हापों की ढाणी की रहने वाली लीला के दोनों हाथ करंट लगने से बचपन में ही काटने पड़े थे। लीला उस समय चौथी कक्षा में पढ़ती थी। हाथ कटने के बाद बेटी के भविष्य को लेकर पिता भूरसिंह की चिंता बढ़ गई, लेकिन लीला ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। लीला ने हाथ छोड़ पांवों से लिखना शुरू किया और वह अब स्नातक प्रथम वर्ष में पढ़ रही है।