
Rajasthan monsoon forecast: प्रतीकात्मक फोटो
बांसवाड़ा। दक्षिणी राजस्थान के प्रकृतिप्रेमी हवाओं के रुख एवं बदलियों के वेग से जान जाते हैं कि इस बार पहले बंगाल की खाड़ी या अरब सागर का मानसून पहले दक्षिणी राजस्थान को भिगोएगा। इसके साथ ही होली एवं दीपावली पर यहां होने वाली कई परम्पराओं से भी प्रकृतिप्रेमी जान लेते हैं चौमासे के चार माह में कितने-कितने दिन बारिश होगी।
स्तम्भ लेखक एवं भाषाविद् प्रकाश पण्ड्या के अनुसार आसमां में आभी (बदलियों की उत्तर-दक्षिण की आवाजाही) से लेकर हवाओं के वेग सहित विभिन्न प्रकार के तौर-तरीकों से आमजन आज भी मौसम की चाल को सहज जान लेते हैं। यहां के पुराने लोग एवं प्रकृति प्रेमी चौमासे में कहां, कब कितनी मात्रा में बदरा बरसेंगे उसका आंकलन कर लेते हैं।
आभी पक्के अनुमानों की चाबी मानी जाती है। अब तक के अनुमानों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो आभी की इस प्रक्रिया को सबसे सटीक माना जाता है। दोनों दिशाओं से बादलों का आवागमन यहां वागडी स्थानीय उप भाषा में वादरा पाणी भरवा जाए कहा जाता है। प्रकृतिविदों के अनुसार आभी चलने के 30 दिन के भीतर मानसून का सक्रिय होना तय माना जाता है।
पण्ड्या के अनुसार ‘आभी’ बादलों की आवाजाही की उस प्रक्रिया को कहते हैं, जो नौतपे के बाद उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर दिशा की तरफ आवागमन करते हैं। इसी आधार पर परंपरागत मौसम विज्ञानी मानते हैं कि वागड़ में होने वाली बरसात में अधिकतम बारिश बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उठे मानसून में से किससे ज्यादा होगी..?
प्रकृतिप्रेमियों का मानना है कि मौसम को समझने का यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। पक्षियों की गतिविधियां, हवाओं का रुख, बादलों का रंग और गति, आर्द्रता में बदलाव तथा पेड़-पौधों के व्यवहार जैसे संकेत आज भी ग्रामीण समाज के लिए मौसम की जानकारी के महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। आधुनिक मौसम विज्ञान के युग में भी यह पारंपरिक ज्ञान लोगों के लिए उत्सुकता और शोध का विषय बना हुआ है।
डूंगरपुर जिले के भीलूड़ा में रक्षा बंधन पर्व पर मौजूदा ही नहीं अगले साल के बारिश की चाल पता लगा लेते है। यहां रघुनाथजी मंदिर में हलिया रस्म से चौमासे के चारों माह आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन में होने वाली वर्षा के दिनों और उसकी तीव्रता का अनुमान लगा लेते हैं। इस दौरान हजारों की भीड़ उमड़ती है और इसके आधार पर ही अगले वर्ष की खेती की जाती है।
मई माह के अंत एवं जून माह की शुरूआत में सुबह पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व चलने वाली हवाओं से भी कई प्रकृति प्रेमी मानसून कब तक आएगा यह जान लेते हैं। इसे कोलमण कहते हैं।
Published on:
18 Jun 2026 02:55 pm
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