
उदयपुर. जियोसाइंटिस्ट्स सोसायटी ऑफ राजस्थान की ओर से विश्व पर्यावरण दिवस पर 'अरावली पर्वतमाला - परिभाषा, पहचान एवं पर्यावरण' विषय पर संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने अरावली के अस्तित्व को बचाने के लिए इसके आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं के समग्र विश्लेषण पर जोर दिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता सोसायटी के अध्यक्ष रिटायर्ड चीफ पोस्ट मास्टर जनरल शैलेन्द्र दशोरा ने की। मुख्य वक्ता पूर्व प्रोफेसर डा. गोविन्द सिंह भारद्वाज ने कहा कि अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल के पूर्व में विस्तार को रोकती है और मानसून को आकर्षित कर जैव विविधता को पोषित करती है। उन्होंने खनन से होने वाले नुकसान पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की बनाई विशेषज्ञ समिति और नए खनन पट्टों पर लगाई रोक की जानकारी दी।
अरावली विकास प्राधिकरण के गठन की मांग
पूर्व प्रोफेसर डा. विनोद अग्रवाल ने न्यायालय में चल रहे वाद का संदर्भ देते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला को केवल 100 मीटर की ऊंचाई के दायरे में बांधना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्रों को अरावली श्रेणी में शामिल करने का सुझाव दिया। डा. अग्रवाल ने 'अरावली विकास प्राधिकरण' की स्थापना की आवश्यकता जताई, जिसमें भू-वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और खनिज इंजीनियरों को शामिल कर स्वतंत्र व विधि सम्मत विकास सुनिश्चित किया जा सके।
वहीं, राजस्थान माइन्स एवं मिनरल्स के सेवानिवृत्त महाप्रबंधक डा. रंजित चौधरी ने झामरकोटड़ा खदान का उदाहरण देते हुए कहा कि खनन समाप्ति के बाद गहरी खाइयों को जलाशय और 'इको पार्क' के रूप में बदला जाना चाहिए।
वाहनों और निर्माण कार्य से अधिक प्रदूषण
सोसायटी सचिव कन्हैयालाल जागेटिया ने स्पष्ट किया कि अरावली में खनन का क्षेत्रफल मात्र 1.44 प्रतिशत (278 वर्ग किलोमीटर) है, जबकि आबादी और भवनों का क्षेत्रफल 13.3 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि खनन के मुकाबले वाहनों और भवन निर्माण से कई गुना अधिक प्रदूषण हो रहा है।