
प्रतिबंध के बावजूद बाजार में बिक रही करील (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Chhattisgarh News: मानसून के सीजन में बांस की नई कोंपल यानी करील अपनी खास मांग और स्वाद के कारण स्थानीय सब्जी बाजारों की रौनक बढ़ा रही है, लेकिन इसकी बेरोक-टोक आवक ने वन संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के मुताबिक, जून के मध्य से लेकर अगस्त के अंत तक का समय बांस के प्राकृतिक पुनर्जनन (रिजेनेरेशन) के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समयावधि में करील की कटाई पूरी तरह प्रतिबंधित होती है, इसके बावजूद बाजारों में इसका पहुंचना अवैध कटाई और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल रहा है।
डीएफओ का सख्त रुख, होगी कड़ी कार्रवाई: मामले के तूल पकड़ने के बाद बलौदाबाजार-भाटापारा वन मंडल के प्रभागीय वनाधिकारी पंकज नयन ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वन क्षेत्र में करील की कटाई पूरी तरह प्रतिबंधित है। यदि इसके बावजूद बाजारों में करील बिक रही है, तो वन विभाग इसकी गंभीर जांच करवाएगा और अवैध कटाई व परिवहन में संलिप्त लोगों के खिलाफ नियमानुसार सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
वर्तमान में स्थानीय बाजारों में करील 80 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मांग और आपूर्ति का अंतर इसी तरह बना रहा, तो आने वाले दिनों में इसकी कीमतें दोगुनी तक पहुंच सकती हैं। प्रतिबंधित अवधि और सीमित कानूनी आपूर्ति के बावजूद बाजार में इसकी लगातार मौजूदगी इस बात की तस्दीक करती है कि वनांचलों से चोरी-छिपे इसकी कटाई और परिवहन का अवैध कारोबार धड़ल्ले से जारी है।
पर्यावरणविदों के अनुसार, अगस्त के आखिरी हफ्तों तक बांस के झुरमुटों से जो नई कोंपलें निकलती हैं, वे बेहद कोमल होती हैं और आगे चलकर नए बांस के पौधों का रूप लेती हैं। यही कोंपलें बांस वनों के प्राकृतिक विस्तार का मुख्य आधार होती हैं। यदि इन्हें शुरुआती अवस्था में ही काट लिया जाएगा, तो वनों का दायरा और बांस की संख्या प्रभावित होना लाजिमी है। यही वजह है कि इस सीजन में करील की कटाई पर रोक लगाई जाती है।\
सूत्रों के अनुसार, बाजारों में बिक रही करील पड़ोसी वनांचलों जैसे गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, कटघोरा और बलौदाबाजार जिले के बारनवापारा अभ्यारण्य से लाई जा रही है। वहीं, इसकी गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। ताजी करील को लंबे समय तक ताजा और चमकदार बनाए रखने के लिए चूने के घोल या अन्य रासायनिक पदार्थों में डुबोए जाने की बात सामने आ रही है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। उपभोक्ताओं की सेहत को ध्यान में रखते हुए खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा इसके नमूनों की जांच की मांग उठ रही है।
Updated on:
25 Aug 2026 04:29 pm
Published on:
25 Aug 2026 04:29 pm
