दुनियाभर में फिर बढ़ा इबोला वायरस का खतरा। WHO ने कहा चमगादड़ों और बंदरों के संपर्क में आने से बचें और उनके मांस का सेवन बिल्कुल न करें। तेजी से फैलते संक्रमण के कारण WHO ने International Health Emergency का ऐलान किया।
WHO International Health Emergency: अफ्रीका के कांगो और युगांडा में जानलेवा इबोला वायरस के तेजी से फैलने के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इंटरनेशनल हेल्थ इमरजेंसी लगा दी है। इस इबोला वायरस के कारण अब तक 88 लोगों की मौत हो चुकी है और 300 से ज्यादा संदिग्ध मरीज सामने आए हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी (CDC) के मुताबिक इस बीमारी में मृत्यु दर 80 से 90% तक है। फिलहाल मौजूदा वैक्सीन इस नए स्ट्रेन पर बेअसर हैं, जिससे दुनिया भर में हड़कंप मच गया है।
दरअसल, अफ्रीका महाद्वीप के कांगो (DRC) और युगांडा में इबोला वायरस ने इस कदर पैर पसारे हैं कि WHO ने इसे वैश्विक चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC Africa) के खतरनाक आंकड़े बताते हैं कि इस छुआछूत की बीमारी से अब तक 88 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, हालांकि, राहत की बात यह है कि फिलहाल यह महामारी (Pandemic) के पैमानों पर फिट नहीं बैठता है।
कांगो के इतूरी प्रांत में कम से कम तीन हेल्थ जोन्स से 246 संदिग्ध मामले और 80 मौतें दर्ज हुई हैं। उधर युगांडा की राजधानी कंपाला में भी बिना किसी सीधे संपर्क वाले लैब-कन्फर्म केस मिले हैं, जिसने सबको चौंका दिया है। इस भयानक स्थिति पर नजर रखते हुए WHO ने अपनी रिपोर्ट में साफ चेताया है, संक्रमित व्यक्तियों की वास्तविक संख्या और भौगोलिक विस्तार को लेकर काफी अनिश्चितताएं हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बार इबोला का कौन सा रूप सामने आया है? वैसे तो इबोला बीमारी वायरसों के एक समूह के कारण होती है, जिसमें इबोला वायरस, सूडान वायरस और बुंडीबुग्यो वायरस प्रमुख हैं। WHO के मुताबिक, मौजूदा तबाही 'बुंडीबुग्यो वायरस' (Bundibugyo virus) के कारण मची है। यह बेहद दुर्लभ है और इससे पहले इतिहास में सिर्फ दो बार ही इसके हमले देखे गए थे।
बुंडीबुग्यो वायरस का पहला मामला साल 2007-2008 में युगांडा के बुंडीबुग्यो जिले में आया था, तब 149 लोग संक्रमित हुए थे और 37 की जान गई थी। इसके बाद साल 2012 में कांगो के इसिरो में इसने 57 लोगों को बीमार किया और 29 की जान ले ली। साल 2013 से 2016 के बीच जब इबोला पश्चिम अफ्रीका में फैला था, तब 28 हजार से ज्यादा लोग बीमार हुए थे और 11,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।
इसी बीच, अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी (US CDC) ने चेतावनी दी है कि इबोला वायरस का शिकार होने वाले मरीजों की मृत्यु दर 80 से 90 फीसदी तक हो सकती है। इसकी चपेट में आने वाले इंसान का बचना बेहद मुश्किल हो जाता है। उधर, राहत की बात यह है कि यह कोरोना की तरह हवा (Airborne) से नहीं फैलता। यह संक्रमित व्यक्ति या जानवर के शरीर के तरल पदार्थ (थूक, खून, पसीना) के सीधे संपर्क में आने या दूषित चीजों को छूने से फैलता है। सामान्य संपर्क, पानी या मच्छर के काटने से यह नहीं फैलता।
WHO के मुताबिक, इबोला से बचने के लिए दो बेहद असरदार टीके (Vaccines) मौजूद तो हैं, लेकिन वे सिर्फ 'जायरे स्ट्रेन' (Zaire strain) के खिलाफ काम करते हैं। मौजूदा दुर्लभ बुंडीबुग्यो वायरस पर ये वैक्सीन बेअसर हैं। ऐसे में बचाव ही एकमात्र रास्ता है। WHO ने सलाह दी है कि संक्रमित चमगादड़ों, बंदरों या लंगूरों के संपर्क में आने से बचें और उनके कच्चे मांस का सेवन बिल्कुल न करें। इंसानों से इंसानों में फैलने वाले खतरे को रोकने के लिए मरीजों से दूरी बनाकर रखें और उन्हें तुरंत आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराएं।