उदयपुर

Success Story: ताने, विरोध और बेघर होने का दर्द…फिर भी नहीं मानी हार, गांव के लड़के ने सोशल मीडिया से बनाई पहचान

उदयपुर के योगेंद्र सिंह राठौड़ ने संघर्ष और आत्मविश्वास के दम पर सोशल मीडिया की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। आर्थिक तंगी और विरोध के बीच शुरू हुआ सफर आज उन्हें लाखों फॉलोअर्स तक ले आया है।

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Feb 28, 2026
योगेंद्र सिंह राठौड़। फोटो- पत्रिका

उदयपुर। डिजिटल दौर में जहां सोशल मीडिया ने कई युवाओं को नई पहचान दी है, वहीं योगेंद्र सिंह राठौड़ की कहानी संघर्ष, जिद और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है, जो हर युवा को प्रेरित करती है। साधारण परिवार से आने वाले योगेंद्र ने विपरीत परिस्थितियों के बीच अपने सपनों को साकार किया और आज वे इंस्टाग्राम की दुनिया में जाना-पहचाना नाम बन चुके हैं।

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आर्थिक तंगी में बीता बचपन

योगेंद्र का बचपन आर्थिक तंगी और पारिवारिक कलह के बीच बीता। जब वे मात्र छह माह के थे, तब पिता की शराब की लत और घर के तनावपूर्ण माहौल के कारण उनकी मां सीमा गहलोत उन्हें और उनकी छोटी बहन को लेकर ननिहाल आ गईं। नानी के घर हालात बेहद साधारण थे।

कई बार जरूरी जरूरतें भी पूरी करना मुश्किल हो जाता था। एक समय उनके पास अपना मोबाइल फोन तक नहीं था। जब योगेंद्र ने वीडियो बनाना शुरू किया तो उन्हें घर से ही विरोध का सामना करना पड़ा। परिवार चाहता था कि वे कोई नौकरी करें। हालात ऐसे बने कि उन्हें 10-12 दिनों तक घर से बाहर रहना पड़ा। इस कठिन समय में उनकी मौसी सोनिया गहलोत ने उनका हौसला बढ़ाया और सपनों को पूरा करने की सलाह दी।

पहली कमाई से खरीदा सेकंड हैंड आईफोन

सपनों को उड़ान देने के लिए योगेंद्र ने एक ई-कॉमर्स साइट के साथ अस्थायी काम किया। गांव-गांव जाकर दुकानों पर स्कैनर लगाने की जिम्मेदारी संभाली। कड़ी धूप में पैदल चलकर दो महीने में 14 हजार रुपए कमाए। इन्हीं पैसों से उन्होंने अपना पहला सेकंड हैंड आईफोन खरीदा। यही मोबाइल उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना। इसी से उन्होंने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करना शुरू किया।

पैशन बना प्रोफेशन

धीरे-धीरे उनका कंटेंट लोगों को पसंद आने लगा। मेहनत, निरंतरता और नए प्रयोगों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। आज उनके 5 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। वे ‘डेनवर’ और ‘हिमालय’ जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड्स के साथ प्रमोशनल प्रोजेक्ट कर चुके हैं। योगेंद्र का मानना है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि युवाओं के लिए अवसरों का बड़ा मंच है।

सफलता के साथ सामाजिक सरोकार

संघर्ष के दिनों को याद रखते हुए योगेंद्र समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। वे जरूरतमंद बच्चों को किताबें उपलब्ध कराते हैं। समय-समय पर भोजन वितरण करते हैं। त्योहारों पर बच्चों को उपहार देकर खुशियां बांटते हैं। उनका कहना है कि अभाव ने उन्हें संवेदनशील बनाया है और अब वे चाहते हैं कि कोई बच्चा संसाधनों के अभाव में अपने सपनों से समझौता न करे।

मां की मुस्कान सबसे बड़ी उपलब्धि

योगेंद्र अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को देते हैं। उनका कहना है कि आज सबसे बड़ा सुकून मां के चेहरे पर गर्व की मुस्कान देखना है। वे उन्हें नई-नई जगहों की सैर कराते हैं और हर उपलब्धि उनके नाम करते हैं। संघर्ष से शिखर तक का यह सफर बताता है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला और मेहनत साथ हो तो सफलता जरूर मिलती है।

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