Geopolitics: डोनाल्ड ट्रंप ने चीन यात्रा से पहले ईरान को 6 सप्ताह की डेडलाइन देकर वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच इस नई चाल से मध्य पूर्व के समीकरण बदल सकते हैं।
Donald Trump: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने अपनी आगामी चीन यात्रा से पहले ईरान को लेकर एक बेहद सख्त 'एग्जिट प्लान' (Exit Plan) तैयार किया है। इस योजना के तहत तेहरान को अपनी परमाणु गतिविधियों और क्षेत्रीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए केवल 6 सप्ताह का समय (6 Weeks Deadline) दिया गया है। जानकारों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी बीजिंग यात्रा से पहले मध्य पूर्व के मोर्चे को पूरी तरह साफ कर लेना चाहते हैं, ताकि वे राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) के साथ बातचीत में मजबूत स्थिति में रह सकें।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से संकेत मिले हैं कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर ईरान ने अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो उस पर अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Economic Sanctions) लगाए जाएंगे। यह अल्टीमेटम केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ड्रोन तकनीक के निर्यात और पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाने वाले समूहों को मिलने वाली मदद को बंद करना भी शामिल है। यह डोनाल्ड ट्रंप की उस 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति का हिस्सा है, जिसे वे अपने दूसरे कार्यकाल में और अधिक आक्रामकता के साथ लागू कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ईरान पर दबाव बनाना दरअसल चीन (China) को एक बड़ा संदेश देना है। डोनाल्ड ट्रंप यह दिखाना चाहते हैं कि अमेरिका अब भी ग्लोबल ऑर्डर को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। चीन के 'ग्लोबल टाइम्स' ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि अमेरिका की यह एकतरफा कार्रवाई वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए खतरा बन सकती है। ट्रंप की इस चाल का उद्देश्य बीजिंग के साथ होने वाली व्यापार वार्ताओं में ईरान के 'ऑयल कार्ड' को कमजोर करना है।
ईरान को दी गई इस डेडलाइन से सऊदी अरब और इजरायल जैसे देशों के बीच नई सुगबुगाहट शुरू हो गई है। ट्रंप का प्लान स्पष्ट है—या तो ईरान समझौते की मेज पर आए या फिर पूर्ण अलगाव (Total Isolation) का सामना करे। इस रणनीति के पीछे डोनाल्ड ट्रंप का मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व से अमेरिकी सेना की प्रत्यक्ष भागीदारी को कम करना है, जिसे उन्होंने अपने 'एग्जिट प्लान' का नाम दिया है। हालांकि, विशेषज्ञों को डर है कि 6 सप्ताह की यह छोटी अवधि तनाव को कम करने के बजाय संघर्ष को और भड़का सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह समय सीमा कूटनीतिक से अधिक मनोवैज्ञानिक है। वे चीन पहुंचने से पहले एक 'निर्णायक नेता' की छवि बनाना चाहते हैं। वहीं, ईरान ने इसे 'ब्लैकमेलिंग' करार दिया है।
अगले दो हफ्तों में अमेरिकी विदेश विभाग की एक उच्च स्तरीय टीम खाड़ी देशों का दौरा कर सकती है, ताकि ईरान पर दबाव बनाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों को एकजुट किया जा सके। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर पड़ सकता है। यदि ईरान ने जवाबी कार्रवाई के रूप में होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावित किया, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उछाल आ सकता है।