
अमेरिका ऐसे समय में अपनी परमाणु रणनीति की समीक्षा कर रहा है, जब वैश्विक सुरक्षा वातावरण पहले की तुलना में अधिक जटिल हो चुका है। रूस के साथ हथियार नियंत्रण व्यवस्था कमजोर पड़ने, चीन की तेजी से बढ़ती परमाणु क्षमता और दो मोर्चों पर संभावित चुनौती को देखते हुए पेंटागन अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) औपचारिक Nuclear Posture Review शुरू नहीं कर रहा है, लेकिन रक्षा नीति के अवर सचिव एल्ब्रिज कोल्बी (Elbridge Colby) के नेतृत्व में मौजूदा परमाणु रणनीति की व्यापक समीक्षा जारी है। मार्च 2026 में सीनेट और प्रतिनिधि सभा की सुनवाई के दौरान कोल्बी ने कहा कि बदलते सुरक्षा माहौल के अनुरूप परमाणु रणनीति को नए सिरे से परखा जा रहा है।
अमेरिकी रणनीतिक समुदाय में इस बात पर चर्चा तेज हुई है कि केवल लंबी दूरी के रणनीतिक परमाणु हथियार हर तरह की चुनौती का जवाब नहीं दे सकते। इसलिए कम क्षमता वाले टैक्टिकल (सामरिक) परमाणु हथियारों और लचीले प्रतिरोध (Flexible Deterrence) के विकल्पों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि यदि सीमित स्तर का परमाणु संकट पैदा हो, तो अमेरिका के पास जवाब देने के कई विकल्प उपलब्ध हों।
अमेरिकी रणनीतिक दस्तावेजों में अब रूस और चीन को एक साथ ध्यान में रखकर रक्षा योजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। इसे अक्सर "Two-Peer Challenge" कहा जाता है। चीन तेजी से अपने परमाणु भंडार और मिसाइल क्षमता का विस्तार कर रहा है, जबकि रूस पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों में शामिल है। इसी वजह से अमेरिका अपनी प्रतिरोधक क्षमता को नए सिरे से संतुलित करना चाहता है।
अमेरिका और रूस के बीच लागू New START Treaty 5 फरवरी 2026 को समाप्त हो गई। इस संधि के खत्म होने के बाद दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों पर लागू कानूनी सीमाएं समाप्त हो गईं। हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में हथियारों की प्रतिस्पर्धा बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
भारत सीधे इस रणनीतिक समीक्षा का हिस्सा नहीं है, लेकिन अमेरिका, रूस और चीन के बीच बदलते परमाणु समीकरण का प्रभाव एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। चीन की सैन्य क्षमता में विस्तार और अमेरिका की नई रणनीतिक प्राथमिकताएं हिंद-प्रशांत क्षेत्र के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में भारत को अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा और प्रतिरोधक रणनीति पर लगातार नजर बनाए रखनी होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में अमेरिका अपने परमाणु आधुनिकीकरण कार्यक्रम, हथियारों की तैनाती और प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े कई फैसले ले सकता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि रूस और चीन इस रणनीतिक बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यदि भविष्य में कोई नया हथियार नियंत्रण समझौता नहीं बनता, तो वैश्विक परमाणु प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
बहरहाल, बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में अमेरिका अपनी परमाणु रणनीति को नई चुनौतियों के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा है। रूस और चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता, न्यू START संधि की समाप्ति और दो परमाणु महाशक्तियों के साथ संभावित प्रतिस्पर्धा ने इस समीक्षा को नई दिशा दी है। आने वाले वर्षों में यही रणनीतिक बदलाव वैश्विक सुरक्षा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।