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Chabahar Port: पाकिस्तान को पछाड़ कर भारत ने ईरान में गाड़ा झंडा, क्या है चाबहार की पूरी कहानी ?

Chabahar Port: भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों और तमाम वैश्विक चुनौतियों को पार करते हुए ईरान में रणनीतिक 'चाबहार पोर्ट' का सफलतापूर्वक विकास किया है। यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का कड़ा जवाब है, जिसके जरिए भारत बिना पाकिस्तानी सीमा का इस्तेमाल किए अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशियाई बाजारों तक अपना व्यापार फैला रहा है।

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Apr 29, 2026
Chabahar Port
चाबहार पोर्ट । (फाइल फोटो: पत्रिका )

Strategic Investment: भारत की कूटनीतिक जीत का सबसे बड़ा प्रतीक चाबहार पोर्ट अब एक नई दिशा की ओर बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि मध्य एशिया के बाजारों तक पहुँचने का भारत का अपना 'गेटवे' है। साल 2003 में शुरू हुआ यह सपना कई वैश्विक उतार-चढ़ावों और अमेरिकी प्रतिबंधों की बाधाओं को पार करते हुए आज हकीकत बन चुका है।

प्रतिबंधों की लहर और 2003 का वह समझौता

भारत और ईरान के बीच इस पोर्ट को विकसित करने की पहली सहमति 2003 में बनी थी। हालांकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने इसकी रफ्तार को धीमा कर दिया। लंबे समय तक यह प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में रहा, लेकिन भारत ने धैर्य नहीं खोया।

2015-16: मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक पहल

जब 2015 में अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु डील की, तब प्रतिबंधों में ढील मिलते ही भारत ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी। साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेहरान का ऐतिहासिक दौरा किया। यहाँ तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ मुलाकात के बाद भारत ने चाबहार के विकास के लिए 500 मिलियन डॉलर के निवेश का बड़ा वादा किया।

ट्रंप शासन और भारत की 'स्पेशल छूट'

2018 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु डील रद्द कर दी और फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए, तब इस प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। लेकिन भारत ने अपनी मजबूत विदेश नीति के दम पर अमेरिका से विशेष छूट प्राप्त की। इसका मुख्य तर्क यह था कि चाबहार के जरिए ही भारत अफगानिस्तान तक मानवीय सहायता पहुँचा सकता था।

चाबहार का रणनीतिक महत्व

यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जो चीन की मदद से बना है) का सीधा जवाब है। इसके जरिए भारत बिना पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किए सीधे अफगानिस्तान और रूस तक व्यापार कर सकता है।