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प्रेग्नेंसी में मोटापे का डर? कहीं आप ‘Pregorexia’ की शिकार तो नहीं?

Pregorexia: प्रेग्नेंसी के दौरान वजन बढ़ने के डर से कम खाना या अत्यधिक एक्सरसाइज करना 'Pregorexia' कहलाता है। डॉक्टर से जानिए इसके लक्षण, कारण और सेहत पर होने वाले गंभीर नुकसान।

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Jun 22, 2026
Pregorexia obesity reels Culture Birth
क्या प्रेग्नेंसी में डाइटिंग सही है?

Pregorexia Culture: सोशल मीडिया के इस दौर में 'परफेक्ट बॉडी इमेज' का दबाव इस कदर बढ़ गया है कि यह महिलाओं के जीवन के सबसे खूबसूरत सफर यानी गर्भावस्था (Pregnancy) को भी प्रभावित कर रहा है। हाल के दिनों में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में आया है- 'प्रेगोरेक्सिया' (Pregorexia)। यह कोई आम समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मानसिक और शारीरिक स्थिति है, जो न सिर्फ होने वाली मां बल्कि गर्भ में पल रहे मासूम के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर 'प्रेगोरेक्सिया' क्या है, इसके पीछे की वजहें क्या हैं और यह कैसे एक साइलेंट खतरे के रूप में उभर रहा है।

What is Pregorexia: क्या होता है 'प्रेगोरेक्सिया'?

'प्रेगोरेक्सिया' (Pregorexia) दो शब्दों गर्भावस्था (Pregnancy) और अनोरेक्सिया (Anorexia से मिलकर बना है। अनोरेक्सिया एक गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder) जिसमें इंसान वजन बढ़ने के डर से खाना छोड़ देता है। हालांकि मेडिकल साइंस (Medical Science) में इसे अभी तक आधिकारिक बीमारी का दर्जा नहीं मिला है, लेकिन दुनिया भर के (गाइनोकोलॉजिस्ट और साइकाइट्रिस्ट) इस व्यवहार को 'प्रेग्नेंसी के दौरान ईटिंग डिसऑर्डर' (Eating Disorder) के रूप में देखते हैं। सरल शब्दों में कहें, तो जब एक गर्भवती महिला अपने शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलावों और बढ़ते वजन को स्वीकार नहीं कर पाती और पतले दिखने की चाह में जरूरत से कम खाने लगती है या अत्यधिक वर्कआउट करने लगती है, तो इस स्थिति को प्रेगोरेक्सिया कहा जाता है।

Symptoms of Pregorexia: प्रेगोरेक्सिया के मुख्य लक्षण

गर्भावस्था में मूड स्विंग्स या खाने की इच्छा में बदलाव होना सामान्य है, लेकिन प्रेगोरेक्सिया के लक्षण इससे बिल्कुल अलग और डरावने होते हैं। इन्हें पहचानना बेहद जरूरी है।

  • कैलोरी काउंट पर अत्यधिक ध्यान देना: गर्भावस्था के दौरान महिलाएं दिनभर में जो कुछ भी खाती है, उसकी कैलोरी गिनने लगती है और बच्चे के विकास के लिए जरूरी न्यूट्रिशन से समझौता करने लगती है।
  • अकेले में खाना खाना: ऐसी महिलाएं अक्सर परिवार या दोस्तों के सामने खाना खाने से कतराती हैं, ताकि कोई उनकी बेहद कम डाइट पर सवाल न उठा सके।
  • अत्यधिक और भारी वर्कआउट: प्रेग्नेंसी में हल्की वॉक या योग की सलाह दी जाती है, लेकिन प्रेगोरेक्सिया से पीड़ित महिला वजन घटाने के लिए भारी और थका देने वाली एक्सरसाइज करती है।
  • बेबी बंप को छिपाना: शरीर के बदलते आकार को स्वीकार न कर पाने के कारण वे बहुत ढीले कपड़े पहनती हैं ताकि उनका बेबी बंप या बढ़ा हुआ वजन किसी को न दिखे।
  • वजन को लेकर लगातार तनाव: दिन में कई बार वेटिंग मशीन पर वजन नापना और जरा सा भी वजन बढ़ने पर पैनिक (तनाव) हो जाना।

पत्रिका के सवाल-जवाब डॉ.मेघा.एस.शास्त्री के साथ

सोशल मीडिया और 'बाउंस बैक' कल्चर का यह चलन क्यों बढ़ रहा है ?

डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ऐप्स ने इस समस्या को हवा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। इंटरनेट पर अक्सर सेलिब्रिटीज या इन्फ्लुएंसर्स की ऐसी तस्वीरें और वीडियोज वायरल होते हैं, जिनमें वे प्रेग्नेंसी के दौरान भी बेहद स्लिम नजर आती हैं या डिलीवरी के महज कुछ ही हफ्तों बाद 'सिक्स-पैक एब्स' या 'जीरो साइज' में लौट आती हैं। इसे "Bounce Back" (बाउंस बैक) कल्चर कहा जाता है। इसे देखकर आम महिलाओं के मन में यह हीन भावना घर करने लग जाती हैं। मानों प्रेग्नेंसी में वजन बढ़ना एक कमजोरी या खामी है। वे भूल जाती हैं कि हर महिला का शरीर अलग होता है और स्क्रीन पर दिखने वाली तस्वीरें अक्सर एडिटेड या कड़े प्रोफेशनल सुपरविजन में होती हैं। इसके अलावा, जिन महिलाओं का पहले कभी ईटिंग डिसऑर्डर का इतिहास रहा हो, उनमें प्रेग्नेंसी के दौरान इसके दोबारा ट्रिगर होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

अगर कोई प्रेग्नेंट महिला वजन बढ़ने के डर से अपनी डाइट आधी कर दे, तो बच्चे के अंगों (विशेषकर दिमाग और दिल) के विकास पर इसका क्या और कितना गंभीर असर पड़ता है?

जब एक गर्भवती महिला वजन बढ़ने के डर से अपनी डाइट आधी कर देती है, तो गर्भ में पल रहे बच्चे को जरूरी ग्लूकोज, एमीनो एसिड और फैटी एसिड नहीं मिल पाते। इसका सबसे गंभीर असर बच्चे के दिमाग (Brain) पर पड़ता है। न्यूरॉन्स का विकास रुक जाता है, जिससे बच्चे का आईक्यू (IQ) कम हो सकता है और भविष्य में उसे न्यूरोलॉजिकल बीमारियां हो सकती हैं। वहीं, दिल (Heart) के विकास के लिए जरूरी न्यूट्रिशन न मिलने से बच्चे की कार्डियोवैस्कुलर संरचना कमजोर हो जाती है। ऐसे बच्चों में जन्म के बाद और वयस्क होने पर हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट फेलियर और कोरोनरी आर्टरी डिजीज (दिल का दौरा) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसे मेडिकल भाषा में Fetal Programming कहते हैं, जहां गर्भ का कुपोषण बच्चे को जीवनभर के लिए दिल और दिमाग का मरीज बना देता है।

प्रेग्नेंसी में एक्टिव रहना अच्छा है, लेकिन 'हेल्दी वर्कआउट या हेवी एक्सरसाइज' और 'ओवर-एक्सरसाइजिंग' (वजन घटाने के लिए अत्यधिक कसरत) के बीच की बाउंड्री लाइन क्या है? एक प्रेग्नेंट महिला को कब रुक जाना चाहिए?

प्रेग्नेंसी में 'हेल्दी वर्कआउट' का मतलब है- हफ्ते में 150 मिनट की मीडियम लेवल की कसरत (जैसे वॉक या प्रिनेटल योग। वहीं, 'ओवर-एक्सरसाइजिंग' वह स्थिति है जहां वजन घटाने या स्लिम दिखने के जुनून में महिला अपनी क्षमता से ज्यादा भारी वर्कआउट करती है, जिससे शरीर का तापमान खतरनाक रूप से बढ़ जाता है और भ्रूण तक ऑक्सीजन की सप्लाई कम हो सकती है।

क्या डाइट कम करके सिर्फ विटामिंस या प्रोटीन शेक/सप्लीमेंट्स के भरोसे एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया जा सकता है? इसके क्या रिस्क हैं?

नहीं, सिर्फ सप्लीमेंट्स या प्रोटीन शेक के भरोसे स्वस्थ बच्चे को जन्म बिल्कुल नहीं दिया जा सकता। सप्लीमेंट्स केवल 'पूरक' होते हैं, वे असली भोजन (Whole Foods) का विकल्प नहीं हैं। भोजन से मिलने वाले नेचुरल मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट, फैट्स) और फाइबर बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए अनिवार्य हैं। इसके मुख्य रिस्क हैं-

  • टॉक्सिसिटी (Toxicity): बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट्स लेने से शरीर में विटामिंस का ओवरडोज हो सकता है, जो बच्चे में जन्मजात विकृतियां (Birth Defects) पैदा कर सकता है।
  • आईयूजीआर (IUGR): गर्भ में बच्चे का विकास रुक जाना (Intrauterine Growth Restriction)।
  • अंगों का अधूरा विकास: प्रोटीन शेक में मौजूद प्रिजर्वेटिव्स और केमिकल बच्चे के लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

क्या आपके पास ओपीडी (OPD) में ऐसे केसेस आए हैं, जहां गर्भवती महिलाएं वजन बढ़ने की वजह से रोने लगती हैं या खाना छोड़ देती हैं? ऐसा व्यवहार किस उम्र की महिलाओं में ज्यादा दिख रहा है?

ओपीडी (OPD) में अब ऐसे केसेस लगातार सामने आ रहे हैं। कई गर्भवती महिलाएं अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखने के बजाय इस बात पर रोने लगती हैं कि उनका वजन 2 किलो बढ़ गया है। वे डॉक्टरों से वजन घटाने की दवाइयां या डाइट चार्ट मांगती हैं और चोरी-छिपे खाना छोड़ देती हैं। यह व्यवहार सबसे ज्यादा 22 से 32 वर्ष की उम्र की महिलाओं (विशेषकर अर्बन और वर्किंग क्लास) में दिख रहा है। यह वह पीढ़ी है जो सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम रील्स) पर सबसे ज्यादा एक्टिव है। पहली बार मां बनने वाली महिलाओं में यह डर और भी गंभीर होता है क्योंकि वे पीयर प्रेशर और 'परफेक्ट बॉडी' के डिजिटल भ्रमजाल का शिकार आसानी से हो जाती हैं।

डाइटिंग या प्रेगोरेक्सिया की शिकार महिलाओं को डिलीवरी के वक्त (चाहे नॉर्मल हो या सी-सेक्शन) किस तरह के बड़े मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस का सामना करना पड़ता है?

प्रेगोरेक्सिया या डाइटिंग की शिकार महिलाओं को डिलीवरी के वक्त निम्नलिखित गंभीर मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस (जटिलताओं) का सामना करना पड़ता है:

  • यूटेराइन इनर्शिया (Uterine Inertia): शरीर में ऊर्जा और पोषण की कमी के कारण प्रसव के दौरान गर्भाशय (Uterus) में पर्याप्त संकुचन (Contractions) नहीं हो पाते, जिससे लेबर पेन लंबा खिंच जाता है और नॉर्मल डिलीवरी लगभग असंभव हो जाती है।
  • पीपीएच (Postpartum Hemorrhage): डिलीवरी के बाद अत्यधिक और अनियंत्रित ब्लीडिंग (खून बहना) का खतरा बढ़ जाता है, जो मां के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
  • सी-सेक्शन में देरी से रिकवरी: यदि सिजेरियन (C-section) करना पड़े, तो कुपोषण के कारण टांके जल्दी नहीं भरते और इंफेक्शन (Surgical Site Infection) का रिस्क कई गुना बढ़ जाता है।
  • कार्डियक अरेस्ट/शॉक: प्रसव के भारी तनाव के बीच मां का कमजोर दिल और कम ब्लड वॉल्यूम अचानक कार्डियोवैस्कुलर शॉक या हार्ट फेलियर की स्थिति पैदा कर सकता है।

प्रेगोरेक्सिया की इस समस्या से कैसे निपटें?

प्रेगोरेक्सिया का इलाज सिर्फ डाइट चार्ट बदलना नहीं है, क्योंकि यह एक मानसिक लड़ाई है। इसके लिए एक कंबाइंड अप्रोच की जरूरत होती है।

  • काउंसलिंग और थेरेपी: महिला को एक अच्छे थेरेपिस्ट या साइकोलॉजिस्ट की मदद की जरूरत होती है, जो उनके मन से 'बॉडी शेप खराब होने' के डर को निकाल सके।
  • गाइनोकोलॉजिस्ट की सलाह: डॉक्टर और डाइटिशियन मिलकर एक ऐसा कस्टमाइज्ड डाइट प्लान तैयार करें जो महिला को मानसिक रूप से सहज लगे और बच्चे को पूरा पोषण भी दे।
  • परिवार का सपोर्ट: पति और परिवार के सदस्यों को महिला की तारीफ करनी चाहिए, उन्हें यह अहसास दिलाना चाहिए कि इस समय वजन बढ़ना मातृत्व की खूबसूरती का हिस्सा है, कोई बीमारी नहीं।