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सेमरा में एक सप्ताह पहले उत्साह के मनाई दिवाली, रंगोली बनाकर मां लक्ष्मी का किया स्वागत

बालोद जिले में 12 नवंबर को दिवाली मनाई जाएगी। वहीं धमतरी जिले की सीमा पर बसे ग्राम सेमरा (सी) में रविवार को उत्साह के साथ दिवाली मनाई गई। गांव में हर घर के बाहर व आंगन में लोगों ने रंगोली बनाकर धन की देवी मां लक्ष्मी का स्वागत किया।

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 रंग-बिरंगी आतिशबाजी के साथ आसमान हुआ रंगीन

बच्चों ने पटाखे जलाए

बालोद. जिले में 12 नवंबर को दिवाली मनाई जाएगी। वहीं धमतरी जिले की सीमा पर बसे ग्राम सेमरा (सी) में रविवार को उत्साह के साथ दिवाली मनाई गई। गांव में हर घर के बाहर व आंगन में लोगों ने रंगोली बनाकर धन की देवी मां लक्ष्मी का स्वागत किया। सोमवार को गोवर्धन पूजा करेंगे। रविवार की देर शाम ग्राम के सिरदार देव मंदिर में ग्रामीणों ने दीये जलाकर विशेष पूजा की। इसके बाद घर-घर में मां लक्ष्मी की पूजा की गई। रंग-बिरंगी आतिशबाजी के साथ आसमान रंगीन हो गया। बच्चों ने पटाखे जलाए। लोगों ने एक-दूसरे के घर मिठाई व प्रसाद बांटा। उत्सव में जिले के दस से अधिक गांव के ग्रामीण भी शामिल हुए।

बालोद जिले के ग्रामीण भी बने उत्साह के गवाह
सेमरा में प्रचलित मान्यता के तहत लोग दीपावली सहित कई त्योहारों तय तिथि से एक सप्ताह पहले मना लेते हैं। इस परंपरा के अनुसार रविवार को धूमधाम व उत्साह के साथ दिवाली पर्व मनाया गया। गुरुर विकासखंड के ग्राम अरकार, जोरातराई सहित दर्जनभर से अधिक गांव के लोग दिवाली देखने सेमरा जाते हैं। इस गांव के सिरदार देव मंदिर है। एक सप्ताह पहले दीवाली मनाने का प्रचलन इसी मंदिर से भी जुड़ा है।

सिरदार देव मंदिर में ग्रामीणों ने दीये जलाकर विशेष पूजा की IMAGE CREDIT: balod patrika

एक सप्ताह पहले दिवाली की यह है मान्यता
ग्रामीण रवि सिन्हा, मदन लाल व अन्य के मुताबिक कई साल पहले सिरदार नाम के बुजुर्ग रहने आए थे। उनकी चमत्कारिक शक्तियों एवं बातों से लोगों की परेशानियां दूर होने लगी। उनके प्रति आस्था व श्रद्धा का विश्वास उमडऩे लगा। समय गुरजने के बाद सिरदार देव के मंदिर की स्थापना की गई। मान्यता है कि किसी किसान को स्वप्न देखकर सिरदार देव ने कहा था कि प्रतिवर्ष दीपावली, होली, हरेली व पोला चार त्योहार हिंदी पंचाग में तय तिथि से एक सप्ताह पूर्व मनाया जाए। ताकि इस गांव में उनका मान बना रहे। तब से यह परंपरा चली आ रही है।

परंपरा की शुरुआत से ग्रामीण हैं अंजान
ग्रामीण रामावतार ने बताया कि उनके पूर्वजों ने कभी उन्हें इस परंपरा की शुरुआत से परिचित नहीं कराया। शायद उन्हें भी परंपरा के समय का अनुमान नहीं हो। हम भी परंपरा से अपने बेटे, नाती-पोतों को परिचित करवा रहे हैं, जिससे यह परंपरा सदियों तक जीवित रहे।


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