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Chaitra Navratri 2021 – Day2 – बुधवार के दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा दिलाएगी जीवन की हर जगह सफलता

maa brahmacharini ki puja kaise kare: मां ब्रह्मचारिणी को माता पार्वती का ही अविवाहित रूप : जानिये मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मंत्र व पौराणिक कथा

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brahmacharini mata ki puja vidhi

maa brahmacharini ki puja kaise kare

चैत्र नवरात्रि 2021 ( Navratri ) के दूसरे दिन यानि बुधवार 14अप्रैल को देवी माता दुर्गाजी के द्वितीय स्वरूप यानि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा ( brahmacharini mata ki puja ) की जाएगी। देवी मां ( Goddess Durga ) का ये स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला माना गया है।

मान्यता है कि इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। साथ ही जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

माता दुर्गाजी के द्वितीय स्वरूप यानि मां ब्रह्मचारिणी को माता पार्वती का ही अविवाहित रूप माना जाता है। ब्रह्मचारिणी संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ, ब्रह्म के समान आचरण करने वाली है। इन्हें कठोर तपस्या करने के कारण तपश्चारिणी भी कहा जाता है।

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इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह ( Marriage ) तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।

वहीं ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार देवी ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैं। ऐसे में देवी की पूजा से मंगल ग्रह ( MARS ) के बुरे प्रभाव कम होते हैं।

माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
माता ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र में सुशोभित हैं, उनके दाहिने हाथ में जप माला और बायें हाथ में कमण्डल है। देवी का स्वरूप अत्यंत तेज़ और ज्योतिर्मय है। साथ ही देवी प्रेेम स्वरूप भी हैं।

ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की आराधना : brahmacharini puja vidhi
- नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्चारिणी की पूजा ( poojan vidhi ) की जाती है। इस दिन सुबह उठकर नित्य क्रिया करके स्नानादि करके मां के समक्ष जाकर हाथों में सफेद पुष्प लेकर सच्चे मन से मां के नाम का स्मरण करें और घी का दीपक जलाकर मां की मूर्ति का पंचामृत से अभिषेक करें।

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- इसके बाद मातारानी को कुमकुम सिंदूर लगाकर मां के समक्ष मंत्र का उच्चारण करें।

'इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु
देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा।।'

- फिर वह प्रसाद जो आपने बनाया है ( Puja Path ) वह मां को अर्पण करें और प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर देवी मां की प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के उपरांत इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के बाद माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करें।

- ध्यान रहे कि मां ब्रह्मचारिणी को इस दिन मिश्री, चीनी और पंचामृत का भोग अवश्य चढ़ाना चाहिए।

मां से मिलने वाला आशीर्वाद : लंबी आयु व सौभाग्य का वरदान Signals देतीं हैं।

मंत्र :
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

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ध्यान मंत्र :
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥
परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्त्रोत :
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शङ्करप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच मंत्र :
त्रिपुरा में हृदयम् पातु ललाटे पातु शङ्करभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पञ्चदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अङ्ग प्रत्यङ्ग सतत पातु ब्रह्मचारिणी॥

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माता ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व importance of Brahmcharini Puja
बताया जाता है कि मां ब्रह्मचारिणी का स्मरण करने से (Brahmcharini Puja Ka Mahatva) तप, त्याग, सदाचार, वैराग्य और संयम में वृद्धि blessings होती है।

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार जो साधक विधि-विधान से देवी के इस स्वरुप की अर्चना करता है उसकी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है। माता ब्रह्मचारिणी के स्वरूप की पूजा का मुख्य उद्देश्य उनसे तप और साधना के तत्वों को सीखना है।

पौराणिक मान्यताएं : mythological story
मान्यता के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव ( Shiv-parvati-marriage ) से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद उनके माता-पिता उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश करने लगे। हालांकि इन सबके बावजूद देवी ने भगवान कामदेव से मदद की गुहार लगाई।

ऐसा कहा जाता है कि कामदेव ने शिव पर कामवासना का तीर छोड़ा और उस तीर ने शिव ( Lord Shiva ) की ध्यानावस्था में खलल उत्पन्न कर दिया, जिससे भगवान शंकर आगबबूला हो गए और उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। लेकिन यह बात यहीं खत्म् नहीं हुई और इसके बाद देवी पार्वती ने शिव की तरह जीना आरंभ कर दिया।

देवी पहाड़ पर गईं और वहां उन्होंने कई वर्षों तक घोर तपस्या की, जिसके कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम दिया गया। इस कठोर तपस्या से देवी ने भगवान शंकर ( Bhagwan Shiv ) का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इसके बाद भगवान शिव अपना रूप बदलकर पार्वती के पास गए और अपनी यानि शिव की ही बुराई की, लेकिन देवी ने उनकी एक न सुनी। अंत में शिव जी ने उन्हें अपनाया और विवाह किया।