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Cosmeticorexia : बच्चों में स्किनकेयर के जुनून के पीछे का सच डर्मेटोलॉजिस्ट और मनोचिकित्सक से जानिए

Cosmeticorexia Craze : क्या आपका बच्चा भी हर समय आईना देखता है और महंगे स्किनकेयर प्रोडक्ट्स मांग रहा है? जानिए सोशल मीडिया और ब्यूटी ब्रांड्स की मार्केटिंग कैसे बच्चों को 'कॉस्मेटिकओरेक्सिया ' और 'बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर' कि तरफ धकेल रही है।

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Jun 11, 2026
Cosmeticorexia dermorexia Digital Trend Teenager Premature Aging
वक्त से पहले बच्चों को बूढ़ा बना रहा है यह नया ट्रेंड! ( Photo: AI Generated)

Cosmeticorexia: सोशल मीडिया ने हमारी जीवनशैली को पूरी तरह से बदल दिया है। रील्स, शॉर्ट्स और टिकटॉक वीडियो के इस दौर में "परफेक्ट दिखने" की चाहत सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों और किशोरों (Teenagers) के सिर चढ़कर बोल रही है। इसी अंधी दौड़ से एक नया और बेहद चिंताजनक ट्रेंड सामने आया है, जिसे हेल्थ और ब्यूटी एक्सपर्ट्स 'कॉस्मेटिकओरेक्सिया' (Cosmeticorexia) कह रहे हैं।

आइए विस्तार से समझते हैं कि कॉस्मेटिकओरेक्सिया क्या है, इसके कारण क्या हैं, यह हमारी त्वचा और मानसिक स्वास्थ्य को कैसे नुकसान पहुंचा रहा है और इससे कैसे बचा जा सकता है।

What is Cosmeticorexia?: कॉस्मेटिकओरेक्सिया क्या है?

सरल शब्दों में कहें तो, एंटी-एजिंग (उम्र छुपाने वाले) प्रोडक्ट्स, महंगे स्किनकेयर कॉस्मेटिक्स और मेकअप का इस्तेमाल करने के प्रति एक अस्वास्थ्यकर जुनून (Obsession) को कॉस्मेटिकओरेक्सिया कहा जाता है। यह समस्या विशेष रूप से जेनरेशन जेड (Gen Z) और 10 से 15 साल के बच्चों (जिन्हें 'Sephora Kids' भी कहा जा रहा है) में बहुत तेजी से देखी जा रही है। इस स्थिति से पीड़ित बच्चों और युवाओं को हर समय यह डर सताता है कि उनकी त्वचा खराब हो रही है या वे बूढ़े दिख रहे हैं। नतीजा, वे उन हैवी केमिकल्स, रेटिनॉल, विटामिन-सी सीरम और एंटी-रिंकल क्रीम का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिनकी उनकी कोमल त्वचा को बिल्कुल भी जरूरत नहीं होती।

इस खतरनाक ट्रेंड के पीछे के मुख्य कारण

  • सोशल मीडिया और 'इन्फ्लुएंसर' संस्कृति : इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर्स दिन में 10-10 स्टेप्स वाले स्किनकेयर रूटीन दिखाते हैं। 'Get Ready With Me' (GRWM) वीडियोज को देखकर कम उम्र के बच्चे आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि ग्लोइंग स्किन पाने का यही एकमात्र तरीका है।
  • ब्यूटी ऐप्स और फिल्टर्स का भ्रम : स्नैपचैट और इंस्टाग्राम के ब्यूटी फिल्टर्स चेहरे के हर दाग-धब्बे को छुपाकर एक काल्पनिक 'परफेक्ट स्किन' दिखाते हैं। जब युवा खुद को बिना फिल्टर के आईने में देखते हैं, तो वे हीन भावना (Insecurity) का शिकार हो जाते हैं और उसे ठीक करने के लिए कॉस्मेटिक्स की शरण में जाते हैं।
  • कॉस्मेटिक कंपनियों की आक्रामक मार्केटिंग: ब्यूटी ब्रांड्स अब बच्चों को लुभाने के लिए पेस्टल कलर्स, खुशबूदार और आकर्षक पैकेजिंग वाले प्रोडक्ट्स बना रहे हैं। विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि अगर आप 12 साल की उम्र से स्किनकेयर शुरू नहीं करेंगे, तो आपकी त्वचा जल्दी बूढ़ी हो जाएगी। यह डर ही उनकी बिक्री बढ़ाता है।
  • कॉस्मेटिकओरेक्सिया के त्वचा पर दुष्प्रभाव (Physical Impact): बच्चों और किशोरों की त्वचा बहुत संवेदनशील और प्राकृतिक रूप से कोमल होती है। जब वे बिना जरूरत के भारी केमिकल्स का इस्तेमाल करते हैं, तो इसके विपरीत परिणाम सामने आते हैं।
  • स्किन बैरियर का टूटना: हमारी त्वचा की एक प्राकृतिक सुरक्षात्मक परत (Skin Barrier) होती है। अत्यधिक एसिड (जैसे AHA/BHA) और पीलिंग सॉल्यूशंस के इस्तेमाल से यह परत नष्ट हो जाती है, जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है।
  • समय से पहले बुढ़ापा (Premature Aging): विडंबना यह है कि जिस बुढ़ापे से बचने के लिए ये प्रोडक्ट्स लगाए जाते हैं, अत्यधिक केमिकल के कारण त्वचा समय से पहले ढीली पड़ने लगती है और झुर्रियां आने लगती हैं।
  • गंभीर इन्फेक्शन और एलर्जी: कम उम्र में रेटिनॉल जैसी मजबूत दवाओं के इस्तेमाल से त्वचा पर लाल चकत्ते (Redness), जलन, सूजन और क्रोनिक एक्ने (मुंहासे) की समस्या हो सकती है।

डॉ.पुनीत अग्रवाल (डर्मेटोलॉजिस्ट) के साथ पत्रिका की खास बातचीत

आजकल क्लिनिक में ऐसे कितने मामले आ रहे हैं जहां बहुत कम उम्र के बच्चे (10-15 साल) एंटी-एजिंग या हैवी केमिकल प्रोडक्ट्स की शिकायत लेकर हो रहे हैं? सबसे आम समस्या क्या देखने को मिल रही है?

पिछले कुछ समय से क्लिनिक में ऐसे मामलों में 30-40% की भारी बढ़ोतरी हुई है। हर हफ्ते 10 से 15 साल के कई बच्चे और उनके चिंतित माता-पिता हमारे पास आ रहे हैं। इन बच्चों में सबसे आम समस्या 'स्किन बैरियर का बुरी तरह डैमेज होना' देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को देखकर बच्चे कम उम्र में ही सैलिसिलिक एसिड, AHA/BHA पील्स और रेटिनॉल जैसे हार्ड केमिकल्स लगा रहे हैं। इसके कारण उनकी कोमल त्वचा पर अत्यधिक सूखापन (Dryness), त्वचा का लाल पड़ना (Redness), तेज जलन, चकत्ते और अचानक गंभीर मुंहासे (क्रोनिक एक्ने) उभरने जैसी गंभीर शिकायतें आ रही हैं।"

सोशल मीडिया पर देखकर बच्चे रेटिनॉल, सैलिसिलिक एसिड और विटामिन-सी जैसे एक्टिव इंग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। कम उम्र की त्वचा पर इन केमिकल्स का क्या असर होता है?

बच्चों की त्वचा प्राकृतिक रूप से बहुत पतली, कोमल और संवेदनशील होती है। जब वे सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर रेटिनॉल, सैलिसिलिक एसिड या विटामिन-सी जैसे स्ट्रॉन्ग एक्टिव इंग्रीडिएंट्स लगाते हैं, तो इसके गंभीर और विपरीत परिणाम होते हैं:

  • स्किन बैरियर का नष्ट होना: अत्यधिक एसिड्स त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षात्मक परत को तोड़ देते हैं, जिससे चेहरा पूरी तरह रूखा, बेजान और पपड़ीदार हो जाता है।
  • त्वचा की गंभीर बीमारियां: कम उम्र में रेटिनॉल जैसी दवाओं से चेहरे पर तेज जलन, सूजन, लाल चकत्ते (Redness) और क्रोनिक मुंहासे होने लगते हैं।
  • समय से पहले बुढ़ापा: इन हैवी केमिकल्स के ओवरडोज़ से त्वचा की कोशिकाएं डैमेज होती हैं, जिससे त्वचा ढीली पड़ने लगती है ।

क्या इनसे 'स्किन बैरियर' हमेशा के लिए खराब हो सकता है?

नहीं, 'स्किन बैरियर' हमेशा के लिए नष्ट नहीं होता, क्योंकि त्वचा में खुद को रिपेयर करने की अद्भुत प्राकृतिक क्षमता होती है। लेकिन अगर कम उम्र में लंबे समय तक इन हैवी केमिकल्स का इस्तेमाल जारी रहे, तो डैमेज बहुत गहरा हो सकता है जिसे ठीक होने में कई महीने या साल लग जाते हैं। त्वचा को दोबारा सामान्य करने के लिए सभी एक्टिव प्रोडक्ट्स को तुरंत बंद करके डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह से एक बेहद बेसिक रूटीन (माइल्ड क्लींजर, मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन) अपनाना पड़ता है।

एक बड़ा विरोधाभास यह है कि बच्चे झुर्रियों से बचने के लिए ये प्रोडक्ट्स लगा रहे हैं। क्या बिना जरूरत इन केमिकल्स का इस्तेमाल त्वचा को समय से पहले बूढ़ा (Premature Aging) बना सकता है?

जिस उम्र में त्वचा में नेचुरल कोलाजन और ग्लो होता है, उस उम्र में एंटी-एजिंग केमिकल्स लगाने से त्वचा की प्राकृतिक रिपेयरिंग क्षमता खत्म हो जाती है। अत्यधिक एसिड्स और रेटिनॉल के कारण स्किन बैरियर टूटने से त्वचा में नमी रुकना बंद हो जाती है। परिणाम यह होता है कि कोमल त्वचा रूखी, बेजान और ढीली पड़ने लगती है, जिससे चेहरे पर समय से पहले ही बारीक रेखाएं और झुर्रियां (Premature Aging) साफ नजर आने लगती हैं।

एक डॉक्टर के तौर पर आप क्या मानते हैं कि 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए वास्तविक स्किनकेयर रूटीन क्या होना चाहिए?

15 साल से कम उम्र के बच्चों की त्वचा में प्राकृतिक चमक और नमी होती है, इसलिए उन्हें किसी भी तामझाम या एक्टिव इंग्रीडिएंट्स की बिल्कुल जरूरत नहीं है। उनके लिए 'लेस इज मोर' (कम ही बेहतर है) का नियम लागू होता है।

एक वास्तविक और सुरक्षित स्किनकेयर रूटीन में केवल तीन बुनियादी चीजें शामिल होनी चाहिए

  • माइल्ड क्लींजर: दिन में दो बार चेहरा साफ करने के लिए एक सौम्य फेस वॉश।
  • मॉइस्चराइजर: त्वचा की कोमलता को बनाए रखने के लिए एक सादा, खुशबू-रहित मॉइस्चराइजर।
  • सनस्क्रीन: धूप से सुरक्षा के लिए SPF 30+ सनस्क्रीन। बस, इसके अलावा कुछ भी लगाना त्वचा के साथ खिलवाड़ है।

माता-पिता और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिलकर क्या कदम उठाने चाहिए ?

  • माता-पिता की भूमिका (Parental Guidance) : माता-पिता को अपने बच्चों की इंटरनेट एक्टिविटी पर नजर रखनी चाहिए। उन्हें बच्चों को समझाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चीज सच नहीं होती। बच्चों को 'लेस इज मोर' (कम ही बेहतर है) का सिद्धांत सिखाएं। उनके लिए सिर्फ एक माइल्ड क्लींजर, मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन ही काफी है।
  • 'स्किन पॉजिटिविटी' को बढ़ावा देना: डिजिटल क्रिएटर्स और मीडिया को 'स्किन पॉजिटिविटी' पर बात करनी चाहिए। यह समझाना जरूरी है कि चेहरे पर पोर्स (Pores), हल्के दाग या टेक्सचर होना पूरी तरह से सामान्य (Normal) है। असली त्वचा प्लास्टिक की तरह चमकदार नहीं होती।
  • नियमों और उम्र की पाबंदी: कुछ देशों में अब ब्यूटी स्टोर्स में बच्चों को एंटी-एजिंग प्रोडक्ट्स बेचने पर बैन लगाने की मांग उठ रही है। भारत में भी इस तरह की जागरूकता की बेहद जरूरत है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी कम उम्र के बच्चों को टारगेट करने वाले ब्यूटी विज्ञापनों पर लगाम लगानी चाहिए।

डॉ. सुनील शर्मा (मनोचिकित्सक) के साथ पत्रिका की खास बातचीत

कॉस्मेटिकओरेक्सिया को केवल एक 'ब्यूटी ट्रेंड' माना जाता है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के नजरिए से यह बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) या ओसीडी (OCD) से कैसे जुड़ा है?

कॉस्मेटिकओरेक्सिया महज एक चकाचौंध भरा ब्यूटी ट्रेंड नहीं, बल्कि एक गहरा मानसिक विकार है, जो बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) और ओसीडी (OCD) से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। बीडीडी (BDD) के मरीज अपने चेहरे या शरीर की काल्पनिक खामियों को लेकर हर समय हीन भावना और इनसिक्योरिटी से घिरे रहते हैं। कॉस्मेटिकओरेक्सिया इसी इनसिक्योरिटी का व्यावहारिक रूप है। जब लुक्स को लेकर यह चिंता ओसीडी (OCD) की तरह एक जुनूनी विचार (Obsession) बन जाती है, तो बच्चे बार-बार आईना देखने या हैवी स्किनकेयर प्रोडक्ट्स खरीदने जैसी मजबूर आदत (Compulsion) का शिकार हो जाते हैं। वे चेहरे को नहीं, बल्कि अपने दिमाग के डर को ठीक करने की कोशिश कर रहे होते हैं।

इंस्टाग्राम रील्स, स्नैपचैट फिल्टर्स और 'परफेक्ट लुक' की अंधी दौड़ बच्चों के आत्मसम्मान (Self-esteem) को किस तरह खोखला कर रही है?

सोशल मीडिया के ये ब्यूटी फिल्टर्स बच्चों को एक ऐसी काल्पनिक और बेदाग दुनिया में ले जाते हैं जो असल में मौजूद ही नहीं है। जब बच्चे रील्स पर खुद को या दूसरों को इन फिल्टर्स के साथ देखते हैं, तो उनका दिमाग इसे ही 'खूबसूरती का पैमाना' मान लेता है। इसके बाद जब वे बिना फिल्टर के आईने में अपनी वास्तविक त्वचा देखते हैं, तो उनका आत्मसम्मान (Self-esteem) पूरी तरह टूट जाता है। उनमें यह हीन भावना घर कर जाती है कि वे जैसे हैं, वैसे अच्छे नहीं हैं। उनका पूरा आत्मविश्वास पढ़ाई या हुनर के बजाय केवल इस बात पर टिक जाता है कि वे स्क्रीन पर कितने परफेक्ट दिख रहे हैं, जो उन्हें गंभीर एंग्जायटी की ओर धकेलता है।

माता-पिता कैसे समझें कि उनके बच्चे का स्किनकेयर के प्रति लगाव एक सामान्य आदत है या वह किसी मानसिक असुरक्षा (Insecurity) या बीडीडी का शिकार हो चुका है?

सामान्य आदत और मानसिक बीमारी के बीच के अंतर को उनके व्यवहार से समझा जा सकता है। अगर बच्चा सामान्य रूप से त्वचा साफ रखता है, तो यह ग्रूमिंग है तो यह बीडीडी (BDD) का संकेत हो सकता है।

  • घंटों समय गंवाना: बाथरूम या आईने के सामने घंटों बिताना और हर समय अपनी त्वचा की कमियों को ही ढूंढते रहना।
  • अत्यधिक पैनिक होना: चेहरे पर एक छोटा सा दाना या दाग होने पर भी अत्यधिक घबरा जाना, रोने लगना या स्कूल और दोस्तों से मिलने जाने से मना कर देना।
  • सोशल विड्रॉल: इस डर से सामाजिक दूरी बना लेना कि लोग उनके लुक्स का मजाक उड़ाएंगे।

ऐसे मामलों में जहां बच्चा अपने लुक्स को लेकर डिप्रेशन या एंग्जायटी में चला जाता है, वहां आप किस तरह की थेरेपी (जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी CBT) का इस्तेमाल करते हैं? यह कैसे मदद करती है?

त्वचा की देखभाल की सामान्य आदत (Normal Habit) और 'बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर' (BDD) के व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर है, जिसे माता-पिता को पहचानना बेहद जरूरी है।

  • सामान्य आदत (Normal Skincare): इसमें त्वचा के प्रति सकारात्मक और संतुलित रवैया होता है। बच्चे रोजमर्रा में महज 10-15 मिनट का समय देते हैं, दिन में सिर्फ एक-दो बार आईना देखते हैं और अपनी उम्र के अनुकूल (Age-Appropriate) हल्के या प्राकृतिक प्रोडक्ट्स चुनते हैं। ऐसे बच्चे मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर सभी सामाजिक गतिविधियों में खुलकर हिस्सा लेते हैं।
  • बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD): यह एक मानसिक विकार है जहां बच्चा गहरी असुरक्षा और हीन भावना से घिरा रहता है। वह जुनूनी होकर हर 10 मिनट में त्वचा जांचता है और दिन में 10 से 20 बार आईना देखता है। उम्र के विपरीत (Age-Inappropriate) असुरक्षित, भारी मल्टी-स्टेप प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना, गंभीर एंग्जायटी से जूझना और मज़ाक उड़ने के डर से समाज व दोस्तों से दूरी (Social Withdrawal) बना लेना इसके मुख्य लक्षण हैं।
Published on:
11 Jun 2026 01:18 pm
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