ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर डाला है, जिससे उसका प्रभाव बिना परमाणु हथियार के भी मजबूत हुआ है।
पश्चिम एशिया में सालों से परमाणु हथियारों को लेकर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर चिंतित रहे हैं। लेकिन इसी बीच एक नया तथ्य सामने आया है कि ईरान की असली ताकत उसका परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण है।
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 से 25% हिस्सा संभालता है। ईरान ने टैंकरों के आवागमन को रोककर वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया। इससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा। इस कदम ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिना परमाणु बम के भी ईरान वैश्विक स्तर पर दबाव बना सकता है।
होर्मुज के बंद होने का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहा। दुनिया की लगभग 20% गैस और 1/3 उर्वरक सप्लाई भी इसी मार्ग से होती है। इसके बाधित होने से एशिया और यूरोप के कई देशों में उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 330 अरब डॉलर से लेकर 2.2 ट्रिलियन डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी चेतावनी दी है कि एक तिमाही के अवरोध से वैश्विक जीडीपी में 2.9% गिरावट आ सकती है। भारत जैसे देशों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
ईरान को एक बड़ा रणनीतिक सबक दिया है। अब वह परमाणु हथियारों के बजाय होर्मुज पर अपने नियंत्रण को ही मुख्य ताकत के रूप में देख रहा है। ईरान का मानना है कि जलडमरूमध्य पर उसका भौगोलिक अधिकार उसे वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाता है। उसने संकेत दिया है कि वह भविष्य में इस मार्ग पर शुल्क भी लगा सकता है, जिससे उसे हर महीने अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र और अन्य खाड़ी देशों ने इस पर चिंता जताई है और कहा है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग सभी के लिए खुले रहने चाहिए। इसके बावजूद ईरान अपने रुख पर कायम है और इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है।