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सरदार सरोवर बांध बड़वानी के डूब प्रभावितों ने कफन औढ़कर दी सरकार को चुनौती

सरदार सरोवर बांध के डूब गांव खाली करने में 24 घंटे भी नहीं बचे, डूब प्रभावितों ने किया कफन सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, चार दिन से अमरण अनशन पर बैठे अनशनकारियों की तबीयब बिगडऩा शुरू

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Manish Arora

Jul 31, 2017

Sinking Affected and Nabam Worker

Sinking Affected and Nabam Worker

बड़वानी. सरदार सरोवर बांध के डूब गांवों को खाली कराने में सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन से अब 24 घंटे भी बाकी नहीं बचे है। 31 जुलाई तक प्रशासन को गांवों का पुनर्वास करना है। अब तक आधे से ज्यादा परिवार डूब गांवों में ही निवासरत है। संपूर्ण पुनर्वास की मांग को लेकर नबआं और डूब प्रभावित विभिन्न आंदोलन भी चला रहे है। रविवार को डूब प्रभावितों ने जहां बड़वानी में कफन औढ़कर सरकार को चुनौती दी। वहीं, चिखल्दा में पानी में उतरकर सरकार को ललकारा। उधर चिखल्दा में चार दिन से अमरण अनशन पर बैठे अनशनकारियों की तबीयत भी बिगडऩे लगी है। 31 जुलाई बड़वानी, धार, खरगोन और अलीराजपुर के 178 गांवों को खाली कराने की आखिरी तारीख, लेकिन डूब प्रभावित गांव खाली करने को तैयार ही नहीं है। शनिवार को मुख्यमंत्री की पुनर्वास को लेकर की गई घोषणाओं के बाद भी आंदोलनरत डूब प्रभावितों पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि आंदोलन तेज करते हुए जहां बड़वानी के शहीद स्मारक कारंजा पर दोपहर में एक घंटा कफन सत्याग्रह किया। वहीं, चिखल्दा घाट पर तीन घंटे जल सत्याग्रह किया। डूब प्रभावितों का कहना था कि जब सरकार हमारी जल हत्या करने पर तुल ही गई है तो हमनें भी अब कफन औढ़ लिया है। चाहे जल समाधि लेना पड़े, लेकिन बिना संपूर्ण पुनर्वास के हम गांव नहीं खाली करेंगे।


घोषणा से सिद्ध हो गया बाकी है पुनर्वास
अमरण अनशन पर बैठीं नर्मदा बचाओ आंदोलन नेत्री मेधा पाटकर ने बताया कि सीएम ने अब घोषणा की है जब गांव खाली करने में एक दिन बाकी बचा है। इनकी घोषणा से सिद्ध हो रहा है कि गांवों में पुनर्वास बाकी है। जब तक पुनर्वास नहीं हो जाता तब तक ये पानी कैसे भर सकते है। वैसे भी सीएम सिर्फ घोषणा कर सकते हैं, इसका पालन करना तो प्रमुख सचिव के हाथ में होता है। अभी पहले की 15 लाख रुपए देने की घोषणा ही पूरी नहीं हो पाई है। अब अंत समय में घर बनाने के लिए 5-5 लाख की घोषण कब और कैसे पूरी होगी। ये घोषणा अगर करनी ही थी तो जब नर्मदा सेवा यात्रा कर रहे थे तब ही कर देते।


फैक्ट फाइल...
178 कुल डूब गांव चार जिलों में
65 गांव बड़वानी के
77 गांव धार जिले के
26 गांव अलीराजपुर के
10 गांव खरगोन जिले में
एनवीडीए के अनुसार
23614 कुल प्रभावित चार जिलों में
9242 का हो चुका विस्थापन चारों जिले में
5551 परिवार गुजरात में बस गए
8821 का पुनर्वास बाकी


50 प्रतिशत हट चुके वर्तमान में
डूब प्रभावित तेजी से अपना विस्थापन कर रहे है। चारों जिलों में बचे परिवारों में से 50 प्रतिशत विस्थापित किए जा चुके हैं। सीएम की घोषणा के बाद ये आंकड़ा बढ़ रहा है। बाकी बचे परिवारों का भी पुनर्वास किया जाएगा।
आदिल खान, पीआरओ एनवीडीए भोपाल


अरमानों से सजाया पिया आ आंगन, कैसे उजाड़ दे हाथों से
शादी के बाद जब बाबुल का घर छोड़कर ससुराल में पहला कदम रखा, तो मन में कई तरह के ख्वाब संजोए थे। भविष्य के सुनहरे कल के लिए ढेर सारे अरमान थे। इन्हें से पिया का आंगन सजाया था, लेकिन अब सबकुछ छोड़कर दूसरी जगह नया आशियाना तैयार करना होगा। सुनने में यह जितना आसान है, उतना ज्यादा मुश्किल है। ये कहना है कि ज्योति और रजनी यादव की। दोनों की शादी फरवरी 2017 में हुई है। ज्योति की शादी राहुल और रजनी की शादी मनीष यादव के साथ हुई। पिता के घर से जब पति के घर डोली आई, तो अन्य नवविवाहिताओं की तरह ज्योति व रजनी के मन में भी ढेर सारी खुशियां थी, लेकिन नीयती को कुछ ओर मंजूर था। सरदार सरोवर बांध के डूब प्रभावितों को हटाने की डेडलाइन 31 जुलाई यानी सोमवार को पूरी हो रही। इसे में लोगों को अपनी जमीन और घर से उडऩे का डर सता रहा है। इससे डूब प्रभावित गांवों में जिन बहुओं का आगमन हुआ है, उनकी खुशियों पर भी ग्रहण लग गया।


नए सिरे से ढूंढ रहे ठिकाना
नर्मदा का जलस्तर बढऩे के बाद डूब प्रभावितों को पुनर्वास स्थलों पर भेजा जाना है। इनमें कुछ परिवारों के पास अब भी रहने के लिए घर की व्यवस्था नहीं है। बीते तीन महीनों में ऐसे गांवों में करीब सौ से अधिक बहुओं का आगमन हुआ है। जिन्हें घर छोडऩे के बाद नए सिरे से गृहस्थी तैयार करना होगी।


अंतिम बार पुराने घर में होता राखी का त्योहार
नवविवाहित बहुओं की तरह ही डूब प्रभावित गांवों से जिन बेटियों की शादी दूसरे गांवों में हुई है, वे भी परेशान है। रक्षाबंधन का पहला त्योहार है। पिता और परिवार पर आई विपदा से बेटी-बहनें भी दु:खी है। किरण चौहान और सोनाली तंवर का कहना है कि गांव में पुराने घर में भाई को आखिरी बाहर राखी बांधने की इच्छा रखती है। लेकिन क्या यह संभव होगा। यह किसी को पता नहीं।


बचपन के दोस्त के लिए छोड़ आए गुजरात में मिली जमीन
गांव की छोटी-छोटी गलियों में दोस्तों के बीच खेलकर बढ़े हुए। यहां की मिट्टी से अनेकों यादेंं जुड़ी है। मंदिर की चौखट पर ही बैठकर सुख-दु:ख की बातें किया करते थे। 1993 में पहली बार अपनों को छोड़कर गुजरात जाना हुआ, लेकिन दिल से कभी एक-दूसरे को अलग नहीं कर पाए। 10 साल अलग रहने के बाद गुजरात में मिली जमीन को छोड़कर बशीर मंसूरी बड़वानी चले आए। यहां बचपन के दोस्त कैलाश यादव के साथ ही कसरावद बसाहट में किराए के घर में रहने लगे। ये कहानी केवल बशीर मंसूरी (46) और कैलाश (50) के जीवन पर आधारित नहीं है। सरदार सरोवर बांध के कारण गांवों में पीढिय़ों से रहने वाले लोगों को अलग-थलग कर दिया। दोस्त, परिवार और रिश्तेदारों के रूप में कई लोगों की भावनाएं विकास की भेंट चढ़ा दी। उल्लेखनीय है कि एक तरह बांध की डूब के 24 घंटे शेष बचे है, तो दूसरी ओर हजारों प्रभावित परिवारों का संघर्ष है। डूब प्रभावित अब भी अपने गांव और मिट्टी को छोड़कर जाने को तैयार नहीं। रविवार तक पुराने गांवों में किसी तरह की हलचल नहीं दिखाई दी।


आठ सदस्यों को मिली जमीन
बड़वानी से करीब 5 किमी दूर छोटी कसरावद में बशीर मंसूरी के परदादा रेहमान रहते थे। उनके नाम का 12 एकड़ खेत था, जो बांध की डूब में आता है। इसकेे लिए मंजूरी परिवार के आठ भाइयों को वागुडिया तहसील तालुका जिला बड़ौदा में जमीन मिली। बशीर कहते हैं कि 1993 में पिता मजिद मंसूरी के साथ सभी भाई गुजरात चले गए। यहां 5-5 एकड़ जमीन मिली, जो दलदली थी। चावल के अलावा कुछ पैदा नहीं होता। खाने-पीने के लाले पड़ गए। दो लाख रुपए कर्ज हो गया। इसके बाद जमीन को छोड़कर वे बड़वानी चले आए। आप पैसा और जमीन पास नहीं है। परिवार में बीवी और तीन बच्चों के गुजर-बसर के लिए मजदूरी करते हैं। तसली इस बात की है कि गांव लौटने के बाद 40 साल पुराना दोस्त मिल गया। उधर, कैलाश यादव का कहना है कि बांध के बैकवाटर में पूरा गांव डूब रहा है, लेकिन उनके घर का अभी तक न सर्वे हुआ और ना ही किसी तरह की मदद मिली।


बढ़ों के साथ बच्चे भी उरते विरोध में
बांध की जद में आ रहे गांवों में बढ़ों के साथ ही बच्चे भी विरोध कर रहे हैं। ऐसा ही नजारा रविवार को राजघाट में देखा गया। चिखल्दा और राजघाट के बीच पुल पर साइकिल लेकर जा रहे अखिलेश और मोहन हाथों में नर्मदा बचाओ आंदोलन का झंडा था, उनकी खामौशी ही डूब के विरोध को बयां कर रही थी।


1300 परिवारों के पास नहीं है छत
सरदार सरोवर बांध की डूब को लेकर उल्टी गिनती शुरू हो गए। प्रभावितों के पास हटने के लिए 24 घंटे का समय ही शेष बचा है। उधर, प्रशासन गांवों को खाली कराने की पूरी तैयार कर चुका है। इसकी शुरुआत कहां और कैसे होगी, इस संबंध में कोई भी अधिकारी खुलकर बताने को तैयार नहीं है। जिले में 46 डूब प्रभावित गांवों में 1300 परिवार ऐसे है, जिनके घर डूबने की स्थित में रहने के लिए छत नहीं है। मूल गांव को छोड़कर यह दूसरी जगह जाते हैं, तो उनकी रहने की व्यवस्था क्या होगी। इसकी फिक्र प्रशासन को भी नहीं है। सरकार की घोषणा के अनुसार मकान खाली करने वाले परिवारों को 80 हजार और घर बनाने के लिए 1.40 लाख रुपए मिलना है। इस पर भरोसा कर के कुछ लोगों ने पुराने मकान तोड़ लिए, लेकिन उन्हें राशि नहीं मिली है।


तीन महीने शरणार्थी बनकर रहेंगे
जिले में 1000 परिवारों के रहने के लिए टीनशेड में रहने के लिए अस्थाई व्यवस्था की जा रही है। यहां प्रभावितों को तीन महीने शरणार्थियों की तरह रहना होगा। भोजन और रहने की व्यवस्था भले ही प्रशासन ने कर दी। लेकिन आगे का भविष्य क्या होगा, परिवार में बच्चे व महिलाओं को कैसे रखेेंगे, क्या खाएंगे...? ये ऐसे सवाल है, जो अंदर ही अंदर लोगों को खाए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रभावित क्षेत्रों में अधिकांश किसान है। जिनके पास मवेशी, टै्रक्टर सहित अन्य सभी संसाधन है। इनकों रखने की व्यवस्था नाकाफी नजर आ रही है।

फैक्ट फाइल जिले में
-46 डूब प्रभावित गांव
-38 पुनर्वास स्थल
-2300 परिवारों के पास रहने के लिए घर नहीं।
-1000 परिवारों की रहने की वैकल्पिक व्यवस्था।
-10 प्रतिशत लोग नए स्थानों पर शिप्ट हुए।
-810 स्कूलें डूब प्रभावितोंं गांवों में संचालित।

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-40 ग्राम पंचायतें।
-840 आंगनवाड़ी केंद्र।
-20 स्वास्थ्य केंद्र।