
राम मंदिर। (फाइल फोटो : पत्रिका)
Ram Temple Donation Case: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी से जुड़ी एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद कई अहम तथ्य उजागर हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा और निगरानी से जुड़े कई नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। जिससे आरोपियों को अवसर मिला। जांच में कुछ कर्मचारियों और जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। जबकि कुछ प्रमुख नामों का रिपोर्ट में उल्लेख नहीं होने से आगे की जांच को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
राम जन्मभूमि परिसर में चढ़ावे की गणना के दौरान हुई कथित अनियमितताओं को लेकर गठित एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ट्रस्ट की बैठक में प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरोपी रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव लंबे समय से मंदिर परिसर में रखी विभिन्न हुंडियों की चाबियां अपने पास रखता था। हालांकि, इसके लिए उसके पास कोई आधिकारिक अधिकार या लिखित अनुमति नहीं थी।
जांच में यह भी सामने आया कि टिन्नू यादव ने अपने भतीजे मनीष यादव को गणना कार्य से जोड़ने में भूमिका निभाई। आरोप है कि गणना प्रक्रिया के दौरान दोनों ने मिलकर चढ़ावे की रकम में हेराफेरी की। रिपोर्ट के अनुसार, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में लगभग 45 दिनों की अवधि के दौरान आरोपी कई बार संदिग्ध गतिविधियां करते हुए दिखाई दिए। जांच एजेंसी का कहना है कि सीमित अवधि की फुटेज उपलब्ध होने के कारण यह पता नहीं चल सका कि इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हुई थीं या नहीं।
एसआईटी ने गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव की जिम्मेदारी भी तय की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी मौजूदगी में कथित गड़बड़ी हुई। इसलिए उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की गई है। रिपोर्ट में सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र की कमजोरियों को बताया गया है। जांच के दौरान पाया गया कि गणनाकर्मियों की तलाशी, निर्धारित ड्रेस कोड, निजी सामान पर नियंत्रण, रकम का व्यवस्थित रिकॉर्ड और प्रभावी निगरानी जैसी कई जरूरी व्यवस्थाएं लागू नहीं थीं। इसके अलावा गणना कक्ष में सीसीटीवी कैमरे मौजूद होने के बावजूद फुटेज की नियमित निगरानी नहीं की गई।
जांच में यह भी उल्लेख किया गया कि नकदी गणना जैसे संवेदनशील कार्य के लिए केवल 45 दिन की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं था। पहले 180 दिनों तक फुटेज संरक्षित रखने का सुझाव दिया गया था, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2025 में गणना प्रक्रिया को लेकर एक मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) बनाई गई थी। जिसमें प्रवेश, निगरानी और सुरक्षा के स्पष्ट नियम तय किए गए थे। बाद में इन नियमों में ढील दी गई। जिससे व्यवस्था कमजोर हुई। जांच एजेंसी ने यह भी कहा है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि इन नियमों में बदलाव किन परिस्थितियों में किए गए।
रिपोर्ट में ट्रस्ट के पदाधिकारी अनिल मिश्रा की निगरानी संबंधी जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए उनकी भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं, चंपत राय और गोपाल राव का नाम इस प्रारंभिक रिपोर्ट में नहीं है। एसआईटी ने स्पष्ट किया है कि जांच अभी जारी है। अंतिम रिपोर्ट में प्रशासनिक जवाबदेही, संस्थागत कमियों तथा सुधार संबंधी सुझावों को विस्तार से शामिल किया जाएगा।
Updated on:
07 Jul 2026 08:21 am
Published on:
07 Jul 2026 08:21 am
