
शिक्षा से संस्कार को बढ़ाएं
बेंगलूरु. शांतिनगर जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ में आयोजित प्रवचन में आचार्य महेन्द्रसागर ने कहा कि संसार में पूर्व काल के हिसाब से वर्तमान समय में विद्यापीठ-विद्यालय और विश्वविद्यालय बढ़े हैं। पढ़ाने वाले शिक्षक बढ़े हैं तो पढऩे वाले विद्यार्थी भी बढ़े हैं। लेकिन मनुष्य बुराइयों से मुक्त नहीं हो रहा है। ज्ञान और विद्या के जरिये मनुष्य की चेतना ऊपर उठती नहीं दिख रही है।
मनुष्य की दिव्यता देवता के शिखरों की ओर नहीं उठती है, किंतु गिरते हुए पशुता की तरफ पहुंचने की ओर अग्रसर है। ज्ञान के साथ जीवन की अच्छाइयां बढऩे के बजाय क्षीण होती जा रही है। शिक्षा-ज्ञान तो वर्तमान में बढ़ा है, पर उसके साथ भ्रष्टाचार-व्यभिचार-बलात्कार और हिंसा भी बेहिसाब बढ़े हैं।
शुभ भावनाओं के लिए पुरुषार्थ जरूरी
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के महावीर भवन में धर्मसभा में आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि युद्ध के मैदान में लाखों योद्धाओं को अपने पराक्रम के साथ में जीत पाना आसान है, परंतु अपने भीतर रहे मन को जीतना अत्यंत ही कठिन है। समुद्र की तरंग जैसे बदलते रहती है, उसी तरह हमारा मन भी हमेशा बदलते रहता है। मन-वचन और काया में मन की महत्ता ज्यादा है। मन द्वारा किए गए सत्कार्य की कीमत काया से ज्यादा होती है। जब तक मन पवित्र और स्थिर नहीं होता है, तब तक आत्मा भी पवित्र नहीं बन सकती है।
आचार्य ने कहा कि मन के मुख्य दो दोष हैं-मन अत्यंत ही चंचल और मन मैला भी होता है। जिस प्रकार पानी का यह सहज स्वभाव है कि वह निम्न गति की ओर ही बहता है, उसी प्रकार मानव का मन अशुभ निमित्तों से बहुत ही जल्दी प्रभावित होता है। पानी को ऊपर चढऩा हो तो मशीन की अपेक्षा रहती है। उसी प्रकार मन को शुभ विचार और शुभ भावनाओं से भावित करना हो तो प्रबल पुरुषार्थ की अपेक्षा रहती है।

Published on:
20 Aug 2018 06:21 pm
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