समाधान के लिए हमें पानी के प्रबंधन के संदर्भ में अपने पारंपरिक ज्ञान की तरफ लौटते हुए अधिक से अधिक सतही जल संरचनाए बनाकर वर्षा जल का संरक्षण करना होगा।
देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पर्याप्त थी, आज यह धीरे-धीरे कम होती चली जा रही है? पानी के संकट के चलते भविष्य में क्या स्थितियां बनेंगी?
पिछले तीस सालों में हमारी प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता लगभग आधी रह गई है । वर्ष 1994 में हमारे पास 6,000 क्यूबिक मीटर पानी प्रति व्यक्ति उपलब्ध था जो घटकर आज 1600 क्यूबिक मीटर के करीब रह गई है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार आज हमारे देश में 60 करोड़ लोग पानी के संकट से जूझ रहे हैं। वर्ष 2030 तक देश के 21 महानगरों में जीरो डे होगा यानी पानी का भयानक संकट। 2050 तक पहुंचते-पहुंचते हमें भयानक पानी के संकट का सामना करना पड़ेगा।
पानी के संकट के कारण हमारी जीडीपी की दर 6 प्रतिशत तक गिर जाएगी। जीडीपी की दर घटने का मतलब है महंगाई का बढ़ना और आने वाले समय में खाद्यान संकट होगा। हमारे 90 प्रतिशत थर्मल पॉवर में कूलिंग के लिए फ्रेश वाटर की ज़रूरत होती है। यानी बिजली का संकट भी खड़ा होगा। आने वाला समय AI का है। AI के डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए आज हम लगभग 6 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी खर्च कर रहे हैं। यानी लगभग 20 करोड़ लोगों के लिए वर्ष भर का पानी। कहने का मतलब यह है कि पानी का संकट केवल रोजमर्रा में पानी की जरूरत तक सीमित नहीं है बल्कि इसके व्यापक दुष्प्रभाव हमें झेलने होंगे ।
ऐसा क्यों हुआ और क्या किया जाना चाहिए?
इसकी वजह साफ है। हमने हमारे पारंपरिक जल प्रबंधन को विकास के चलते नष्ट कर दिया। आजादी के समय हमारे देश में लगभग 30 लाख से ज्यादा जल संरचनाएं थीं जो आज घटकर 10 लाख भी नहीं रह गई हैं। आज हम अपनी 80 प्रतिशत पानी की जरूरत के लिए भूजल पर निर्भर हैं। इसके चलते भूजल स्तर पिछले तीस सालों में तेजी से नीचे गया है और पानी की क्वालिटी भी खराब हुई है। कई हिस्सों में सेलिनिटी (Water Salinity) बढ़ी है। कई जगह पर पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट की अधिकता है। इस सबका प्रभाव आम आदमी के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
बेहतर स्वास्थ्य के लिए क्या करना होगा?
अब इस संकट से बाहर आने का एक ही तरीका है कि बारिश के पानी को ज़्यादा से ज्याद संरक्षित करें। हमारी परंपरागत जल संरचनाओं को जीवित करें। पानी का दुरुपयोग रोकें। घरों से निकलने वाले पानी का पुनरूपयोग करें। पानी की हर बूंद बचाएं।
एक समय हम गाते थे 'गोदी में खेलती हैं, इसकी हजारों नदियां', अब आप कहते हैं कि हजारों नदियां खत्म हो गई? हम तो नदियों की उपासना करने वाले देश हैं, फिर ऐसा कैसे हुआ?
दोनों अलग चीजें हैं। आस्था अलग और व्यवहार अलग। हम नदियों को मां मानते हैं और अपनी सारी गंदगी नदी में डालते हैं । यह दोहरा चरित्र है औ इसके कारण नदियां प्रदूषित हुई है। जहां तक नदियों के ख़त्म होने का प्रश्न है तो हमें नदी के तंत्र को समझना होगा। यह समझना होगा कि बारिश के बाद जो नदियां ग्लेशियर से नहीं निकली हैं, उनमें पानी कहां से आता है। मोटे तौर पर भूजल का अत्यधिक दोहन, नदी के कैचमेंट एरिया में निर्माण/अतिक्रमण, नदी के आसपास के क्षेत्र में पेड़ों की कटाई जैसे अनेक कारण हैं ।
आप हाल ही में पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा पर गए थे, वहां पानी का रंग, रूप और उनके साथ लोगों का व्यवहार कैसा पाया?
जहां-जहां 'विकास' पहुंचा है, वहां हालात अच्छे नहीं हैं। नदियों में गंदगी बहाई जा रही है। नदियों के किनारे रिसॉर्ट बने हैं। नदियों के बीच में बैठाकर पर्यटकों को सब कुछ परोसा जा रहा है। अन्य प्रदेशों के लोग पूर्वोत्तर के राज्यों में पहुंच रहे हैं। आदिवासियों से जमीन लीज पर लेकर रासायनिक खाद का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। पानी का खूब दोहन कर रहे हैं। पेड़ बड़ी संख्या में काटकर चाय के बागान और खेत तैयार किए जा रहे हैं। इन सभी बातों से आप समझ सकते हैं कि कल वहां भी क्या होने जा रहा है। नदी, पानी, पर्यावरण को लेकर यदि कठोर नीतियां बनाकर उन पर सख्ती से अमल नहीं किया गया तो मनुष्य जाति का भविष्य भयावह होगा।