
हेमराज गुप्ता निडर/मांगरोल। क्षेत्र में गन्ने का भरपूर उत्पादन व जगह-जगह चलती चरखी से गुड़ बनाना गई गुजरी बात हो गई। अब जिले में गुड़ बनाने वाले इक्का-दुक्का ही किसान हैं। लेकिन अब इनका भी लगातार बढ़ रही लागत के अनुरूप दाम नहीं मिलने से मोह भंग होने लगा है।
मांगरोल क्षेत्र के भटेडिया गांव निवासी नंदलाल नागर, उनके भाई रामकुंवार नागर समेत पूरा परिवार आज भी गुड़ बनाने के इस व्यवसाय से जुड़े हैं। उनके फार्म हाउस पर बहुतायत से गन्ना होता है। यहीं गुड़ तैयार करने का काम होता है। फार्म हाउस के बाहर से ही गुड़ की शुद्धता व उसकी मिठास व विभिन्न किस्मों के फूल बरबस यहां से गुजर रहे लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। पेशे से अध्यापक रहे 72 वर्षीय नंदलाल नागर गुड़ बनाने को व्यवसाय के तौर पर नहीं बल्कि शौेक के तौर पर पिछले 42 सालों से करते आ रहे हैं।
उनकी इस बात से यह साफ जाहिर भी होता है। उनके फार्म हाउस पर गुड़ बनाने की प्रक्रिया बताते हुए वह कहते हैं कि सबसे ज्यादा समस्या मजदूरों की है। देसी विधि से गुड़ बनाने का काम अब बहुत मुश्किल हो गया है। फिर भी लोगों को शुद्ध गुड़ मुहैया कराने का जुनून उनकी बातों से झलकता है।
उनका कहना है कि बाजार में आने वाले गुड़ में कई चीजों का मिश्रण होता है। गुड़ का रंग दिखाने व लागत कम करने के लिए गुड़ उत्पादक केवल धंधे के लिहाज से यह काम करते हैं, लेकिन यहां कोई समझौता नहीं है। दिखने में भले कलर साफ न लगे, लेकिन स्वाद में बाजार में मिलने वाली मावे की मिठाई खाने वाला भी इसकी क्वालिटी की बढ़ाई करते नहीं थकते।
फार्म हाउस से ही बिक्री
गुड़ को बनाने के बाद साफ रंग करने के लिए भी वे किसी प्रकार के केमिकल का भी इस्तेमाल नहीं करते। यहां बनने वाले गुड़ की शुद्धता का मापदंड यही है कि ये बाजार में इसका विक्रय नहीं करते बल्कि लोग यहीं से आकर गुड़ लेकर जाते हैं। बाजार में मिलने वाला गुड़ 170 रुपए भेली यानि प्रति पांच किलो के हिसाब से बिकता है। यहां 300 रुपए भेली (पांच किलो)में भी लोग लाइन लगाकर गुड़ खरीदते नजर आते हैं।
क्वालिटी से समझौता नहीं करने का ही यह उदाहरण है। इस फार्म हाउस पर हल्दी, गोभी,पतागोभी, आलू, टमाटर, मूली,मटर, मिर्ची, करौंदा, आंवला, चुकंदर, पपीता, नारंगी, पशुओं के लिए पौष्टिक आहर के रूप में हाथी घास समेत अनेक उन्नत किस्मों के अलावा यहां सागवान के पेड़ों की बहुतायात है।
ऐसे तैयार होता है विशुद्ध देसी गुड़
पहले आठ इंच नाली बनाई जाती है। नालियों में गन्ने की रोपाई की जाती है। उसके बाद डेढ़ फीट तक मिट्टी चढ़ाते हैं व पानी देते हैं। 20 दिन बाद गन्ना अंकुरित होने लगता है, फिर पानी छोड़ा जाता है। 9 इंच की लंबाई का होने के बाद कचरा साफ किया जाता है। 15 दिन बाद फिर पानी देते हैं। पानी देने की प्रक्रिया हर 15-20 दिन में चलती रहती है। मार्च में रोपाई किए गन्ने की फसल दिसम्बर, जनवरी के मध्य तैयार होती है।
कटाई के बाद छिलाई उसके बाद चरखी में गन्ना पैलते व रस निकालते हैं। रस को पीपियों में एकत्र कर भटटी में चढी कढ़ाई में डालते पांच घंटे ओटने के बाद यह मावा जैसा हो जाता है। बाद में इसको चाका में रख भेली तैयार की जाती है। कपड़े में बांध कर भेली का आकर दिया जाता है इतना सबकुछ करने के बाद गुड़ बिक्री के लिए तैयार होता है। गुड़ उत्पादक किसान नंदलाल नागर का कहना है कि आजकल बाजार में जो गुड़ बना रहे हैं, उसमें सबसे ज्यादा समस्या मजदूरों की है।
देसी विधि से बनने वाला गुड़ महंगे मजदूरों के कारण महंगा पड़ता है। डीजल महंगा मजदूर महंगे ऐसे में गुड़ बनाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। 400 गन्ने में एक कढ़ाह तैयार होता है। उसमें 10 भेली गुड़ बनता है। लागत से जोड़े तो 10 रुपए प्रति गन्ना का मूल्य होता है। 400 गन्ने 5-6 मजदूर और एक कढाह की मजदूरी 800 रुपए पड़ती है।
मिठाई वाला गुड़ भी बनता है
यहां प्रति दस भेली की मात्रा में 10 किलो मूंगफली दाने, तिल्ली पांच किलो, खोपरा तीन किलो, काजू, बादाम, पिस्ता, केसर, ईलायची व एक किलो घी डालकर गुड़ वाली मिठाई भी यहां तैयार की जाती है। इसे सौ रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है। दिखने में यह मिठाई काली जैसी ही लगती है।
Published on:
28 Dec 2022 02:05 pm
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