
Pregorexia Culture: सोशल मीडिया के इस दौर में 'परफेक्ट बॉडी इमेज' का दबाव इस कदर बढ़ गया है कि यह महिलाओं के जीवन के सबसे खूबसूरत सफर यानी गर्भावस्था (Pregnancy) को भी प्रभावित कर रहा है। हाल के दिनों में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में आया है- 'प्रेगोरेक्सिया' (Pregorexia)। यह कोई आम समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मानसिक और शारीरिक स्थिति है, जो न सिर्फ होने वाली मां बल्कि गर्भ में पल रहे मासूम के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर 'प्रेगोरेक्सिया' क्या है, इसके पीछे की वजहें क्या हैं और यह कैसे एक साइलेंट खतरे के रूप में उभर रहा है।
'प्रेगोरेक्सिया' (Pregorexia) दो शब्दों गर्भावस्था (Pregnancy) और अनोरेक्सिया (Anorexia से मिलकर बना है। अनोरेक्सिया एक गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder) जिसमें इंसान वजन बढ़ने के डर से खाना छोड़ देता है। हालांकि मेडिकल साइंस (Medical Science) में इसे अभी तक आधिकारिक बीमारी का दर्जा नहीं मिला है, लेकिन दुनिया भर के (गाइनोकोलॉजिस्ट और साइकाइट्रिस्ट) इस व्यवहार को 'प्रेग्नेंसी के दौरान ईटिंग डिसऑर्डर' (Eating Disorder) के रूप में देखते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो जब एक गर्भवती महिला अपने शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलावों और बढ़ते वजन को स्वीकार नहीं कर पाती और पतले दिखने की चाह में जरूरत से कम खाने लगती है या अत्यधिक वर्कआउट करने लगती है, तो इस स्थिति को प्रेगोरेक्सिया कहा जाता है।
गर्भावस्था में मूड स्विंग्स या खाने की इच्छा में बदलाव होना सामान्य है, लेकिन प्रेगोरेक्सिया के लक्षण इससे बिल्कुल अलग और डरावने होते हैं। इन्हें पहचानना बेहद जरूरी है।
सोशल मीडिया और 'बाउंस बैक' कल्चर का यह चलन क्यों बढ़ रहा है ?
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ऐप्स ने इस समस्या को हवा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। इंटरनेट पर अक्सर सेलिब्रिटीज या इन्फ्लुएंसर्स की ऐसी तस्वीरें और वीडियोज वायरल होते हैं, जिनमें वे प्रेग्नेंसी के दौरान भी बेहद स्लिम नजर आती हैं या डिलीवरी के महज कुछ ही हफ्तों बाद 'सिक्स-पैक एब्स' या 'जीरो साइज' में लौट आती हैं। इसे "Bounce Back" (बाउंस बैक) कल्चर कहा जाता है। इसे देखकर आम महिलाओं के मन में यह हीन भावना घर करने लग जाती हैं। मानों प्रेग्नेंसी में वजन बढ़ना एक कमजोरी या खामी है। वे भूल जाती हैं कि हर महिला का शरीर अलग होता है और स्क्रीन पर दिखने वाली तस्वीरें अक्सर एडिटेड या कड़े प्रोफेशनल सुपरविजन में होती हैं। इसके अलावा, जिन महिलाओं का पहले कभी ईटिंग डिसऑर्डर का इतिहास रहा हो, उनमें प्रेग्नेंसी के दौरान इसके दोबारा ट्रिगर होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
अगर कोई प्रेग्नेंट महिला वजन बढ़ने के डर से अपनी डाइट आधी कर दे, तो बच्चे के अंगों (विशेषकर दिमाग और दिल) के विकास पर इसका क्या और कितना गंभीर असर पड़ता है?
जब एक गर्भवती महिला वजन बढ़ने के डर से अपनी डाइट आधी कर देती है, तो गर्भ में पल रहे बच्चे को जरूरी ग्लूकोज, एमीनो एसिड और फैटी एसिड नहीं मिल पाते। इसका सबसे गंभीर असर बच्चे के दिमाग (Brain) पर पड़ता है। न्यूरॉन्स का विकास रुक जाता है, जिससे बच्चे का आईक्यू (IQ) कम हो सकता है और भविष्य में उसे न्यूरोलॉजिकल बीमारियां हो सकती हैं। वहीं, दिल (Heart) के विकास के लिए जरूरी न्यूट्रिशन न मिलने से बच्चे की कार्डियोवैस्कुलर संरचना कमजोर हो जाती है। ऐसे बच्चों में जन्म के बाद और वयस्क होने पर हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट फेलियर और कोरोनरी आर्टरी डिजीज (दिल का दौरा) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसे मेडिकल भाषा में Fetal Programming कहते हैं, जहां गर्भ का कुपोषण बच्चे को जीवनभर के लिए दिल और दिमाग का मरीज बना देता है।
प्रेग्नेंसी में एक्टिव रहना अच्छा है, लेकिन 'हेल्दी वर्कआउट या हेवी एक्सरसाइज' और 'ओवर-एक्सरसाइजिंग' (वजन घटाने के लिए अत्यधिक कसरत) के बीच की बाउंड्री लाइन क्या है? एक प्रेग्नेंट महिला को कब रुक जाना चाहिए?
प्रेग्नेंसी में 'हेल्दी वर्कआउट' का मतलब है- हफ्ते में 150 मिनट की मीडियम लेवल की कसरत (जैसे वॉक या प्रिनेटल योग। वहीं, 'ओवर-एक्सरसाइजिंग' वह स्थिति है जहां वजन घटाने या स्लिम दिखने के जुनून में महिला अपनी क्षमता से ज्यादा भारी वर्कआउट करती है, जिससे शरीर का तापमान खतरनाक रूप से बढ़ जाता है और भ्रूण तक ऑक्सीजन की सप्लाई कम हो सकती है।
क्या डाइट कम करके सिर्फ विटामिंस या प्रोटीन शेक/सप्लीमेंट्स के भरोसे एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया जा सकता है? इसके क्या रिस्क हैं?
नहीं, सिर्फ सप्लीमेंट्स या प्रोटीन शेक के भरोसे स्वस्थ बच्चे को जन्म बिल्कुल नहीं दिया जा सकता। सप्लीमेंट्स केवल 'पूरक' होते हैं, वे असली भोजन (Whole Foods) का विकल्प नहीं हैं। भोजन से मिलने वाले नेचुरल मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट, फैट्स) और फाइबर बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए अनिवार्य हैं। इसके मुख्य रिस्क हैं-
क्या आपके पास ओपीडी (OPD) में ऐसे केसेस आए हैं, जहां गर्भवती महिलाएं वजन बढ़ने की वजह से रोने लगती हैं या खाना छोड़ देती हैं? ऐसा व्यवहार किस उम्र की महिलाओं में ज्यादा दिख रहा है?
ओपीडी (OPD) में अब ऐसे केसेस लगातार सामने आ रहे हैं। कई गर्भवती महिलाएं अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखने के बजाय इस बात पर रोने लगती हैं कि उनका वजन 2 किलो बढ़ गया है। वे डॉक्टरों से वजन घटाने की दवाइयां या डाइट चार्ट मांगती हैं और चोरी-छिपे खाना छोड़ देती हैं। यह व्यवहार सबसे ज्यादा 22 से 32 वर्ष की उम्र की महिलाओं (विशेषकर अर्बन और वर्किंग क्लास) में दिख रहा है। यह वह पीढ़ी है जो सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम रील्स) पर सबसे ज्यादा एक्टिव है। पहली बार मां बनने वाली महिलाओं में यह डर और भी गंभीर होता है क्योंकि वे पीयर प्रेशर और 'परफेक्ट बॉडी' के डिजिटल भ्रमजाल का शिकार आसानी से हो जाती हैं।
डाइटिंग या प्रेगोरेक्सिया की शिकार महिलाओं को डिलीवरी के वक्त (चाहे नॉर्मल हो या सी-सेक्शन) किस तरह के बड़े मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस का सामना करना पड़ता है?
प्रेगोरेक्सिया या डाइटिंग की शिकार महिलाओं को डिलीवरी के वक्त निम्नलिखित गंभीर मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस (जटिलताओं) का सामना करना पड़ता है:
प्रेगोरेक्सिया की इस समस्या से कैसे निपटें?
प्रेगोरेक्सिया का इलाज सिर्फ डाइट चार्ट बदलना नहीं है, क्योंकि यह एक मानसिक लड़ाई है। इसके लिए एक कंबाइंड अप्रोच की जरूरत होती है।