
Muzaffarnagar factory labor scam : मुजफ्फरनगर की फैक्ट्री से मजदूरों का किया गया रेस्क्यू, PC- X
'मां, मैं जिंदा हूं…', शनिवार रात जब दिबियापुर के खजुबैया गांव का शिवम अपने घर पहुंचा, तो यह शब्द सुनते ही उसकी मां राजरानी की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। छह महीने पहले जिस बेटे को परिवार ने लगभग खो दिया था, वह अचानक उनके सामने खड़ा था। लेकिन लौटकर आया शिवम वह नहीं था जो घर से गया था। उसके शरीर का वजन आधा रह गया था, चेहरे पर खौफ था और आंखों में ऐसे जख्म, जिन्हें शायद जिंदगी भर भुलाया नहीं जा सकेगा।
शिवम रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकला था। एक जनवरी को गुरुग्राम से लौटते समय रेलवे स्टेशन पर उसका सामान चोरी हो गया। परेशान और असहाय शिवम को उसी दौरान एक युवक मिला, जिसने नौकरी दिलाने का भरोसा दिया। उसे क्या पता था कि यह भरोसा उसे सीधे नरक के दरवाजे तक ले जाएगा।
मुजफ्फरनगर की एक दोना-पत्तल फैक्टरी में पहुंचते ही उसकी आजादी छीन ली गई। बाहर की दुनिया से संपर्क खत्म कर दिया गया और शुरू हुआ अत्याचार का वह सिलसिला, जिसे याद कर आज भी उसकी रूह कांप जाती है।
शिवम बताता है कि फैक्टरी में मजदूरों को दिन-रात काम कराया जाता था। सोने के लिए मुश्किल से एक से डेढ़ घंटा मिलता था। खाने के नाम पर पूरे दिन में सिर्फ चार चोकर की रोटियां, थोड़ा नमक और लाल मिर्च।
जरा सी गलती या थकान दिखाने पर मशीन की बेल्ट, तार और पेंचकस से बेरहमी से पिटाई की जाती थी। फैक्टरी के भीतर ऐसा माहौल था जहां इंसानों से ज्यादा डरावने पिटबुल कुत्ते थे, जिन्हें मजदूरों पर नजर रखने के लिए छोड़ा गया था।
सबसे भयावह खुलासा तब हुआ जब शिवम ने बताया कि वहां से भागने की कोशिश करने वाले दो मजदूरों की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। उनके शव बोरे में भरकर कहीं फेंक दिए गए।
यह दावा केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस खौफ का आईना है जिसमें दर्जनों मजदूर हर दिन जी रहे थे। उनके लिए फैक्टरी कोई कार्यस्थल नहीं, बल्कि एक ऐसी कैद थी जहां हर सुबह यह डर लेकर शुरू होती थी कि शाम तक जिंदा बचेंगे या नहीं।
उधर, शिवम के घर में हर दिन उम्मीद और निराशा के बीच गुजर रहा था। मां राजरानी और पिता वीरेंद्र गौतम ने बेटे को ढूंढने के लिए न जाने कितने दरवाजे खटखटाए। वे गुरुग्राम की सड़कों पर पोस्टर लेकर घूमते रहे, लोगों से पूछते रहे, पुलिस से गुहार लगाते रहे।
मां कहती हैं कि छह महीने तक हर रात यही सोचकर कटती थी कि उनका बेटा आखिर किस हाल में होगा। अब जब वह वापस लौटा है तो खुशी है, लेकिन उसके शरीर और मन पर पड़े जख्म देखकर दिल बैठ जाता है।
मुजफ्फरनगर की यह घटना केवल कुछ अपराधियों की क्रूरता की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है, जिसमें रोजगार की तलाश में घर छोड़ने वाले लाखों मजदूर सबसे आसान शिकार बन जाते हैं।
रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और लेबर चौक ऐसे लोगों से भरे रहते हैं जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में निकलते हैं, लेकिन कई बार फर्जी ठेकेदार और दलाल उनकी इसी मजबूरी का फायदा उठा लेते हैं। पहचान, सुरक्षा और कानूनी जानकारी के अभाव में ये मजदूर लंबे समय तक शोषण झेलने को मजबूर हो जाते हैं।
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान और स्मार्ट शहरों की चर्चा होती है। लेकिन अगर एक गरीब मजदूर आज भी अपनी स्वतंत्रता खो देता है, महीनों तक कैद में रखा जाता है और उसके साथ अमानवीय व्यवहार होता है, तो विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसी देश की असली प्रगति उसकी ऊंची इमारतों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितना सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन दे पाता है।
Updated on:
29 Jun 2026 01:01 pm
Published on:
29 Jun 2026 12:35 pm
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