
Teacher Angad Salame: कभी गांव की प्राथमिक शाला में पढ़ने वाले दो बच्चे ठीक से छत्तीसगढ़ी और हिंदी तक नहीं बोल पाते थे। भाषा उनके लिए पढ़ाई की राह में बड़ी बाधा थी, लेकिन मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के मुंजाल प्राथमिक शाला के शिक्षक अंगद सलामे ने इस चुनौती को बच्चों के भविष्य की राह में दीवार नहीं बनने दिया। उन्होंने पहले दोनों बच्चों को स्थानीय बोली और हिंदी बोलना सिखाया, फिर धीरे-धीरे उन्हें पढ़ाई की मुख्यधारा से जोड़ा। आज उन्हीं बच्चों में से सोनूराम यादव और रूपेश कुमार देश की प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंपनी के मानेसर प्लांट में करीब छह लाख रुपये के सालाना पैकेज पर नौकरी हासिल कर चुके हैं।
मुंजाल जैसे सुदूर वनांचल के गांव में शिक्षक अंगद सलामे की भूमिका सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं रही। जब सोनूराम और रूपेश प्राथमिक शाला में पहुंचे, तब उन्हें छत्तीसगढ़ी और हिंदी भाषा का पर्याप्त ज्ञान नहीं था।
उन्होंने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाया और रोजमर्रा के शब्दों व वाक्यों के माध्यम से उन्हें छत्तीसगढ़ी और हिंदी बोलना सिखाया। धीरे-धीरे दोनों बच्चों की झिझक खत्म हुई और वे कक्षा में बातचीत करने के साथ पढ़ाई में भी रुचि लेने लगे। भाषा की बाधा दूर होते ही उनकी सीखने की गति भी बढ़ती गई।
शिक्षक ने उनमें केवल भाषा और पढ़ाई की समझ ही विकसित नहीं की, बल्कि बड़े सपने देखने का हौसला भी दिया। विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के प्रति रुचि पैदा कर उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर यह प्रयास उन्हें मानपुर से तकनीकी शिक्षा और फिर मानेसर तक ले गया।
आज जब सोनूराम और रूपेश अपने पैरों पर खड़े होकर मानेसर में नौकरी कर रहे हैं, तो उनकी सफलता में उस शिक्षक की मेहनत भी दिखाई देती है, जिन्होंने यह समझा कि किसी बच्चे को आगे बढ़ाने से पहले उसकी भाषा को समझना और उसे अपनी बात कहने का आत्मविश्वास देना जरूरी है।
दोनों युवाओं की सफलता अब मुंजाल के दूसरे बच्चों के लिए भी प्रेरणा बन गई है। खास बात यह है कि जिन बच्चों की शिक्षा की शुरुआत भाषा सीखने से हुई थी, वे अब अपनी पहली कमाई का कुछ हिस्सा उसी प्राथमिक शाला के विकास में देने की इच्छा रखते हैं। यह सिर्फ सफलता की कहानी नहीं, बल्कि एक शिक्षक के धैर्य, मार्गदर्शन और विश्वास से बदलती दो जिंदगियों की कहानी है।
आर्थिक परिस्थितियां भी आसान नहीं थीं। तकनीकी शिक्षा के लिए प्रशासन की मदद मिली और ग्रामीणों ने भी सहयोग किया। लेकिन इस पूरे सफर की पहली सीढ़ी मुंजाल की वही प्राथमिक शाला थी, जहां शिक्षक अंगद सलामे ने बच्चों को सबसे पहले भाषा, आत्मविश्वास और सीखने का हुनर दिया।