कई साल पहले की घोषणा अब तक अमल नहीं हो सकी है वहीं हर साल अभिभावक निजी स्कूलों के फंदे में जकड़तेे जा रहे हैं।
रायगढ़. प्रायवेट स्कूलों में मनमाने फीस को लेकर प्रदेश के तात्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने यह घोषणा की थी कि स्कूलों में फीस तय करने के लिए नियामक बोर्ड का गठन किया जाएगा। कई साल पहले की घोषणा अब तक अमल नहीं हो सकी है वहीं हर साल अभिभावक निजी स्कूलों के फंदे में जकड़तेे जा रहे हैं। कभी एडमिशन फीस के नाम पर तो कभी स्टेबलिशमेंट फीस के नाम पर अभिभावक शिकार हो रहे हैं। वहीं ट्यूशन फीस और अन्य फीस तो हर स्कूल अपने-अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से तय कर रहा है। फिलहाल तात्कालीन शिक्षा मंत्री की घोषणा हवा में उड़ती हुई दिखाई दे रही है।
जब इस घोषणा के कई साल बाद पत्रिका ने इसके अमली जामा को लेकर तह में घुसने की कोशिश की तो ये भी केवल जुमला जैसा ही निकला। तात्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के घोषणा के बाद अब तक इसके गठन की प्रक्रिया का श्रीगणेश नहीं हो पाया है। कुलमिलाकर देखा जाए तो शासन प्रायवेट स्कूलों के लिए फीस नियामक बोर्ड का गठन नहीं कर उनको अभिभावकों को लूटने की खुली छूट दे दी है।
हैरानी होती है ऐसे अधिकार पर
आश्चर्य की बात तो यह है कि शिक्षा का हक दिलाने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया है इसमें प्रायवेट स्कूलों के मान्यता को लेकर शर्ते रखी गई हैं, लेकिन फीस को लेकर इसमें भी कोई उल्लेख नहीं किया गया है। शिक्षा के अधिकार कानून में प्रायवेट स्कूलों के फीस को लेकर बस इतना ही नियम बनाया गया है कि प्रायवेट स्कूल जो भी फीस लेंगे उसको एक बार लेना है और एक ही बार में अभिभावकों को यह बताना है कि कितना फीस साल भर का लगेगा। इसमें न तो एडमिशन फीस को लेकर कोई उल्लेख किया गया है न ही अन्य ऐसे फीस जो सिर्फ लूटने के नाम पर लिए लगाए जाते हैं के बारे में कोई उल्लेख किया गया है।
इसके कारण प्रायवेट स्कूल संचालक मनमानी कर रहे हैं। फीस बढेत्तरी को लेकर भी शासन ने प्रायवेट स्कूलों के लिए कोई नियम नहीं बनाया गया है बस इतना ही कहा गया है कि प्रबंधन कार्यकारिणी समिति की बैठक में निर्णय लेने के बाद बढ़ोतरी किया जाना है। पालन हो रहा है या नहीं ये भी नहीं देख रहे हैं।
उठ रहा है ये सवाल
प्रायवेट स्कूल प्रबंधन शिक्षा के अधिकार कानून के तहत प्रवेश देने के लिए पहली से बारहवीं तक एक संस्था बताकर नर्सरी में उपलब्ध सीट का २५ प्रतिशत आरक्षित करते हैं। जबकि सामान्य अभिभावकों से किसी स्कूल में नर्सरी, प्रायमरी, मीडिल, हाई और हायर सेकण्डरी में एडमिशन फीस लिया जा रहा है ऐसे में शिक्षा का अधिकार कानून उक्त सभी में लागू होना चाहिए पर ऐसा हो नहीं रहा है।
उठा रहे हैं लाभ
वर्तमान में देखा जाए तो जरूरत के हिसाब से हर अभिभावक अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियल स्कूल में पढ़ाना चाहता है। सरकारी स्कूलों में जिले में एक भी इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है वहीं सेंट्रल स्कूल एकमात्र स्कूल है जाहं प्रवेश की मारा-मारी रहती है। उपर से सरकारी स्कूलों में शिक्षा के गुणवत्ता की बात करें तो किसी से छिपी नहीं है। इसकी का लाभ प्रायवेट स्कूल संचालक उठा रहे हैं।
-फीस नियामक बोर्ड से मेरा कोई वास्ता नहीं है। मैं इसको देखता नहीं हूं और इसके बारे में कुछ नहीं बता पाऊंगा। इसके लिए आप संयुक्त सचिव पीके भटनागर से चर्चा करें- एनआर कपाली, अवर सचिव, शिक्षा विभाग
-फीस नियामक बोर्ड तो क्या मै किसी भी मामले में कुछ नहीं बता पाऊंगा। आप शिक्षा सचिव से बात करें। मैं इसमें कुछ भी नहीं कह सकता हूं- पीके भटनागर, संयुक्त सचिव, शिक्षा विभाग