
क्या आप अपनी जमीन के हर इंच का सही उपयोग करके खेती की लागत घटाना और मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं? अंतर-फसल (Intercropping) तकनीक अपनाकर न केवल उपज दोगुनी की जा सकती है, बल्कि फसलों को बीमारियों और मौसमी जोखिम से भी सुरक्षित रखा जा सकता है।खेती-किसानी में Intercropping (सहफसली पद्धति) ने कृषि जगत में एक नया आयाम पेश किया है। इस आधुनिक तकनीक के तहत एक ही कृषि भूमि पर एक साथ दो या उससे अधिक फसलें उगाई जाती हैं, जिससे भूमि की उपयोग क्षमता बढ़ती है और किसानों को अतिरिक्त वित्तीय सुरक्षा मिलती है।
सहफसली खेती में मुख्य फसल के बीच बची खाली जगह (पंक्तियों) का उपयोग पूरक फसलें उगाने के लिए किया जाता है। इसे तीन प्रमुख तरीकों से अपनाया जाता है:
अंतर-फसल (Intercropping): निर्धारित पंक्तियों में दो फसलों का एक साथ रोपण।
रिले क्रॉपिंग (Relay Cropping): पहली फसल के पकने से ठीक पहले दूसरी फसल की बुवाई।
मिश्रित खेती (Mixed Cropping): बिना निश्चित पंक्ति व्यवस्था के दो बीजों को मिलाकर बोना।
यह तकनीक मृदा स्वास्थ्य में सुधार करती है और कीट-रोगों के प्राकृतिक फैलाव को रोकती है।
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के देवीपुरा गांव (मरौरी ब्लॉक) के कृषक हरिओम गंगवार ने गन्ने के साथ हल्दी और अदरक की सहफसली खेती का सफल मॉडल विकसित किया है।
इसी तरह, प्रगतिशील किसानों द्वारा गन्ने के साथ उड़द, तिल, गोभी, मूली और स्ट्रॉबेरी जैसी अंतर-फसलें उगाई जा रही हैं। प्रायोगिक आंकड़ों के अनुसार, गन्ने के साथ प्रति एकड़ 3 क्विंटल उड़द और 1.5 क्विंटल तिल का अतिरिक्त उत्पादन आसानी से हासिल किया जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR-CICR) के तकनीकी बुलेटिन के अनुसार, कपास के साथ दलहनी फसलों (जैसे मूंगफली, हरा चना, काउपी) की उच्च-घनत्व रोपण प्रणाली में भूमि तुल्यांक अनुपात (Land Equivalent Ratio - LER) 1.5 से अधिक पाया गया है। इसका तात्पर्य है कि एकल फसल की तुलना में 50% अधिक भूमि उपयोग दक्षता प्राप्त होती है। इसके अलावा, ICAR-IIFSR (मोदिपुरम) में गन्ने के साथ मूंगफली की अंतर-फसली प्रणाली पर निरंतर शोध जारी है, जो मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ावा देती है।
मृदा उर्वरता में वृद्धि: दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में अवशोषित कर उर्वरक की खपत घटाती हैं।
जोखिम प्रबंधन: प्रतिकूल मौसम में एक फसल के प्रभावित होने पर दूसरी फसल वित्तीय क्षति से बचाती है।
संसाधनों का इष्टतम उपयोग: एक ही सिंचाई, जुताई और निराई-गुड़ाई में दोहरी उपज प्राप्त होती है।
जैविक कीट नियंत्रण: फसलों की विविधता हानिकारक कीटों के जीवनचक्र को तोड़ती है।
सटीक फसल संयोजन: ऐसी फसलों का चयन करें जिनकी पोषण संबंधी जरूरतें और जड़ प्रणाली अलग-अलग हों (जैसे गन्ने के साथ उड़द या गेहूं के साथ सरसों)।
मृदा परीक्षण: बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच कराएं और जैविक खाद व ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करें।
विशेषज्ञ परामर्श: सटीक फसल अनुपात और बुवाई समय की जानकारी के लिए निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ICAR केंद्र से संपर्क करें।
बिना तकनीकी जानकारी के गलत फसल संयोजन रोपने से बचें।
बाजार में मूल्य उतार-चढ़ाव की निगरानी के लिए eNAM पोर्टल और स्थानीय कृषि उपज मंडी के दैनिक दरों पर नज़र रखें।
बड़े क्षेत्र में लागू करने से पहले छोटे भूखंड पर इसका परीक्षण अवश्य करें।