भोजन और पानी नहीं मिल रहा तो हिंसक हो रहे हैं मगरमच्छ

जिले की परवन, पार्वती व कुनु नदियों में हैं इनके रहवास

By: mukesh gour

Published: 10 Jun 2021, 12:10 AM IST

बारां. प्रकृति ने प्रत्येक जीव को जीने की नेमत बख्शी है। इनमें थल, नभ व जलचर समेत सभी प्रकार के जीव-जन्तु शामिल हैं। लेकिन यह सच है कि कोई भी जीव-जन्तु उसके जीवन की राह को सुगम बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। अपने जीवन में उसे दूसरे जीव का दखल बर्दाश्त नहीं होता। लेकिन हद तो तब होती है, जब जब इनके जीवन में इंसानी दखल बढ़ता है। करीब पांच दिन पूर्व अटरू क्षेत्र से होकर बहने वाली परवन नदी में अचरावां गांव के निकट पानी के एक बड़े गड्ढे (डाबरे) में जलीय जीव मगरमच्छ ने हमला कर एक बालक को मौत के मुंह में धकेल दिया था। जिले में यह पहली घटना नहीं थी, इससे पहले भी दर्जनों लोग मगरमच्छों के हमलों का शिकार बने थे। जिन क्षेत्रों मेंं इस जलीय जीव का निवास है, वहां के बाशिंदें कई बार खुद ही इनके लिए विषम हालात बना खतरे की घंटे बजा देते हैं तो कई क्षेत्रों में भोजन व पानी की कमी इन्हें हिंसक बना देती है।

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नदियों में भरमार
जिले से होकर बहने वाली परवन, पार्वती व शाहाबाद क्षेत्र की कुनु नदी मगरमच्छों की शरणस्थली है। जब तक इन नदियों में पानी की पर्याप्त उपलब्धता रहती है, मगरमच्छ हिसंक नहीं होते। वन्यजीव प्रेमियों के अनुसार इन तीनों नदियों में दो सौ से अधिक मगरमच्छों ने अपने ठिकाने बनाए हुए हैं।
यह घटनाएं इनके हिंसक होने का प्रमाण
गऊघाट. परवन मे अब तक मगरमच्छ के हमलों मे कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। 16 मई 2016 को मोटूका निवासी वृद्ध ताराचंद सुमन, 21 मई 2016 कराडिया गुल्जी निवासी लालचंद बैरवा पर मगरमच्छों ने हमला किया था। 17 अप्रेल 2018 को अचरावां गांव के 11 वर्षीय बालक अमन का दो दिन बाद शव बरामद हुआ था। उसे मगरमच्छ ने ग्रास बनाया था। इसके बाद भैंसड़ा गांव निवासी 65 वर्षीय गुलाबचंद मीणा मगरमच्छ का शिकार बना। 21 जुलाई 2019 को गऊघाट निवासी हरलाल सुमन नहाते हुए मगरमच्छ नदी मे खीच ले गया। उसका शव दूसरे दिन मिला था। 4 जून 2019 कटावर मे नहाते समय गोलू मेहरा, 24 मई 2019 को आमली खालसा के हीरालाल बैष्णव पर मगरमच्छ ने हमला कर उन्हें घायल कर दिया था। हाल ही में 26 मई 2021 को बलदेवपुरा मे नहाते समय शंकरलाल मीणा को मगरमच्छ ने नदी में खींच लिया था। उसका उपचार कोटा में चल रहा है। 3 जून को अचरावां गांव के निकट परवन नदी के छोटे दह में बालक केशव (13) पुत्र रघुनंदन की मगरमच्छ के हमले में मौत हो गई थी।

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कारण एकमात्र : पर्यावरण से छेड़छाड़, बढ़ रहा इंसानी दखल
आमतौर पर मगरमच्छ नदियों में ऐसे स्थानों को अपना घर बनाते हैं, जहां पूरे साल पानी के साथ भोजन की पर्याप्त उपलब्धता रहे। जिले की जिन तीन नदियों में मगरमच्छ बहुतायात में हैं, वो सदानीरा (पूरे साल बहने वाली) नहीं है। ऐसे में यह जलचर इन नदियों के दह में रहते हैं। लेकिन इन सभी दह में मत्स्य आखेट के साथ खेती के लिए अवैध रूप से जल का दोहन किया जाता है। शरण स्थलियों पर पानी व भोजन की कमी से मात्रा कम होने पर ही मगरमच्छ गर्मियों के दिनों में बाहर निकल जानवरों व इंसानों पर हमला करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इनके ठिकाने स्थायी हो, यह नदियों में जलप्रवाह के दौरान माइग्रेट होते रहते हैं। इनका वजन सौ से दो सौ किलो होने के बावजूद यह नदी में 30 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दूरी नापते हैं। इनक औसत आयु लगभग 50 वर्ष होती है। यह कोल्ड ब्लडेड (ठंडे खून) वाले होते हैं। प्रकृति की इस नेमत को हिंसक होने से बचाने के लिए लोगों को पहल कर इनके आश्रय स्थलों से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। वहीं, जिन स्थानों पर यह रहते हैं, उनसे भी दूरी बनाकर रखना चाहिए।
दीपक गुप्ता, सहायक वन संरक्षक, बारां

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ऐसे हिंसक हो जाता है ठंडे खून वाला मगरमच्छ
जानकार बताते हैं कि मगरमच्छ को ठंडे खून वाला जलचर है। जो भीषण सर्दी के दौरान ही पानी से बाहर आकर धूप का सेवन करता है। गर्मी में यह जलचर पानी में ही रहता है। लेकिन गर्मी के दिनों में नदियों में जलप्रवाह रुक जाता है। इसके अलावा जल के अवैध दोहन के साथ वाष्पीकरण बढऩे से जल का स्तर तेजी से कम होता है तथा सभी जलचरों का जीवन सांसत में आ जाता है। इन्हीं दिनों मगरमच्छ हिंसक होते हैं। ये आमतौर पर मछलियों समेत पानी में रहने वाले अन्य जीवों का ही भक्षण कर पेट की भूख शांत करते हैं। लेकिन जब पानी में इन्हें भोजन नहीं मिलता तो यह जमीन पर आ जाते हैं तथा जानवरों तथा इंसानों पर भी हमला कर देते हैं।

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