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जोधपुर-बालोतरा से निकलने वाला रासायनिक पानी बनेगा गांवों की तरक्की की राह, सिंचाई और रोजगार की अपार संभावनाएं

जोधपुर, पाली, बालोतरा और बिठूजा से निकलने वाले रासायनिक पानी के लिए ड्रेन योजना बनी तो बालोतरा से गांधव तक गांवों में छोटे उद्योग-धंधे पनप सकते हैं। गांवों में ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर इस पानी से धुपाई, रंगाई, मार्बल उद्योग में उपयोग संभव होगा।

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Chemical water Jodhpur-Balotra

रासायनिक पानी बनेगा गांवों की तरक्की की राह (फोटो- एआई)

बाड़मेर: जोधपुर, पाली, बालोतरा, बिठूजा और जसोल से निष्कासित हो रहे रासायनिक पानी के निस्तारण को लेकर ड्रेन बनाने की योजना अमल में आती है तो इससे बालोतरा से गांधव तक कई गांवों में छोटे उद्योग-धंधे स्थापित हो सकते हैं। विशेषकर धुपाई और रंगाई से जुड़ी इकाईयां लग सकती हैं। बागवानी के पुनर्जीवित होने और भूजल रिचार्ज की उमीदें भी बढ़ेंगी। कच्छ की खाड़ी में गिरने से पहले ही इस पानी की मांग बढ़ सकती है।


जोधपुर, पाली, बालोतरा और बिठूजा की टेक्सटाइल और स्टील इकाईयों से बड़ी मात्रा में प्रदूषित पानी लूणी नदी में छोड़ा जा रहा है। यदि इसे ड्रेन बनाकर कच्छ की खाड़ी तक ले जाने की योजना बनती है तो बीच में इस पानी के छोटे ट्रीटमेंट प्लांट गांवों में लगाकर कई इकाईयां संचालित की जा सकती हैं। ट्रीटमेंट किए गए इस पानी से धुपाई, रंगाई, मार्बल व अन्य इकाइयों में उपयोग संभव है, जहां ताजे पानी की जगह यह पानी काम आ सकता है। इससे गांवों में कई छोटे उद्योग-धंधे विकसित हो सकते हैं।

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शौचालय और लश


स्वच्छता अभियान के तहत हर घर में शौचालय बने हुए हैं, लेकिन पानी की कमी अब भी एक बड़ी समस्या है। शौचालय और लश के लिए यह ट्रीटमेंट किया गया पानी बालोतरा, जसोल, गुड़ामालानी, सिणधरी व अन्य कस्बों में छोटे प्लांट लगाकर सप्लाई किया जा सकता है।


ऐसे होगा भूजल रिचार्ज


लूणी नदी का बहाव अनवरत नहीं है। हर साल इसमें पानी नहीं आता। जब पानी आता है तब किनारे के खेतों में कुछ हद तक रिचार्ज हो जाता है, अन्यथा नहीं। इस पानी को ट्रीट कर आधुनिक किसान अपनी खेती में उपयोग कर सकते हैं। इससे उनकी जमीन सिंचित होगी और दो से तीन फसलें ली जा सकेंगी।

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ट्रीटमेंट प्लांट लगे तो गांवों में हो बागवानी


लूणी नदी के बहाव क्षेत्र में तिलवाड़ा से लेकर गुड़ामालानी-गांधव तक के किनारे बसे गांवों में पहले गेहूं और सब्जियों का उत्पादन होता था। सर्दियों में चार माह तक लूणी का भूजल ही यहां की पैदावार बढ़ाता था। इन गांवों में छोटे ट्रीटमेंट प्लांट लगे तो ड्रेन से गुजरने वाले इस पानी को रोककर बागवानी का कार्य किसानों के लिए लाभकारी बन सकता है।


पानी का उपयोग होगा बालोतरा से गांधव का इलाका दोनों ओर से औद्योगिक और विकसित क्षेत्रों से जुड़ा है। सांचौर तक अब गुजरात का असर दिखने लगा है। इधर, जालौर जिले में ग्रेनाइट व पत्थर उद्योग से विकास हुआ है। नहरी पानी आने से धोरीमन्ना और गुड़ामालानी भी अब आर्थिक रूप से संपन्न हो रहे हैं।


ऐसे में यदि इन इलाकों में ड्रेन से ट्रीट पानी मिल जाए तो छोटे औद्योगिक हब की संभावनाएं मजबूत होंगी। एक बार ड्रेन बन जाए तो यह पानी जोधपुर, पाली, बालोतरा, जसोल और बिठूजा की इकाइयों से बड़ी मात्रा में निकलेगा। रास्ते में इस पानी के उपयोग को लेकर कई संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। कच्छ की खाड़ी में गिरने से पहले ही इसकी खपत हो जाएगी और इससे रोजगार भी मिलेगा।
-शांतिलाल बालड़, प्रांतीय अध्यक्ष, लघु उद्योग भारती