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दुख में भी शांति का अहसास कराती है यहां की हरियाली

युवाओं की मेहनत से बदल गई मुक्तिधाम की फिजां

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बारां

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Mukesh Gaur

Dec 31, 2020

दुख में भी शांति का अहसास कराती है यहां की हरियाली

दुख में भी शांति का अहसास कराती है यहां की हरियाली

प्रमोद जैन. हरनावदाशाहजी. मन में कुछ करने की दृढ इच्छा शक्ति हो और फिर कार्य मानव सेवा से जुडा हो तो सफलता के कोई मायने नही रह जाते। ऐसेे ही नित्य श्रमदान का बीडा उठाकर कर शुरु की गई पहल के बाद आपसी जनसहयोग जुटाकर कस्बे के युवाओं की एक टीम ने मोक्षधाम की कायापलट करके अनूठी मिसाल कायम कर डाली है। कभी उपेक्षा का शिकार होकर गंदगी से अटे पडे कांच पत्थर व कांटेदार झाडों से सरोबार रहने वाले मोक्षधाम परिसर की सूरत ही बदल गई है। ऐसे में अब यहां छाई हरियाली गम में यहां पंहुचने वाले शोक संतप्त परिवारों को सुखद शांति का अहसास कराती नजर आने लगी है। कस्बे से फूलबडौद को जोडने वाले रास्ते के समीप स्थित प्रमुख मुक्तिधाम लम्बे अरसे से उपेक्षा का शिकार हो रहा था। खाळ के किनारे होने के कारण यहां पर ग्राम पंचायत द्वारा कराए गए चारदीवारी समेत अन्य निर्माण पानी के तेज बहाव के कारण जमींदोज हो गए थे। नतीजतन बजट के अभाव में ग्राम पंचायत द्वारा भी मुक्तिधाम परिसर उपेक्षित रहने लगा। सार संभाल व देखरेख के अभाव में गंदगी व कचरे का अम्बार लगने लगा। धीरे धीरे आवारा मवेशियों का शरण स्थली बन गया। कंटीली झाडियां परिसर में फैली नजर आती तो वहीं अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों के नंगे पैरों में चुभते शूल पीड़ादायक होते। ऐसे में अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को दोहरी पीड़ा भुगतने की मजबूरी बनी हुई थी।

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इनकी पहल काम आई
परिसर को सुुदर व सुसज्जित बनाने में भले ही बाद में ग्राम पंचायत द्वारा इंटरलोकिंग कार्य, चारदीवारी, स्नानघर एवं शौचालय का निर्माण करवाया गया है। परिश्रम करने वाली टीम में नीरज सनाढय की अगुवाई में मांगीलाल सेन,बजरंग काछी एवं कालू कुशवाह, हरीश मेहता, दिनेश चक्रधारी, मनीष सनाढ्य, नवल शर्मा एवं कमल कुशवाह समेत करीब एक दर्जन युवाओं ने दिन रात मेहनत करके रोजाना श्रमदान किया। पहले परिसर की गंदगी बुहारी उसके बाद परिसर का समतल किया। धीरे-धीरे बगीचा विकसित कर पौधारोपण किया। नीचे दूब उगाकर फूलों के पौधे लगा दिए। इसके बाद जनसहयोग जुटाकर लोगों के बैठने के लिए बैंचे लगवाई तो वहीं दाह संस्कार के लिए लकडिय़ों का भंडारण भी जुटा लिया। अब करीब डेढ़ लाख रुपए के जनसहयोग के बाद समिति का गठन कर अहसहाय एवं लावारिश शवों के अंतिम संस्कार के लिए भी निशुल्क लकडिय़ों की सुविधा मुहैया की जाने लगी है।

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लगा दिए चार चांद
मुक्तिधाम परिसर की कायापलट में लगे समय व मेहनत के बाद ग्राम पंचायत ने भी लाखों रुपए के खर्च के बाद यहां चार चांद लगा दिए। चारदीवारी की मरम्मत करवाकर चारों तरफ लोहे की जालियां लगवाई। शौचालय, स्नानघर बनवाकर नल पानी की व्यवस्था को भी दुरुस्त करवाकर सहयोग दिया है। इधर इस कार्य से प्रेरणा लेकर कुछ अन्य युवाओं ने भी कस्बे में दूसरे स्थान पर स्थित मुक्तिधाम स्थलों की कायापलट करने की कवायद शुरु की है। इससे वहां पर भी लोगों की परेशानियां हद तक दूर हुई है। अब स्थानीय प्रशासन से सहयोग की दरकार हो रही है।

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संकल्प के साथ कर डाली शुरुआत
करीब डेढ साल पहले कुछ लोगों ने इस परेशानी से राहत दिलाने के लिए बीड़ा उठाने के संकल्प के साथ रोजाना श्रमदान कर परिसर की साफ सफाई का काम शुरु किया। स्वप्रेरणा के साथ शुरु किए इस काम की शुरुआत होने के बाद धीरे धीेरे श्रमवीरों का कारवां जुटता गया। फिर किसी ने तन मन से तो किसी ने धन से सहयोग देकर श्रमवीरों की हौंसला अफजाई की। और और देखते ही देखते कांटों व गंदगी के अम्बार से सरोबार मुक्तिधाम अब सुंदर बगीचे में परिवर्तित होकर सुखद अहसास करा रहा है।