
Chaturmas Marriage Rules-सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस अवधि में पूजा-अर्चना और साधना को विशेष फलदायी बताया गया है। वहीं कई मांगलिक कार्य भी वर्जित हो जाते हैं। पंचांग गणना के अनुसार 29 जुलाई को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, प्रीति योग की साक्षी एवं मकर राशि के चंद्रमा की उपस्थिति में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि (गुरु पूर्णिमा) से चातुर्मास का आरंभ होने जा रहा है। धर्म शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, चातुर्मास सत्संग, तीर्थाटन, दीक्षा, साधना, उपासना, आत्म-जागृति व स्वस्थ शरीर के पुनर्निर्माण का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करता है। यह वह पवित्र समय है जो पराशक्ति से आत्मा के संबंध स्थापित करता है।
ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया इस कालखंड में सभी प्रकार के व्यसनों का त्याग करना श्रेष्ठ माना गया है। चार माह विवाह, यज्ञोपवित और चौल कर्म वर्जित रहेंगे। देवताओं के शयनकाल से लेकर चार माह पर्यंत तक विवाह, यज्ञोपवित (जनेऊ संस्कार), मुंडन (चौल कर्म) आदि सभी प्रकार के मांगलिक और शुभकार्य पूरी तरह से वर्जित माने जाते हैं। चातुर्मास का आरंभ आषाढ़ पूर्णिमा से होता है, लेकिन हर महीने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है, जो प्रकृति और धर्म के संतुलन को दर्शाता है।
श्रवण-देवाधिदेव महादेव की विशेष आराधना, पूजन, अभिषेक और यज्ञ-यागादि कर्म। भाद्रपद-श्रीकृष्ण जन्मोत्सव। आश्विन-पितरों की तृप्ति के लिए 16 श्राद्ध, विघ्नहर्ता गणेश स्थापना व मां दुर्गा की आराधना (नवरात्र)। कार्तिक-महालक्ष्मी पूजन, दीपों का उत्सव और तुलसी विवाह के साथ ही पुनः मांगलिक कार्यों की शुरुआत।