
बरेली। शारदीय नवरात्र 21 सितंबर से शुरू हो रहे हैं। इस बार दुर्गा मां नौका पर सवार होकर आ रही है। बरेली में नवरात्र को लेकर सभी देवी मंदिरों में तैयारियां जोरों पर हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा के अनुसार 21 सितंबर गुरुवार को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा होने के कारण शारदीय नवरात्र आरम्भ हैं। इस दिन प्रतिपदा के साथ शुक्ल योग एवं हस्त नक्षत्र में घटस्थापना मुहूर्त का होना शुभ फलदायक एवं लक्ष्मी प्रदायक है। हस्त नक्षत्र रात्रि 11:34 बजे तक रहेगा। यह सूर्य स्वामित्व वाला शुभ नक्षत्र होने के कारण इसमें सभी धार्मिक अनुष्ठान एवं व्यापारिक कार्य आरम्भ किये जा सकते हैं।
महासप्तमी - 27 सितंबर बुधवार को मूल नक्षत्र में प्रातः 9:57 बजे के बाद एवं सिद्ध योग में प्रातः 6:12 बजे से सांय 7:09 बजे तक सरस्वती देवी का आवाह्न, महासप्तमी एवं अन्नपूर्णा परिक्रमा सायं 7:09 बजे से आरम्भ होगी। महानिशा पूजा महानिशिध काल में रात्रि 11:23 बजे से रात्रि 12:11 बजे तक होगी। इस दिन सूर्य प्रातः 6:00 बजे हस्त नक्षत्र में प्रवेश करेगा।
महा अष्टमी - 28 सितंबर गुरुवार को महा अष्टमी पूजन के साथ दोपहर 12:57 बजे के बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में सरस्वती पूजन एवं अन्नपूर्णा परिक्रमा रात्रि 09:37 बजे तक समाप्त होगी। इस दिन प्रातः 6:13 बजे से रात्रि 9:36 बजे तक अमृत योग में सरस्वती पूजन का विशेष फल प्राप्त होगा।
महानवमी - 29 सितंबर शुक्रवार अमृत योग प्रातः 6:13 बजे से रात्रि 11:50 बजे तक, दोपहर 3:48 बजे के बाद उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में महानवमी व्रत, नवमी का हवन आदि, आयुध पूजा एवं सरस्वती देवी के लिए बलिदान सम्पन्न होगा। महानवमी रात्रि 11:50 बजे तक है, इस दिन की विशेष बात यह है कि इस दिन हवन हेतु अग्निवास भी है, जो कि हवन आदि कार्य के लिए अति आवश्यक एवं शुभ होता है।
कलश स्थापना के लिए पूजन सामग्री
रोली, मौली, केसर, सुपारी, चावल, जौ, सुगन्धित पुष्प, इलायची, लौंग, पान, सिन्दूर, श्रृगांर सामग्री, दूध, दही, शहद, गंगाजल, शक्कर, शुद्ध घी, जल, वस्त्र, आभूषण, बिल्व पत्र, यज्ञोपवीत, तांबे का कलश, पंचपात्र, दूब, चन्दन, इत्र, चैकी, बिछाने वाला लाल वस्त्र, दुर्गा जी की प्रतिमा, फल, धूप-दीप, नैवेध, अबीर, गुलाल, पिसी हल्दी, जल, शुद्ध मिट्टी, थाली, कटोरी, नारियल, दीपक, रूई आदि।
कैसे करें कलश स्थापित
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि सर्वप्रथम एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर, उसके समक्ष कलश स्थापना के लिए मिट्टी की वेदी बनाएं। जिसमें भीगे हुए जौ के दाने बिखेर दें। वेदी के बीच में कलश स्थापना से पूर्व एक अष्टदल कमल बनाएं। कलश के अन्दर तीर्थ जल भर दें। उसके ऊपर पंच पल्लव लगाकर उस पर किसी मिट्टी के पात्र में चावल भरकर रख दें, कलश के कण्ठ में कलावा बांधे इसके बाद सूखे नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर कलश के ऊपर रखें कटोरे में रख दें, नारियल को सीधा खड़ा करके रखना है।
हवन और विसर्जन में इन बातों का रखे ध्यान
नवरात्र व्रत एवं उपासना के बाद नवमी के दिन हवन करें। हवन साम्रगी में जौ काले तिल एवं चावल मिलाएं। विसर्जन के लिए बायें हाथ में चावल लेकर दाहिने हाथ से देवी-देवताओं पर छिड़कते हुए मन में लक्ष्मी, कुंबेर, इष्टदेवी से प्रार्थना करें कि मेरे यहां निवास करो एवं मुझे आशीर्वाद एवं साधना, उपासना की सफलता प्रदान करते हुए अपने स्थान को गमन करें। नवरात्र पूजा का विजयदशमी के दिन समस्त पूजन सामग्री का किसी जलाशय में विसर्जन के साथ समापन करें।
हस्त नक्षत्र में घट स्थापना मुहुर्त का होना शुभ फलदायक एवं लक्ष्मी प्रदायक है।
घट स्थापना मुहुर्त :- प्रातः 6:15 से 7:50 तक, दोपहर 12:15 से 1:30 तक।
शुभ का चैघड़िया :- सूर्योदय से प्रातः 7:38 तक।
लाभ का चैघड़िया:- दोपहर 12:15 से 1:30 तक।
अमृत का चैघड़िया:- दोपहर 1:30 से 3:32 तक।
शुभ का चैघड़िया:- सायं काल 4:15 से 6:00 तक।
कन्या लग्न:- सूर्योदय से प्रातः 8:08 तक।
अभीजित मुहूर्त:- प्रातः 11:40 से दोपहर 12:29 तक।
Updated on:
19 Sept 2017 01:11 pm
Published on:
19 Sept 2017 01:08 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
