
बरेली: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नवाब खान बहादुर खां के नेतृत्व में संघर्ष करने वाले बरेली के लोगों ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1920 और 1921 में गांधीजी ने बरेली जिले का दौरा किया, जिससे यहां के लोगों में आजादी की भावना और प्रबल हुई। उनकी अपील पर सैकड़ों लोगों ने जेल जाने, गोली खाने और शारीरिक यातनाओं का सामना करने का साहस दिखाया। बरेली के लोगों की इसी वीरता ने गांधीजी का इस क्षेत्र से खास लगाव बना दिया।
महात्मा गांधी के बरेली और कुमाऊं दौरे
महात्मा गांधी ने बरेली और कुमाऊं क्षेत्र में दौरे किए थे, जिनके दौरान सरकारी खुफिया तंत्र ने उन पर लगातार नजर बनाए रखी। 1920 और 1921 में बरेली दौरे के दौरान स्थानीय लोगों ने उनके आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके बाद, 1929 में गांधीजी ने कुमाऊं का दौरा किया और कौसानी में लगभग 10 दिन तक रुके।
कुमाऊं यात्रा और खुफिया तंत्र का हंगामा
महात्मा गांधी का 1929 का कुमाऊं दौरा 14 जून से 5 जुलाई तक चला। वह कौसानी में 10 दिनों तक रुके। उनकी इस यात्रा के दौरान विधान परिषद में काफी चर्चा और हंगामा हुआ। उस समय यह अफवाह उड़ी कि सरकार को गांधीजी की यात्रा से खतरा हो सकता है। इसका कारण यह था कि खुफिया विभाग ने गांधीजी की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी और उनकी गुप्त रिपोर्टें सरकार तक पहुंचाईं।
350 रुपये खर्च हुए खुफिया अफसरों पर
गांधीजी का पीछा करने के आरोपों पर विधान परिषद में गृह विभाग के सदस्य कैप्टन नवाब सर मोहम्मद अहमद सईद खान ने सफाई दी कि गांधीजी का पीछा नहीं किया गया, बल्कि दो सीआईडी अधिकारी उनकी यात्रा से जुड़ी जानकारियां इकट्ठा करने के लिए कौसानी में तैनात रहे। इन अफसरों पर कुल 350 रुपये खर्च हुए थे।
पंडित गोविंद बल्लभ पंत का सवाल
विधान परिषद के सदस्य पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने इस मुद्दे पर कई सवाल उठाए थे। उन्होंने गृह विभाग से स्पष्ट रूप से जानना चाहा कि क्या खुफिया अधिकारियों को गांधीजी का पीछा करने के लिए भेजा गया था।
Published on:
02 Oct 2024 09:58 am
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