
रतलाम. जिले में पिछले दिनों झमाझम प्री-मानसून की दस्तक के साथ ही रतलाम, पिपलौदा, सैलाना, जावरा में डेढ़ से दो इंच तक बारिश दर्ज की गई। पिछले 26 सालों के आंकड़ों के अनुसार, मानसून कभी अतिवृष्टि तो कभी कम वर्षा वाला रहा, जिससे जनजीवन व बोवनी प्रभावित हुई। इस बार मौसम वैज्ञानिक भी असमंजस में हैं। शुरूआती तीन सप्ताह में बारिश कम रहने का अनुमान है, जबकि चौथे सप्ताह में मानसून की गतिविधि में वृद्धि की संभावना है।
25 जून तक पूरे प्रदेश में मानसून छाने की उम्मीद है। जानकारों का मानना है कि रतलाम में पड़ी भीषण गर्मी के कारण इस बार अच्छी वर्षा होगी। पिछले 15 सालों में सर्वाधिक 70 इंच वर्षा 2019-2020 में दर्ज की गई, जबकि सबसे कम 23.3 इंच 2014-2015 में हुई। जिले की सामान्य औसत वर्षा 37.24 इंच है। पिछले वर्ष कुल 54.8 इंच बारिश हुई थी, जिसमें सैलाना में 80, रावटी में 70 और पिपलौदा में 64 इंच दर्ज की गई।
प्रकृति का बदलाव सामान्य मानसून
मौसम से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार मानसून सामान्य रहेगा। इन दिनों पश्चिम का विक्षोभ बारिश करा रहा है, लेकिन हकीकत में बेहतर मानसून की शुरुआत 20-21 जून के बाद होगी। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, रतलाम, मंदसौर और नीमच में मानसून पर सबसे बड़ा असर प्रकृति में हुए बदलाव से आया है। राजस्थान से सटे नीमच के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में तो बेहतर बारिश होती है, जबकि शेष जिले में कम बारिश होती है। इसी तरह की स्थिति रतलाम में भी है, जहां सैलाना-रावटी-पिपलौदा में बेहतर बारिश होती है, लेकिन शेष जिले में बारिश का ग्राफ कम रहता है। इसकी वजह प्रकृति के तालमेल की कमी बताई जा रही है।
देरी से आया था, सबसे कम हुई थी
जिले में 15 सालों में देरी से मानसून 2014-2015 में आया था। जब लोगों को मंदिर में ढोल-नगाड़े बजाने पर किसानों और आम जनता को मजबूर होना पड़ा था। मालवा में मान्यता है कि बारिश या मानसून की शुरुआत नहीं हो तो ढोल बजाकर बारिश करवाई जाती है। उज्जैनी कर खेतों में बाग रसोई बनाकर देवी-देवताओं का पूजा जाता ताकि बारिश आए। तब उस साल पहली बारिश जुलाई के दूसरे पखवाड़े में हुई थी। इसके पूर्व भी 2000 में मात्र 402 मिमी वर्षा दर्ज की गई थी। इसके बाद से हर साल बारिश का आंकड़ा बढ़ता गया। वर्ष 2006-07 में रिकार्ड तोड़ बारिश 1652 मिमी दर्ज की गई। इसके अगले साल भी सामान्य से अधिक बारिश हुई, फिर तीन साल तक बारिश ने किसानों को मायूस किया।
अतिवृष्टि बनी खतरनाक
जले में 2019-2020 में सबसे अधिक बारिश हुई थी। इस साल जून के दूसरे सप्ताह से बारिश की जो शुरुआत हुई थी तो दिसंबर माह तक बारिश का दौर चलता रहा था। खेत में पानी भरने से लेकर जर्जर आवास गिरने की घटना, घरों में पानी भरने की समस्या, रोड पानी के निकासी की व्यवस्था नहीं होने से भरे रहने की घटनाएं हुई थी।
इनका कहना है
मध्यप्रदेश में मानसून 15 तारीख के बाद आता हैं और 25 तारीख के आसपास पूरे प्रदेश में कवर कर लेता हैं। फिलहाल मानसून सिक्किम, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमीलनाडू, तेलांगना आदि क्षेत्रों को कवर रहा हैं। आगामी माह में मानसून के पेटर्न कैसे रहेगा यह कह पाना अभी जल्दी होगा। मासिक जानकारी के अनुसार बारिश थोड़ी कम रहेगी, मानसून कमजोर रहेगा। वर्तमान में माह के दूसरे सप्ताह में कम और तीसरे में थोड़ी कम रहेगी चौथे सप्ताह में थोड़ी वर्षा की गतिविधि बढ़ेगी।
अरुण शर्मा, मौसम विशेषज्ञ, भोपाल
फैक्ट फाइल 26 साल की बारिश आंकड़ा
वर्ष - मिमी में बारिश
2000/01 - 402.0
2001/02 - 585.1
2002/03 - 511.0
2003/04 - 888.8
2004/05 - 968.1
2005/06 - 766.0
2006/07 - 1652.3
2007/08 - 1190.0
2008/09 - 445.4
2009/10 - 677.5
2010/11 - 883.2
2011/12 - 1176.7
2012/13 - 981.00
2013/14 - 1255.03
2014/15 - 584.06
2015/16 - 822.85