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निकाय चुनावों की दुंदुभि बजी, समस्याओं के चक्रव्यूह में आमजन, जनता मांगे बुनियादी सुविधाओं का ठोस रोडमैप

बाड़मेर। निकाय चुनाव की घोषणा के साथ शहर में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और विकास अब सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा है। जर्जर सड़कें, सीवर, जलभराव, बिजली, पेयजल और सफाई की समस्याओं से जूझते नागरिक इस बार प्रत्याशियों से ठोस जवाब मांग रहे हैं।
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बाड़मेर

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Yogendra Kumar Sen

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Updated: 20 Aug 2026, 9:03 PM IST

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बाड़मेर. सीमावर्ती जिले बाड़मेर में निकाय चुनावों की औपचारिक घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। चाय की थड़ियों से लेकर चौपालों तक केवल एक ही चर्चा है ‘इस बार शहर की कमान किसके हाथ होगी’। हर बार विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाओं और दावों के बावजूद धरातल पर आम नागरिक आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। जर्जर सड़कें, सीवर का उफान, मानसून में तालाब बनती सड़कें, और बिजली, पेयजल व सफाई जैसी समस्याएं कई वार्डों की स्थायी नियति बन चुकी हैं। इस बार बाड़मेर की जनता महज खोखले वादों पर मुहर लगाने के मूड में नहीं है। मतदाता प्रत्याशियों से हर मुद्दे पर बिंदुवार जवाब और क्रियान्वयन का स्पष्ट रोडमैप मांगेंगे।

राजस्थान पत्रिका की पड़ताल में सामने आए ये स्थानीय मुद्दे

1. सफाई व डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण: गलियां बन रहीं डिपो

शहर के कई वार्डों में कचरा उठाने की व्यवस्था पूरी तरह बेपटरी हो चुकी है। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की गाड़ियां समय पर नहीं पहुंचतीं। कई जगह आती ही नहीं। इससे मुख्य मार्गों और मोहल्लों में कचरे के अंबार लग जाते हैं। डंपिंग यार्ड जाने की बजाय कचरा रिहाइशी इलाकों तक फैल रहा है।

2. सीवरेज व ड्रेनेज व्यवस्था: उफनते सीवर और दुर्गंध

बाड़मेर के पुराने और नए दोनों इलाकों में सीवरेज नेटवर्क का बुरा हाल है। सही ढलान और समय पर सफाई न होने के कारण मुख्य बाजारों और आवासीय कॉलोनियों में सीवर का गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है। नाली और ड्रेनेज सिस्टम का तालमेल न होने से बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।

3. मानसून में जलभराव: बारिश में तालाब बनती सड़कें

थोड़ी सी बारिश ही बाड़मेर नगर परिषद के दावों की पोल खोल देती है। सिणधरी चौराहा, स्टेशन रोड, विवेकानंद सर्कल सहित निचले इलाकों में सड़कें दरिया में तब्दील हो जाती हैं। व्यापारियों को हर साल लाखों का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। निकासी का पुख्ता ड्रेनेज मास्टर प्लान नहीं है।

4. सड़क- फुटपाथ की बदहाली: पैदल चलना मुहाल

शहर की अंदरूनी सड़कों से लेकर मुख्य कनेक्टिविटी वाले मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुके हैं। घटिया निर्माण सामग्री के कारण पहली बारिश में ही डामर उखड़ जाता है और ठेकेदारों की लापरवाही का खामियाजा जनता भुगतती है। पैदल यात्रियों के लिए बने फुटपाथों पर कब्जा है।

5. ट्रैफिक व पार्किंग संकट: बाजारों में ट्रैफिक जाम

बाड़मेर के मुख्य व्यावसायिक क्षेत्रों में व्यवस्थित पार्किंग स्पेस न होना सबसे बड़ी सिरदर्दी है। सड़कों पर बेतरतीब खड़े वाहन और नो-पार्किंग जोन का सही क्रियान्वयन न होने से रोजाना जाम लगता है। मल्टी-लेवल पार्किंग की सालों पुरानी घोषणा आज तक कागजों से बाहर नहीं आ पाई। व्यापारी और आम नागरिक त्रस्त हैं।

6. सार्वजनिक परिवहन: ऑटो चालकों की मनमानी

जिले का मुख्य केंद्र होने के बावजूद शहर के भीतर सस्ती और व्यवस्थित लोक परिवहन सेवा का अभाव है। ऑटो-रिक्शा चालकों द्वारा मनमाना किराया वसूलने से गरीब और मध्यम वर्ग की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। छात्रों, बुजुर्गों और कामकाजी महिलाओं को दैनिक आवाजाही में भारी फजीहत झेलनी पड़ती।

7. बाहरी कॉलोनियों में विकास अधूरा: उपेक्षित हैं नए वार्ड

शहर के विस्तार के साथ विकसित हुई नई रिहाइशी कॉलोनियों में विकास कार्य अधूरे हैं। कहीं सड़कें बदहाल हैं, तो कहीं सफाई की व्यवस्था नहीं हैं। गर्मी में पेयजल संकट गहरा जाता है। कॉलोनियां विकसित करते वक्त बेहतर सड़क, पानी, बिजली, सफाई के वादे किए, लेकिन वे अधूरे हैं। कई कॉलोनियों के लोग प्रदर्शन तक कर चुके हैं।

8. बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटें: अंधेरे में गलियां

रात ढलते ही शहर के कुछ मुख्य मार्ग और अंदरूनी कॉलोनियां अंधेरे के आगोश में समा जाती हैं। खराब पड़ी लाइट बदलने के लिए दर्ज कराई गई शिकायतों पर हफ्तों तक कोई कार्रवाई नहीं होती। अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्व वारदातों को अंजाम देते हैं, जिससे महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़ा होता है।

9. आवारा पशु व कुत्तों का आतंक: राहगीर लहूलुहान

शहर के मुख्य चौराहों पर आवारा मवेशियों के जमघट और खूंखार होते कुत्तों का आतंक है। सांडों की आपसी लड़ाई में कई राहगीर व दुपहिया वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। नगर पालिका की टीम कभी कभार कार्रवाई करती है, लेकिन ये नाकाफी है। नसबंदी अभियान तो लगता है कागजों में चल रहा है।

10. अतिक्रमण से छुटकारा नहीं: बिगड़ी बाजारों की सूरत

मुख्य बाजारों, फुटपाथों और चौराहों पर अनियंत्रित अतिक्रमण ने बाड़मेर के सौंदर्य और यातायात दोनों का दम घोंट दिया है। वेंडर जोन निर्धारित नहीं होने के कारण छोटे दुकानदारों और पुलिस प्रशासन के बीच आए दिन टकराव की स्थिति बनती है। एक सुव्यवस्थित, पारदर्शी और अतिक्रमण मुक्त बाजार नीति अब मुख्य जरूरत है।

11. पार्क, हरियाली व प्रदूषण: उपेक्षित हरित पट्टियां

रेगिस्तानी परिवेश में स्थित बाड़मेर शहर में पार्कों और हरियाली की सख्त दरकार है, लेकिन मौजूदा पार्क उचित रखरखाव के अभाव में उजाड़ पड़े हैं। कभी जब आला अफसरों की नजरें पड़ती हैं तो सुधार चालू हो जाता हैं, लेकिन सही देखरेख नहीं होने से फिर वही हालात हो जाते हें। सड़कों पर उड़ती धूल और प्रदूषण शहरवासियों के फेफड़ों को बीमार कर रहा है।