No Kings protests: प्रदर्शनकारियों ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हम पर तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं। लेकिन असली ताकत लोगों के हाथ में होती है...
No Kings Protests 2026: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध को एक महीना हो गया है। इसी बीच अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ ‘नो किंग्स’ रैलियों के तहत बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विरोध प्रदर्शन अमेरिका ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई देशों में हुआ। दरअसल, प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, जिसमें ईरान के साथ युद्ध और बढ़ती महंगाई शामिल हैं।
अमेरिका के बड़े शहर न्यूयॉर्क सिटी, वाशिंगटन डीसी और लॉस एंजिल्स समेत छोटे शहरों में भी हजारों-लाखों लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि कई बड़ी रैलियां आयोजित की गई, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हम पर तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं। लेकिन असली ताकत लोगों के हाथ में होती है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझते हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ यह विरोध प्रदर्शन अमेरिका तक सीमित नहीं रहा। पेरिस, लंदन और लिस्बन में भी लोगों ने अमेरिकी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया और क्षेत्रीय प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई।
प्रदर्शन में शामिल लोगों में एक्टिविस्ट, सिविल राइट्स ग्रुप और आम नागरिक शामिल हैं। इस विरोध प्रदर्शन में ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध, इमिग्रेशन पर सख्त कार्रवाई और बढ़ती महंगाई को लेकर मुख्य मुद्दे रहें। मिनेसोटा में फेडरल एजेंट्स की कार्रवाई के दौरान दो अमेरिकी नागरिकों की मौत के बाद भी विरोध तेज हुआ है।
अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ हुए प्रदर्शन पर व्हाइट हाउस की तरफ से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। व्हाइट हाउस ने इन प्रदर्शनकारियों को खारिज करते हुए इन्हें ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस बताया। प्रशासन का कहना है कि ये विरोध वामपंथी मानसिकता के लोगों द्वारा प्रेरित हैं।
बता दें कि अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर यह पहली बार विरोध प्रदर्शन नहीं हुए है। इससे पहले पिछली साल जून और फिर अक्टूबर में भी लोगों ने प्रदर्शन किए थे। आयोजकों का कहना है कि जून के प्रदर्शनों में 50 लाख और अक्टूबर के प्रदर्शन में 70 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। वहीं राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आयोजकों का कहना है कि सभी रैलियां शांत रहीं और इनके उद्देश्य लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना है।