
रतलाम। शासकीय जिला अस्पताल की मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य इकाई (एमसीएच) का मुख्य गेट वाहन पार्किंग में तब्दील हो गया है। निर्धारित पार्किंग स्थल होने के बावजूद यहां सुबह से शाम तक दुपहिया वाहन, ऑटो और अन्य वाहन खड़े रहते हैं। इससे मरीजों और परिजनों की आवाजाही बाधित हो रही है, लेकिन जिम्मेदारों की ओर से व्यवस्था सुधारने के प्रयास नजर नहीं आ रहे।
हालात इतने गंभीर हैं कि आपात स्थिति में पहुंचने वाली एंबुलेंस को भी गेट पर खड़े वाहन हटवाकर अंदर प्रवेश करना पड़ता है। परिसर में भी रास्ते में खड़े वाहनों के कारण आवागमन प्रभावित होता है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं और गंभीर मरीजों को समय पर उपचार के लिए पहुंचाने में देरी की आशंका बनी रहती है। नवजातों की सुरक्षा से जुड़ी इस इकाई में पार्किंग की मनमानी आखिर कब रुकेगी? सवाल यह है कि निर्धारित पार्किंग होने के बावजूद मुख्य गेट को अतिक्रमणमुक्त रखने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
पार्किंग है, फिर भी गेट पर वाहन
एमसीएच जैसे संवेदनशील परिसर में मुख्य गेट और एंबुलेंस मार्ग हर समय खाली रहना जरूरी है। यहां सुरक्षा गार्ड तैनात होने के बावजूद पार्किंग व्यवस्था पटरी पर नहीं आ रही। जिम्मेदारों की अनदेखी से समस्या लगातार बनी हुई है। अस्पताल के बाहर निर्धारित पार्किंग के बावजूद वाहन गेट और परिसर में खड़े किए जा रहे हैं। प्रबंधन को गेट पर वाहनों की पार्किंग रोकने और एंबुलेंस के लिए निर्बाध रास्ता करने की जरूरत है।
दो साल बाद मिली लिफ्ट से राहत, दो माह भी नहीं चली, प्रसूताओं को रैंप का सहारा
जिला अस्पताल की मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य इकाई एमसीएच में महिला मरीजों की सुविधा के लिए शुरू की गई लिफ्ट एक बार फिर बंद हो गई है। दो साल तक बंद रहने के बाद 18 अगस्त को कलेक्टर के निर्देशन में लिफ्ट शुरू हुई थी। इससे मरीजों और परिजनों को राहत मिली, लेकिन यह सुविधा दो माह भी नहीं चल सकी। अब गर्भवती महिलाओं, नवप्रसूताओं और गंभीर महिला मरीजों को फिर रैंप और सीढिय़ों के सहारे वार्ड तक पहुंचाना पड़ रहा है। लिफ्ट बंद होने का सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ रहा है, जिन्हें प्रसव के बाद वार्ड में शिफ्ट किया जाता है। स्ट्रेचर पर लेटी प्रसूता को एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक रैंप से ले जाने में महिला वार्ड बॉय के साथ परिजनों को भी लगना पड़ता है। कई बार मरीज के साथ परिजन नहीं होने पर वार्ड कर्मचारियों को अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है।
स्ट्रेचर से कर रहे नवप्रसूताओं को रैंप से लाना ले जाना
शनिवार को भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। दोपहर 12.39 बजे नवजात को गोद में लेकर आई महिला ने प्रसूता के साथ स्ट्रेचर पर नवजात को रखा। महिला वार्ड बॉय आगे से स्ट्रेचर खींचती रही और महिला परिजन पीछे से उसे संभालते हुए पीएनसी-गायनिक वार्ड तक ले गए। यह कोई एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि लिफ्ट बंद होने के बाद रोज की स्थिति बन गई है। एक महिला वार्ड बॉय ने बताया कि सामने वाली लिफ्ट एक सप्ताह से अधिक समय से बंद है, जबकि अंदर वाली भी अब बंद हो गई है। मरीजों को ऊपर ले जाने में काफी परेशानी होती है।
शुरू करते समय किया था नियमित रखरखाव का दावा
दो साल बाद 18 अगस्त को शुरू हुई थी लिफ्ट। उस समय अस्पताल प्रबंधन ने भविष्य में लिफ्ट बंद न हो, इसके लिए नियमित रखरखाव की व्यवस्था करने और महिला लिफ्टकर्मी की ड्यूटी लगाने की बात कही थी। अब दोबारा लिफ्ट बंद होने से इन व्यवस्थाओं की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गंभीर मरीजों के लिए जरूरी सुविधा आखिर बार-बार बंद क्यों हो रही है?
इनका कहना है
एमसीएच में पार्किंग वाले को तीन दिन पहले ही चेतावनी दे हैं, दो बार नोटिस दे चुके हैं, सोमवार को फिर नोटिस देते हैं, अगर नहीं मानते है तो ठेका निरस्त करने की कार्रवाई की जाएगी। तकनीकी खराबी के कारण दो दिन से लिफ्ट बंद थी, शिकायत पर मेन्टनेंस वाले आए थे, ठीक करके गए है। सुपरवाइजर की गलती है, लिफ्ट अगर ये बंद हो तो दूसरी चालू करना चाहिए। हमारी तीनों लिफ्ट चालू हैं।
एपीसिंह, सिविल सर्जन जिला अस्पताल