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दिल्ली में टीबी का खतरा बढ़ता जा रहा है! अगर आप भी हैं इस बीमारी के शिकार तो जानें क्या करें

Tuberculosis: दिल्ली में टीबी के मरीजों की तादाद में इजाफा हो गया है, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। जानिए आखिर किन कारणों से राजधानी में क्षय रोग का खतरा फिर से पैर पसार रहा है और सरकार क्या कर रही है।
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Aug 05, 2026
TB Control Program News.
दिल्ली में टीबी का खतरा बढ़ने पर सरकार लोगों को जागरुक कर रही है। ( विजुअल: : Google Gemini AI.)

TB Cases :दिल्ली में टीबी की बढ़ती बीमारी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। हाल ही में हुए स्क्रीनिंग अभियानों और आंकड़ों से यह बात पता चली है कि यह बीमारी अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और दिल्ली स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त रिपोर्ट 2026 के अनुसार, दिल्ली में साधारण टीबी के अलावा 'मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी' (MDR-TB) के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। मरीजों के बीच में ही इलाज छोड़ देना या अनियंत्रित दवाएं लेने की आदत इसका मुख्य कारण है।

फास्ट स्क्रीनिंग अभियान से खुला सच

दिल्ली स्वास्थ्य विभाग ने 24 मार्च से 5 मई, 2026 के बीच चलाए गए स्क्रीनिंग अभियान में 12,078 नए टीबी मामलों की पहचान की है, जिनमें से लगभग 11 प्रतिशत बच्चे और शेष वयस्क थे। यह अभियान ‘टीबी मुक्त भारत अभियान 2.0’ के तहत चलाया गया, जिसमें झुग्गी बस्तियों, भीड़भाड़ वाले इलाकों और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में हाथ में पकड़ी जाने वाली एक्स-रे मशीनों का उपयोग किया गया। इस अभियान को अब नियमित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल कर लिया गया है, ताकि यह 100-दिन का अभियान समाप्त होने के बाद भी जारी रह सके।

दिल्ली में टीबी का प्रसार : जमीनी हकीकत

देश में टीबी का सबसे अधिक प्रसार दिल्ली में हुआ है। भारत में 2019–2021 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में प्रति एक लाख लोगों पर 747 टीबी मामले हैं, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। न केवल मामलों की संख्या बढ़ी है, बल्कि उपचार की सफलता दर भी चिंताजनक है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर टीबी उपचार सफलता दर 85.5 प्रतिशत है, जबकि दिल्ली में इस रोग के फैलने की दर केवल 74.1 प्रतिशत है। यह अंतर दर्शाता है कि केवल पहचान बढ़ाना पर्याप्त नहीं है—उपचार की गुणवत्ता और निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

टीबी नियंत्रण के लिए अपनाई जा रही नई तकनीक और रणनीतियां

दिल्ली सरकार ने टीबी नियंत्रण के लिए कई तकनीकी और कार्यक्रमगत पहलें शुरू की हैं। वर्ष 2024–25 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि टीबी के संदिग्ध मामलों की जांच बढ़ाने के लिए NAAT (न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट) का उपयोग बढ़ाया जा रहा है और सुतक माइक्रोस्कोपी को धीरे-धीरे हटा कर TrueNat मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। साथ ही, निजी क्षेत्र में DR-TB (दवा प्रतिरोधी टीबी) के इलाज के लिए बड़े निजी अस्पतालों में केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। निजी क्षेत्र में भारत सरकार की 'निक्षय' (Ni-kshay) पोर्टल मैपिंग को और मजबूत किया गया है। अब बड़े निजी अस्पतालों और क्लीनिकों के लिए भी हर टीबी मरीज की ट्रैकिंग अनिवार्य कर दी गई है, ताकि मरीज को सही समय पर सही रेजिमेन की दवा मिल सके और दवा-प्रतिरोधी टीबी के प्रसार को रोका जा सके।

दिल्ली के 11 जिलों के 38 वार्डों में 80 प्रतिशत टीबी का बोझ

राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी टीबी नियंत्रण को लेकर सक्रियता बढ़ी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में बताया गया कि दिल्ली में 28.83 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, 21.67 लाख छाती के एक्स-रे, 3.65 लाख NAAT टेस्ट और 1.75 लाख नए टीबी मरीजों की पहचान हुई है। बैठक में यह भी सुझाव दिया गया कि दिल्ली के 11 जिलों के 38 वार्डों में 80 प्रतिशत टीबी का बोझ है, इसलिए इन्हें लक्षित कर अभियान चलाया जाए।

टीबी​ नियंत्रण के लिए वैश्विक रणनीति, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और डब्लूएचओ के मानक

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 'एंड टीबी स्ट्रैटेजी' (End TB Strategy) के तहत वर्ष 2025-2026 तक टीबी के मामलों में भारी कमी लाने का वैश्विक लक्ष्य रखा गया है। WHO की ताजा वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में टीबी का संक्रमण तेजी से फैल रहा है। दिल्ली में प्रति लाख 747 मामलों का आंकड़ा WHO के वैश्विक मानकों के लिहाज से बहुत संवेदनशील श्रेणी में आता है। संगठन का कहना है कि केवल केस ढूंढना (Active Case Finding) काफी नहीं है, बल्कि 'सुप्त टीबी' (Latent TB Infection - LTBI) को सक्रिय टीबी में बदलने से रोकना और संक्रमण की कड़ियों को तोड़ना ही इस संकट का स्थाई समाधान है।

टीबी की बीमारी बढ़ रही है और इससे बचाव के उपाय करना जरूरी है। (विजुअल: Google Gemini AI)

पोषण सुरक्षा और 'निक्षय पोषण योजना' (Nutritional Support)

टीबी से मुकाबले में पोषण की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत संचालित 'निक्षय पोषण योजना' के माध्यम से टीबी मरीजों को सीधे उनके बैंक खातों (DBT) में वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इसके अलावा, 'निक्षय मित्र' पहल के जरिए कॉर्पोरेट, गैर-सरकारी संगठनों और जनप्रतिनिधियों को टीबी मरीजों को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि उन्हें अतिरिक्त पोषण किट (राशन) और मानसिक/सामाजिक संबल मिल सके। दिल्ली जैसे महानगर में जहां कुपोषण और तंग बस्तियां बीमारी के मुख्य कारण हैं, वहां यह योजना गेम-चेंजर साबित हो रही है।

एआई (AI) और हैंडहेल्ड एक्स-रे: डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक का उपयोग

सन 2026 के स्वास्थ्य अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि एआई-संचालित (AI-enabled) पोर्टेबल और अल्ट्रा-पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों का उपयोग रही है। दिल्ली के अति-संवेदनशील (High-Risk) 38 वार्डों में चलाए गए डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग अभियानों में इन मशीनों ने सेकंडों में संभावित टीबी पैच की पहचान की गई। इसके तुरंत बाद, 'ट्रूनाट' (TrueNat) और 'मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स' (CBNAAT) के जरिए कुछ ही घंटों में पुष्टि कर दी गई। डिजिटल तकनीक के इस संयोजन ने जांच से लेकर इलाज शुरू होने के समय (Turnaround Time) को पहले के मुकाबले कम कर दिया है, जिससे शुरुआती अवस्था में ही टीबी का इलाज संभव हो पा रहा है।

राजनीतिक स्तर पर टीबी नियंत्रण को जन आंदोलन बनाने की कोशिश

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने टीबी मुक्त भारत अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित राष्ट्रीय आंदोलन बताया है। उन्होंने कहा कि अभियान के दूसरे चरण की 100-दिन की अवधि जुलाई 2026 के पहले सप्ताह में समाप्त हो गई है, और यह अंतिम मील की कोशिश रही कि कोई भी टीबी का मामला छूट न जाए। अब अगस्त का महीना शुरू हो गया है और टीबी की रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय करने होंगे। जानकारी के अनुसार देश में टीबी की बीमारी 2014 में प्रति लाख 243 लोगों से घट कर 2024 में 187 हो गई है, जो एक सकारात्मक संकेत है।

क्या यह राजनीतिक एजेंडा बन सकता है?

टीबी जैसे स्वास्थ्य मुद्दे पर राजनीतिक नेतृत्व और जनभागीदारी का होना स्वागत योग्य है, लेकिन यह तभी प्रभावी होगा जब यह जमीन पर नीतिगत सुधारों और संसाधनों के विस्तार से जुड़ा हुआ हो। दिल्ली में टीबी की स्क्रीनिंग बढ़ी है, लेकिन उपचार सफलता दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है। इसका अर्थ है कि पहचान के बाद इलाज और निगरानी प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।

अब आगे की राह क्या होगी

दिल्ली में टीबी नियंत्रण के लिए आवश्यक है कि:

  1. उच्च-भार वाले वार्डों में लक्षित अभियान जारी रहें।
  2. NAAT और TrueNat जैसी तकनीकों का विस्तार हो।
  3. उपचार की सफलता दर बढ़ाने के लिए मरीजों को पोषण, डिजिटल सहायता और सामाजिक समर्थन मिले।
  4. राजनीतिक प्रतिनिधियों को नियमित रूप से क्षेत्रीय टीबी डेटा से अवगत कराया जाए, ताकि वे स्थानीय स्तर पर जागरूकता और संसाधन जुटा सकें।

दिल्ली में टीबी की बढ़ती बीमारी स्वास्थ्य प्रणाली की परीक्षा

बहरहाल, दिल्ली में टीबी की बढ़ती बीमारी स्वास्थ्य प्रणाली की परीक्षा हैं। स्क्रीनिंग में मिली सफलता उत्साहजनक है, लेकिन यह तभी सार्थक होगी जब उपचार की गुणवत्ता, मरीजों की देखभाल और सामाजिक समर्थन मजबूत हों। राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को अब इस अभियान को जन आंदोलन से जन-परिवर्तन तक ले जाना होगा-तभी दिल्ली टीबी मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।

Updated on:
05 Aug 2026 03:48 pm
Published on:
05 Aug 2026 03:22 pm