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Celiac Disease : रोटी से दुश्मनी! डॉक्टर से जानिए क्या है सीलिएक रोग, उसके लक्षण और ग्लूटेन-फ्री लाइफस्टाइल जीने का आसान तरीका

Celiac Disease Symptoms: क्या गेहूं की रोटी खाने से आपका पेट फूलता है, या शरीर में लगातार खून और कैल्शियम की कमी बनी रहती है? जिसे आप सामान्य 'व्हीट एलर्जी' समझ रहे हैं, वह गंभीर सीलिएक रोग (Celiac Disease) हो सकता है। जानिए डॉ. शुभम अग्रवाल इस साइलेंट ऑटोइम्यून बीमारी के छुपे हुए लक्षण, सही डायग्नोस्टिक टेस्ट और भारतीय रसोई में क्रॉस-कंटामिनेशन से बचते हुए एक सुरक्षित, संपूर्ण और सख्त ग्लूटेन-फ्री लाइफस्टाइल अपनाने की व्यावहारिक सलाह।

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May 28, 2026
रोटी खाने से पेट दर्द का क्या है संबंध ? (Photo : AI Generated)

Celiac Disease : भारतीय थाली की कल्पना बिना गरमा-गरम रोटियों के अधूरी है। हमारे देश में गेहूं को सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि पोषण का सबसे मुख्य जरिया माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी ऐसी भी है जिसके लिए यही सुनहरी गेहूं की रोटी एक गंभीर बीमारी का कारण बन चुकी है? हम बात कर रहे हैं सीलिएक रोग (Celiac Disease) की। यह एक ऐसी खामोश बीमारी है, जो इंसान को अंदर ही अंदर कुपोषण (Malnutrition) का शिकार बना देती है।

जागरूकता की कमी के कारण भारत में आज भी लाखों लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं, बिना यह जाने कि उनके पेट दर्द, थकान और खून की कमी की असली वजह उनकी रोज की डाइट में शामिल गेहूं है। आइए विस्तार से समझते है सीलिएक रोग के वैज्ञानिक कारणों, इसके लक्षणों, डायग्नोसिस की चुनौतियों और इससे निपटने के व्यावहारिक तरीकों को।

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The Science Behind Celiac Disease : सीलिएक रोग क्या है?

आमतौर पर लोग इसे 'गेहूं से एलर्जी' कह देते हैं, लेकिन मेडिकल साइंस में यह कोई साधारण एलर्जी या इन्फेक्शन नहीं है। सीलिएक रोग एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर (Chronic Autoimmune Disorder) है, जो आनुवंशिक (Genetic) होता है। जब इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति ग्लूटेन (Gluten) नामक प्रोटीन का सेवन करता है, तो उसका खुद का इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) भ्रमित हो जाता है। वह ग्लूटेन को एक दुश्मन मान लेता है और उससे लड़ने के चक्कर में अपनी ही छोटी आंत (Small Intestine) की अंदरूनी परत पर हमला कर देता है।

आंतों के 'विली' (Villi) का डैमेज होना : हमारी छोटी आंत के अंदर उंगलियों जैसे बारीक उभार होते हैं, जिन्हें मेडिकल में विली कहा जाता है। इन विली का काम हमारे द्वारा खाए गए भोजन से विटामिन्स, मिनरल्स, आयरन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों को सोखकर खून तक पहुंचाना होता है। सीलिएक रोग में, बार-बार होने वाले इम्यून अटैक के कारण ये विली धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। जब विली ही नहीं बचेंगे, तो शरीर भोजन से पोषण को एब्जॉर्ब (सोख) नहीं कर पाता। इस स्थिति को मालएब्जॉर्प्शन (Malabsorption) कहते हैं। यही वजह है कि सीलिएक का मरीज चाहे कितना भी घी, बादाम या पौष्टिक चीजें खा ले, उसका शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता चला जाता है।

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लोग सीलिएक रोग को सामान्य 'Wheat allergy' (गेहूं से एलर्जी) समझ लेते हैं। इन दोनों में मुख्य अंतर क्या है?

लोग अक्सर सीलिएक रोग और 'गेहूं से एलर्जी' (Wheat Allergy) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन मेडिकल तौर पर इनमें बड़ा अंतर है जैसे सीलिएक रोग (Celiac Disease) यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें जब मरीज ग्लूटेन खाता है, तो उसका इम्यून सिस्टम खुद ही उसकी छोटी आंत की अंदरूनी परत (विली) को नष्ट करने लगता है। इससे शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। यह समस्या आनुवंशिक और आजीवन रहती है। दूसरा, गेहूं से एलर्जी (Wheat Allergy) इसमें इम्यून सिस्टम गेहूं के किसी भी प्रोटीन को बाहरी खतरा मानकर तुरंत रिएक्ट करता है, जिससे स्किन पर रैशेज, उल्टी या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखते हैं। इससे आंतों को कोई स्थाई नुकसान नहीं पहुंचता।

यह बीमारी जन्मजात (genetic) होती है, या यह जीवन के किसी भी पड़ाव पर अचानक ट्रिगर हो सकती है? इसके मुख्य ट्रिगर्स क्या हैं?

सीलिएक रोग मूल रूप से एक आनुवंशिक बीमारी है। इसका मतलब है कि व्यक्ति इस बीमारी के रिस्क (जैसे HLA-DQ2 या HLA-DQ8 जीन्स) के साथ ही पैदा होता है। लेकिन, यह जरूरी नहीं कि बीमारी बचपन से ही दिखाई दे यह जीवन के किसी भी पड़ाव पर अचानक सक्रिय या ट्रिगर हो सकती है। इसके मुख्य ट्रिगर्स हैं जैसे

  • गंभीर मानसिक या शारीरिक तनाव (Stress): कोई बड़ा एक्सीडेंट या मानसिक आघात।
  • सर्जरी या इन्फेक्शन: पेट की कोई बड़ी सर्जरी या आंतों का गंभीर वायरल इन्फेक्शन।
  • प्रेगनेंसी या प्रसव (Childbirth): महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के दौरान यह अचानक ट्रिगर हो सकती है।
  • पर्यावरणीय कारण: लंबे समय तक भारी मात्रा में ग्लूटेन का सेवन।

सीलिएक रोग के लक्षण पेट से अलग भी हो सकते हैं। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति को कब यह पता होना चाहिए कि उसे गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (Gastroenterologist) को दिखाना चाहिए?

सीलिएक रोग के लक्षण सिर्फ पेट तक सीमित नहीं होते। एक सामान्य व्यक्ति को तुरंत गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए यदि उसे पेट की दिक्कतों के बिना ये लक्षण दिखाई दें जिसमें

  • लगातार एनीमिया (खून की कमी): यदि आयरन की दवाइयां और अच्छा खान-पान लेने के बाद भी हीमोग्लोबिन न बढ़ रहा हो।
  • अत्यधिक थकान और कमजोरी: पर्याप्त आराम और नींद के बावजूद शरीर में हमेशा ऊर्जा की भारी कमी महसूस होना।
  • हड्डियों और जोड़ों में दर्द: कम उम्र में ही बिना किसी चोट के हड्डियां कमजोर (ऑस्टियोपोरोसिस) होने लगना।
  • त्वचा पर गंभीर रैशेज: कोहनी, घुटनों या पीठ पर पानीदार, तेज खुजली वाले दाने होना।
  • बच्चों का धीमा विकास: यदि बच्चे की लंबाई और वजन उम्र के मुताबिक न बढ़ रहे हों।

कई बार मरीज बिना टेस्ट कराए ही ग्लूटेन छोड़ देते हैं। क्या ऐसा करना सही है?

एक डॉक्टर के तौर पर मैं मरीजों को बिना जांच के ग्लूटेन छोड़ने से सख्त मना करता हूं। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं- पहला, अगर आप पहले ही ग्लूटेन खाना बंद कर देंगे, तो सीलिएक रोग के मुख्य टेस्ट (जैसे tTG-IgA ब्लड टेस्ट और आंत की बायोप्सी) की रिपोर्ट 'फॉल्स नेगेटिव' आएगी। यानी बीमारी होने के बावजूद रिपोर्ट नॉर्मल दिखेगी, जिससे सही डायग्नोसिस नामुमकिन हो जाएगा। दूसरा, हो सकता है कि समस्या सीलिएक रोग न होकर सिर्फ साधारण आईबीएस (IBS) या व्हीट एलर्जी हो। सही प्रोटोकॉल यह है कि मरीज ग्लूटेन खाते हुए पहले ब्लड टेस्ट करवाए। यदि एंटीबॉडीज बढ़ी हुई आएं, तो एंडोस्कोपी के जरिए छोटी आंत की बायोप्सी की जाती है। इन दोनों की पुष्टि के बाद ही ग्लूटेन-फ्री डाइट शुरू करनी चाहिए।

सीलिएक रोग का इलाज क्या है?

आज भी सीलिएक रोग को पूरी तरह खत्म करने वाली कोई दवा या इंजेक्शन मौजूद नहीं है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि इसे बिना किसी दवा के, सिर्फ अपनी लाइफस्टाइल और खान-पान में बदलाव करके पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है। आजीवन सख्त ग्लूटेन-मुक्त आहार जब एक मरीज अपनी डाइट से ग्लूटेन को पूरी तरह हटा देता है, तो उसकी छोटी आंत को हील होने का मौका मिलता है। कुछ ही महीनों में विली दोबारा उग आते हैं, पोषक तत्वों का अवशोषण सामान्य हो जाता है और सभी लक्षण गायब होने लगते हैं। लेकिन याद रहे, यह परहेज 'लाइफलांग' यानी जीवनभर के लिए है। एक छोटी सी रोटी या बिस्कुट का टुकड़ा भी आंतों को दोबारा नुकसान पहुंचा सकता है।

ऐसे में मरीज के लिए 'Cross-Contamination' (एक ही रसोई में ग्लूटेन वाले और ग्लूटेन-फ्री खाने का आपस में मिलना) से बचना कितना मुश्किल होता है? इससे बचने के लिए परिवारों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

भारतीय रसोई में गेहूं मुख्य आहार होने के कारण Cross-Contamination से बचना बेहद चुनौतीपूर्ण है। हवा में उड़ता सूखे आटे का एक छोटा सा कण या बर्तन पर लगा अदृश्य ग्लूटेन भी मरीज की आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे बचने के लिए परिवारों को ये सावधानियां रखनी चाहिए जैसे

  • अलग बर्तन: मरीज के लिए चकला, बेलन, तवा, छाननी और स्पंज पूरी तरह अलग रखें। लकड़ी और प्लास्टिक के बर्तनों में ग्लूटेन चिपक जाता है, इसलिए स्टील के बर्तन बेहतर हैं।
  • सफाई: ग्लूटेन-फ्री खाना हमेशा रसोई साफ करने के बाद, गेहूं की रोटी बनने से पहले या बिल्कुल अलग शेल्फ पर बनाएं।
  • भिन्न डिब्बे : ग्लूटेन-फ्री आटे और मसालों के डिब्बे अलग और ऊपर रखें ताकि गेहूं का आटा उड़कर उनमें न गिरे।

क्या भारतीय बाजार में मिलने वाले "Gluten-Free" लेबल्ड प्रोडक्ट्स पूरी तरह सुरक्षित होते हैं? पैकेज्ड फूड खरीदते समय मरीजों को किन छुपे हुए ग्लूटेन सोर्सेज (Hidden Gluten) का ध्यान रखना चाहिए?

भारतीय बाजार में "Gluten-Free" लेबल्ड प्रोडक्ट्स हमेशा सौ प्रतिशत सुरक्षित नहीं होते। एफएसएसएआई (FSSAI) के नियमों के अनुसार, किसी प्रोडक्ट को 'ग्लूटेन-फ्री' तभी माना जाता है जब उसमें ग्लूटेन की मात्रा 20 mg/kg (20 ppm) से कम हो। लेकिन कई बार पैकेजिंग यूनिट्स में गेहूं की क्रॉस-कंटामिनेशन हो जाती है।मरीजों को इन छुपे हुए ग्लूटेन सोर्सेज से सावधान रहना चाहिए।

  • हींग (Asafoetida): बाजार में मिलने वाली अधिकतर कंपाउंडेड हींग में बाइंडिंग के लिए गेहूं का स्टार्च या मैदा मिलाया जाता है।
  • सॉस और सूप: सोया सॉस, टोमैटो केचप और रेडी-टू-ईट सूप को गाढ़ा करने के लिए गेहूं के आटे का उपयोग होता है।
  • मसाले और माल्ट: बाजार के पिसे मसाले, चॉकलेट ड्रिंक्स में मौजूद माल्ट एक्सट्रैक्ट (Malt Extract), और मॉडिफाइड फूड स्टार्च।
  • दवाइयां और सप्लीमेंट्स: कई कैप्सूल और टैबलेट्स की बाइंडिंग में गेहूं के स्टार्च का इस्तेमाल होता है। हमेशा लेबल पर 'Wheat' या 'Malt' चेक करें।

क्या उम्र के साथ या लंबे समय तक ग्लूटेन-फ्री डाइट पर रहने के बाद आंतें पूरी तरह ठीक हो जाती हैं, या फिर भी कुछ रिस्क बने रहते हैं?

सख्त ग्लूटेन-फ्री डाइट पर रहने से आंतों के विली आमतौर पर कुछ महीनों या 1-2 सालों के भीतर पूरी तरह हील हो जाते हैं और शरीर में पोषक तत्वों को सामान्य रूप से सोखने लगता है। हालांकि, उम्रदराज मरीजों में हीलिंग की यह प्रक्रिया बच्चों या युवाओं की तुलना में थोड़ी धीमी हो सकती है। आंतें पूरी तरह ठीक होने के बावजूद जीवनभर कुछ न कुछ रिस्क हमेशा बना रहता हैं, जिनमें सबसे बड़ा रिस्क अनजाने में होने वाला क्रॉस-कंटामिनेशन या बाहर खाने से दोबारा आंतों का डैमेज होना है। इसके अलावा, सीलिएक के मरीजों में भविष्य में थायराइड या टाइप-1 डायबिटीज जैसी अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों के विकसित होने की संभावना आम लोगों से अधिक रहती है, और यदि आंतें देर से ठीक हुई हों तो हड्डियों की पुरानी कमजोरी यानी ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा भी लंबे समय तक बना रह सकता है।

यदि कोई मरीज अनजाने में या लापरवाही में ग्लूटेन खा लेता है, तो उसके शरीर पर इसका तुरंत और लंबे समय में क्या नुकसान हो सकता है?

यदि सीलिएक का मरीज अनजाने या लापरवाही में ग्लूटेन खा लेता है, तो तुरंत रूप से उसे पेट में तेज मरोड़, गंभीर गैस, उल्टी, गंभीर दस्त या कब्ज जैसी तकलीफें हो सकती हैं, और कुछ मरीजों को त्वचा पर तेज खुजली वाले रैशेज या ब्रेन फॉग (धुंधलापन) का सामना करना पड़ता है। हालांकि, कुछ मरीजों में तुरंत कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखता, लेकिन अंदरूनी तौर पर उनका इम्यून सिस्टम तुरंत सक्रिय होकर छोटी आंत के विली को डैमेज करना शुरू कर देता है। लंबे समय में (chronic) बार-बार ऐसी लापरवाही करने से आंतें स्थाई रूप से डैमेज हो जाती हैं, जिससे शरीर में आयरन, कैल्शियम और विटामिन्स का अवशोषण बंद हो जाता है। इसका नतीजा गंभीर एनीमिया, हड्डियों का खोखला होना (ऑस्टियोपोरोसिस), बार-बार गर्भपात होना, अन्य ऑटोइम्यून बीमारियां और बेहद दुर्लभ मामलों में आंतों का कैंसर हो सकता है।

डायग्नोसिस (जांच) की सही प्रक्रिया क्या है?

यदि आपको या आपके किसी परिचित को ऊपर दिए गए लक्षण हैं, तो बिना डॉक्टर की सलाह के खुद ही गेहूं खाना बंद न करें। सीलिएक रोग की जांच के लिए एक तय मेडिकल प्रोटोकॉल है।

  • सेरोलॉजी टेस्ट (ब्लड टेस्ट) : सबसे पहले डॉक्टर खून की जांच करवाते हैं, जिसमें मुख्य रूप से tTG-IgA (Tissue Transglutaminase IgA) एंटीबॉडी टेस्ट शामिल होता है। अगर शरीर में इस एंटीबॉडी का स्तर बहुत अधिक है, तो यह सीलिएक की तरफ इशारा करता है।
  • अपर जीआई एंडोस्कोपी और बायोप्सी (Upper GI Endoscopy & Biopsy) : यह सबसे सटीक जांच मानी जाती है। एंडोस्कोपी के जरिए डॉक्टर मुंह के रास्ते एक पतली ट्यूब छोटी आंत तक ले जाते हैं और वहां के विली का एक छोटा सा टुकड़ा (Tissue Sample) लेते हैं। लैब में जांच के बाद ही पुष्टि होती है कि विली डैमेज हुए हैं या नहीं।
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