
एक्सक्लूसिव: रायपुर@ देवेंद्र गोस्वामी। Puri Rath Yatra 2026: ओडिशा की पावन धरा पुरी में सोमवार को आस्था और लोक-संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिलेगा। भगवान जगन्नाथ, अपने अग्रज बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ 9 दिनों की प्रसिद्ध रथयात्रा पूरी कर अपने मुख्य धाम श्रीमंदिर लौटेंगे। इस पावन अवसर को 'नीलाद्री विजय' (Niladri Vijay 2026) के रूप में मनाया जाता है। यह केवल रथयात्रा का औपचारिक समापन नहीं है, बल्कि जगन्नाथ संस्कृति का सबसे भावनात्मक और लोकप्रिय अनुष्ठान माना जाता है।
इसी ऐतिहासिक दिन भगवान जगन्नाथ को वर्ष में केवल एक बार रसगोला का विशेष भोग चढ़ाया जाता है। इस उपलक्ष्य में पूरे पुरी शहर में उत्सव का माहौल रहता है, घर-घर में रसगुल्ले बनाए जाते हैं, मंदिरों में विशेष भोग अर्पित होता है और श्रद्धालुओं के बीच इसे महाप्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
श्रीजगन्नाथ मंदिर के सेवायतों और धार्मिक विद्वानों के अनुसार, नीलाद्री विजय भगवान जगन्नाथ (Jagannath Temple Puri) और माता लक्ष्मी के दिव्य प्रेम एवं मिलन का उत्सव है। मान्यता है कि जब भगवान अपने भाई-बहन के साथ रथयात्रा पर गुंडिचा मंदिर निकल गए थे, तो माता लक्ष्मी श्रीमंदिर में ही छूट गई थीं। इससे माता अत्यंत क्रोधित हो गईं। जब भगवान बाहुड़ा यात्रा संपन्न कर लौटे, तो देवी लक्ष्मी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए श्रीमंदिर का मुख्य द्वार (सिंहद्वार) भीतर से बंद कर दिया। भगवान जगन्नाथ ने माता का गुस्सा शांत करने के लिए उन्हें पारंपरिक रूप से रसगोला और सुंदर 'काली साड़ी' भेंट की।
इस मिठास और उपहार से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने मंदिर के द्वार खोल दिए और भगवान का पुनः श्रीमंदिर में प्रवेश हुआ। इस अनूठी परंपरा की शुरुआत वास्तव में रथयात्रा के पांचवें दिन 'हेरा पंचमी' से होती है, जब माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर जाकर भगवान से लौटने का आग्रह करती हैं। बाद में बाहुड़ा यात्रा, सुनाबेशा और अधरपाना जैसे अनुष्ठान संपन्न होते हैं। नीलाद्री विजय के दिन सिंहद्वार पर मंदिर के सेवायतों द्वारा पारंपरिक संस्कृत में जीवंत संवाद किया जाता है, जो जगन्नाथ संस्कृति का सबसे आकर्षक दृश्य होता है।
ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच रसगुल्ले के उद्गम (जन्मस्थली) को लेकर वर्षों तक चला राष्ट्रीय विवाद किसी से छिपा नहीं है। ओडिशा ने 'जीआई' टैग हासिल करने के लिए श्रीमंदिर की इसी 1000 वर्ष से भी अधिक पुरानी परंपरा और प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियों को अपना मुख्य आधार बनाया था। जीआई रजिस्ट्री के समक्ष यह तथ्य मजबूती से रखा गया कि नीलाद्री विजय पर भगवान को सदियों से रसगोला अर्पित करने की परंपरा रही है।
इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर 29 जुलाई 2019 को 'ओडिशा रसगोला' को जीआई टैग प्रदान किया गया, जबकि इससे पहले 12 नवंबर 2017 को पश्चिम बंगाल को 'बांग्लार रसगुल्ला' का जीआई टैग (GI Tag Odisha Rasgola) मिल चुका था। हालांकि, जीआई टैग मिलने के बाद भी विद्वानों और शोधकर्ताओं के बीच रसगुल्ले की वास्तविक जन्मस्थली को लेकर बहस आज भी जारी है, लेकिन नीलाद्री विजय के इस मीठे प्रसंग ने इसे वैश्विक पहचान दिला दी है।
बांग्लार रसगुल्ला: इसे ताजे छेने से तुरंत बनाया जाता है, जिससे यह अधिक स्पंजी, हल्का और चाशनी में तैरता हुआ होता है।
ओडिशा रसगोला: इसमें छेने को कुछ समय तक परिपक्व (माहौल के अनुकूल) होने दिया जाता है, जिससे इसका रंग हल्का भूरा और बनावट बेहद मुलायम व मुंह में घुल जाने वाली होती है।